झारखंड में कितना असरदार होगा क्षेत्रीय दलों का पेंच

- Author, नीरज सिन्हा
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
लोकसभा चुनावों की तारीख़ नज़दीक़ आने के साथ ही झारखंड में क्षेत्रीय दल, कांग्रेस और भाजपा की परेशानी बढ़ा रहे हैं. समीकरणों और आंकड़ों के लिहाज़ से राज्य के अलग-अलग हिस्सों में कम से कम कम दस सीटों पर क्षेत्रीय दलों के पेंच से दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को मशक़्क़त करनी पड़ रही है.
कांग्रेस और भाजपा के रणनितिकार इसे बख़ूबी परखने में जुटे हैं कि क्षेत्रीय दलों के इन पेंचों से किस सीट पर उन दोनों में से किसका लाभ और किसका नुक़सान होगा.
इस बीच नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी समेत भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेताओं का झारखंड दौरा तेज़ हो गया है. केंद्र में सरकार बनाने के लिए एक-एक सीट पर उनकी चिंता साफ़ झलक रही है.
कांग्रेस और भाजपा को इसका भी अंदेशा है कि जातीय समीकरणों और स्थानीय मुद्दों के आधार पर क्षेत्रीय दल उन्हें कहीं कम कहीं ज़्यादा परेशान कर सकते हैं.
यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस को अलग-अलग संसदीय सीटों पर अलग-अलग हिसाब से झारखंड मुक्ति मोर्चा, झारखंड विकास मोर्चा, आजसू पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और तृणमूल कांग्रेस की मौजूदगी का सामना करना पड़ रहा है.
14 सीटें, तीन चरण
झारखंड में लोकसभा की 14 सीटें हैं. इनमें पांच- खूंटी, लोहरदग्गा, दुमका, राजमहल, चाईबासा आदिवासियों के लिए और पलामू सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं.
शेष आठ सीटें- रांची, हज़ारीबाग, जमशेदपुर, चतरा, धनबाद, कोडरमा, गिरिडीह सामान्य वर्गों के लिए हैं.
सभी 14 सीटों पर तीन चरणों में क्रमशः 10, 17 और 24 अप्रैल को चुनाव होंगे.
इन चुनावों में भाजपा को अपने क़ब्ज़े की सात सीटें बचाने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस को पिछले चुनावों में मिली सिर्फ़ एक सीट पर जीत से आगे बढ़ने की.
हालांकि भाजपा ख़ेमे की उम्मीदें क़ायम हैं कि हर तरह के बनते-बिगड़ते समीकरण अंततः नरेंद्र मोदी के नाम और प्रभाव से उनके ही पक्ष में जाएंगे और भाजपा पिछले चुनावों के परिणाम से बेहतर करेगी.
भाजपा की नज़र इस पर भी लगी है कि कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे का लाभ उसे मिल सकता है.

क्षेत्रीय दलों के प्रभाव और पेंच का काट निकालने के ख़्याल से ही भाजपा ने संथाल परगना के राजमहल संसदीय सीट पर झामुमो के वरिष्ठ विधायक हेमलाल मुर्मू और जमशेदपुर सीट पर झामुमो के ही दूसरे विधायक विद्युतवरण महतो को अपना उम्मीदवार बना लिया है.
जमशेदपुर में कुर्मी वोटों का ख़ासा प्रभाव है. जमशेदपुर में झाविमो के वर्तमान सांसद डॉ अजय कुमार फ़िलहाल सशक्त उम्मीदवार माने जा रहे हैं. लेकिन अपनी वापसी के लिए भाजपा ने वहां कु्र्मी जाति के उम्मीदवार को उतारकर बिसात बिछा दी है. इन दोनों सीटों पर झामुमो भी ज़ोर लगा रहा है.
चुनावी मुद्दे
चुनावी मुद्दों पर ग़ौर करें, तो भाजपा, यूपीए सरकार को बदलने पर ज़ोर दे रही है. भाजपा का फ़ोकस कथित घपले-घोटालों पर भी है. जबकि कांग्रेस यूपीए सरकार के कामों को गिना रही हैं.
जबकि अधिकतर क्षेत्रीय दल यह बता रहे हैं कि राष्ट्रीय पार्टियों से झारखंड का भला नहीं होने वाला.
इनके अलावा झारखंड के विकास और अस्थिर राजनीति को पटरी पर लाने की वकालत लगभग सभी दल कर रहे हैं.
कांग्रेस को फ़िलहाल थोड़ी राहत इस वजह से भी है कि झामुमो, राजद के साथ उनके गठबंधन है.
भाजपा अकेले सभी 14 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.
गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस को नौ, झामुमो को चार और राजद को एक सीटें मिली हैं.
हालांकि 2009 के चुनावों में भी कांग्रेस का झामुमो के साथ गठबंधन था, लेकिन कांग्रेस को सिर्फ़ एक रांची सीट पर जीत हासिल हुई थी.
जबकि क्षेत्रीय दलों में झामुमो को दो, झारखंड विकास मोर्चा को दो और दो सीटें निर्दलीय के खाते में गई थीं. भाजपा सात सीटें जीती थी.
मज़बूत दावेदारी

झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के दुमका और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश कुमार महतो के रांची से चुनाव लड़ने की दावेदारी के बाद पूरे राज्य की नज़र इन दोनों सीटों पर है.
झारखंड विकास मोर्चा ने अकेले राज्य की सभी 14 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि आजसू पार्टी भी अकेले दस सीटों पर चुनाव लड़ रही है.
भाजपा के वरिष्ठ विधायक सीपी सिंह कहते हैं कि कुछ सीटों पर क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवार ठीकठाक वोट हासिल कर सकते हैं, लेकिन सीटें जीतने की स्थिति में वे नहीं हैं. अंततः लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होगी. और झारखंड में भाजपा अच्छी जीत दर्ज करेगी. लोकसभा चुनाव के वोटर इसे समझते हैं कि क्षेत्रीय दलों की भूमिका महज़ मोल-तोल करने वाली होती हैं.
अब तक हुए चुनावों में रांची संसदीय सीट पर कांग्रेस- भाजपा की सीधी टक्कर होती रही है.
पिछले दो चुनावों (2004-2009) में कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय बेहद कम मतों के अंतर से ये सीट जीतते रहे हैं.
इस बार आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश महतो के चुनाव लड़ने से भाजपा के सामने जातीय समीकरणों को संभालने की मुश्किलें हैं.
दरअसल सुदेश महतो कुर्मियों के अलावा महिला व युवाओं के बीच तेज़ी से ऊभरने लगे हैं. रांची लोकसभा सीट के सिल्ली विधानसभा क्षेत्र से वे तीन बार लगातार विधायक भी चुने गए हैं.
रांची में कांग्रेस को भी आजसू, झाविमो, तृणमूल की घेराबंदी से निकलने का संकट है.
क्षेत्रीय मुद्दे महत्वपूर्ण
पूर्व आइपीएस अधिकारी अमिताभ चौधरी झाविमो के टिकट पर और हाल ही में तृणमूल में शामिल हुए विधायक बंधु तिर्की भी रांची से ही चुनाव लड़ रहे हैं.
इनके अलावा जमशेदपुर, गोड्डा, धनबाद, कोडरमा, पलामू, गिरिडीह, हजारीबाग, लोहरदग्गा, चाईबासा संसदीय सीटों के लिए भी कांग्रेस-भाजपा में क्षेत्रीय दलों के पेंचों से बच निकलने की बेचैनी साफ़ दिखती हैं.
भाजपा और कांग्रेस के तमाम दावों और कोशिशों को आजसू पार्टी के वरिष्ठ विधायक चंद्रप्रकाश चौधरी सिरे से ख़ारिज करते हैं. वे कहते हैं कि झारखंड में क्षेत्रीय मुद्दे और सवाल ही अहम हैं. लिहाज़ा इस बार भाजपा और कांग्रेस को कई सीटों पर हार का सामना करना पड़ेगा. चौधरी का दावा है कि रांची और हज़ारीबाग़ सीट आजसू ही जीतेगी.
उधर दुमका से सात बार चुनाव जीत चुके झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष शिबू सोरेन से इस बार भाजपा के अलावा झाविमो के केंद्रीय अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को भिड़ना है.
1998 में बाबूलाल मरांडी ने दुमका सीट पर शिबू सोरेन और 1999 में शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन को हरा चुके हैं. तब बाबूलाल मरांडी भाजपा में थे.

झारखंड विकास मोर्चा के केंद्रीय महासचिव प्रवीण सिंह का मानना है कि झारखंड में नीति सिद्धांत की राजनीति सिर्फ़ उनकी पार्टी ही करती है. लिहाज़ा जनता विकल्प के तौर पर सिर्फ़ झाविमो की ओर देख रही है. झाविमो पिछले चुनावों से ज़्यादा सीटें जीतेगा.
जबकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत का कहना है कि क्षेत्रीय दलों का प्रभाव भले ही दिख रहा है, लेकिन चुनाव जीतना उनके लिए आसान नहीं होगा. वे वोटरों में बिखराव ही पैदा कर सकते हैं.
कोड़ा का असर
चाईबासा संसदीय सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की विधायक पत्नी गीता कोड़ा और खूंटी संसदीय सीट पर झारखंड पार्टी के विधायक एनोस एक्का चुनाव लड़ रहे हैं.
2009 में मधु कोड़ा जेल में रहकर ही चाईबासा से सांसद का चुनाव जीते थे, जबकि जेल में रहकर एनोस एक्का कोलेबिरा से विधायक का चुनाव जीते थे.
चाईबासा के आदिवासी इलाक़ों में कोड़ा दंपत्ति के राजनीतिक प्रभाव की वजह से यह माना जा रहा भाजपा और कांग्रेस को गीता कोड़ा से ही मुक़ाबला करना पड़ेगा.
खूंटी में छह बार चुनाव जीते भाजपा के कड़िया मुंडा को इस बार कांग्रेस के साथ झारखंड पार्टी से भी दो- दो हाथ करना है.
हाल ही में तृणमूल में शामिल हुए कांग्रेस विधायक चंद्रशेखर दूबे धनबाद संसदीय सीट से और दो अन्य विधायक बंधु तिर्की रांची और चमरा लिंडा लोहरदगा से चुनाव लड़ रहे हैं. जबकि पलामू से झामुमो के सांसद कामेश्वर बैठा भी तृणमूल से ही लड़ रहे हैं.
2004 में दूबे कांग्रेस से धनबाद लोकसभा क्षेत्र का चुनाव जीते थे. जबकि 2009 के चुनाव में लोहरदग्गा से चमरा लिंडा निर्दलीय लड़े थे और भाजपा से महज 8283 वोट से हारे थे. लिहाज़ा इन चेहरों पर भी सबकी नजर है.
इनके अलावा जदयू, सपा, बसपा और वाम दलों ने भी राज्य में कई सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं.
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