बिहार: क्या टूट रहा है जातिगत टकराव का क़िला

लक्ष्मणपुर बाथे
    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सुवा मेहता की अब काफ़ी उम्र हो चली है लेकिन लगभग 17 साल पहले वो अपने गांव में हुए उस नरसंहार को बिल्कुल नहीं भूले हैं जब 58 दलितों का रात के अंधेरे में क़त्ल कर दिया गया था.

वो बिहार के अरवल ज़िले के लक्ष्मणपुर बाथे गांव में रहते हैं.

वो कहते हैं, “मार काट के बाद पूरे गांव में एक अजीब हलचल पैदा हो गई. और क्या कहें. मरने वाले मर गए. जाने वाले चले गए. संतोष इस बात का है कि अब हालात ठीक हैं. ”

जब ये क़त्लेआम हुआ तो शिवनाथ कुमार की उम्र 17 साल के आसपास थी, लेकिन आज वो उस दहशत को भुला देना चाहते हैं.

वो कहते हैं, “सब जानते हैं कि यहां कितनी बड़ी त्रासदी हुई थी. अब फिर से उन बातों को करने से कोई फ़ायदा नहीं है. जो होना था हो गया. मरे हुए मुर्दों को उखाड़ने से अब कोई फ़ायदा नहीं है.”

'ग़रीब की कौन सुनता है'

लेकिन विनोद इस नरसंहार को कैसे भूल सकते हैं. उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने परिवार को सात लोगों को क़त्ल होते देखा था.

जब पिछले साल पटना हाई कोर्ट ने इस मामले के 26 अभियुक्तों को सबूत न होने के कारण बरी कर दिया, तो इस कांड के पीड़ितों के लिए इंसाफ़ की उम्मीद टूट गई.

विनोद कहते हैं, “ग़रीब की कौन मदद करता है. इतनी बड़ी घटना हो गई. समय पर पुलिस नहीं पहुंची, ख़बर करने के बावजूद. पहुंची भी तो बहुत देर से. ग़रीब की न पहले कोई सुनता था और न ही अब कोई सुनता है.”

विनोद बिहार की मौजूदा नीतीश कुमार सरकार के रुख़ से बेहद नाराज़ है. उनका कहना है कि नीतीश कुमार ने सत्ता में आते ही अमीरदास आयोग को भंग कर दिया जिसकी जांच में लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार के लिए कई नेताओं और अफ़सरों की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे.

लेकिन बिहार अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष विद्यानंद विकल इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं कि नीतीश नरसंहार के दोषियों को बचाना चाहते हैं. उनका कहना है कि अमीरदास आयोग का गठन इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने के लिए किया गया था, जबकि नीतीश सरकार ने इस मामले का स्पीडी ट्रायल कराया और पटना सिविल कोर्ट ने मामले के 16 अभियुक्तों को मौत की सज़ा सुनाई थी.

लेकिन हाई कोर्ट से 26 अभियुक्तों को बरी किए जाने के फ़ैसले को वो दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं और कहते हैं कि बिहार सरकार ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है.

बदले हालात

विकल मानते हैं कि बिहार में जनसंहारों का काला इतिहास रहा है, लेकिन अब स्थितियां बेहतर हो रही हैं.

वो कहते हैं, “2005 के बाद कोई जनसंहार नहीं हुआ. बड़े पैमाने पर दलितों या पिछड़े वर्ग के लोगों के ऊपर हमले नहीं हुए हैं. तो बेहतर वातावरण बना है. क़ानून का राज स्थापित हुआ है.”

वामपंथी कार्यकर्ता नंद किशोर सिंह लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार के पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने की मुहिम में सक्रिय रहे हैं. वो भी मानते हैं कि जाति राज्य में जातीय तनाव कम हुआ है.

वो कहते हैं कि कभी कभी अखाड़े में ऐसी भी स्थिति आती है जब दोनों ही पहलवान थक हार कर गिर जाते हैं. वहीं बिहार में भी हुआ है. अगड़े और पिछड़े दोनों जातीय टकराव से थक गए हैं.

नंद किशोर सिंह बेहतर हो रहे हालात का कुछ श्रेय नीतीश सरकार को तो देते हैं, लेकिन इसके पीछे वो मूल वजह से राजनीति को ही मानते हैं.

वो कहते हैं, “नीतीश कुमार पिछड़ी जाति से हैं, लेकिन उनका वोट बैंक अगड़ी जाति का है और पिछड़ी जाति का भी. ऐसे में नीतीश कुमार की ये राजनीतिक मजबूरी भी है कि वो सामाजिक समरसता की राजनीति करें. सत्ता में उन्हें रहना है. इसलिए अगर वो लालू की तरह भूरा बाल साफ़ करेंगे तो उन्हें मुश्किल हो जाएगी.”

कहा जाता है कि आरजेडी मुखिया लालू यादव ने पिछड़ी जातियों को पर पकड़ मज़बूत करने के लिए 90 के दशक में भूरा बाल यानी भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण को साफ़ करने का नारा दिया था.

बिहार में जातीय टकराव का लंबा इतिहास रहा है. नंद किशोर सिंह कहते हैं, “इसका कारण सामंती व्यवस्था को बरक़रार रखने की कोशिश था और इसके बिहार में ऊंची जातियों ने कई निजी सेनाएं बनाई गई जिनमें ब्रह्मऋषि सेना, कुंवर सेना, सनलाइट सेना और रणबीर सेना के नाम लिए जा सकते हैं. इस तरह की सेनाओं को प्रशासन और सरकार का समर्थन प्राप्त था.”

वो बताते हैं कि बिहार में 1971 में पूर्णिया में 14 संथालों के मार डाला था और इस मामले में उस वक़्त बिहार विधानसभा के अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण सुधांशु को सज़ा हुई थी. इसके बाद बिहार में दर्जनों नरसंहार हुए और इस दौरान सैकड़ों लोग मारे गए.

इंसाफ में देरी

अब स्थितियां बेहतर हो रही हैं, लेकिन पटना के एनएन सिन्हा सामाजिक विज्ञान के निदेशक डीएम दिवाकर कहते हैं कि नरसंहार से जुड़े मामलों में इंसाफ़ मिलने में देरी दुर्भाग्यपूर्ण हैं.

वो कहते हैं, “चाहे मियांपुर नरसंहार हो, लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार हो या बथानी टोला का हो, इन सब मामलों में इंसाफ़ की प्रक्रिया जितनी लंबी खिंची उससे दलित का विश्वास टूटा है.”

लक्ष्मणपुर बाथे मामले में सभी अभियुक्तों को बरी किए जाने पर वो कहते हैं, “चौंकाने वाली बात ये लगती है कि 58 लोग मारे गए. और अदालत ने उन लोगों को दोषी नहीं पाया, तो फिर दोषी कौन है, इस बारे में अदालत चुप क्यों है. वहां के पुलिस तंत्र के ख़िलाफ़ अदालत ने फ़ैसला क्यों नहीं दिया. या फिर इस मामले में जांच को जारी रखने के लिए क्यों नहीं कहा गया.”

वो कहते हैं, “आज न्यापालिका की सक्रियता वाले दौर में क्या अदालत 58 दलितों की हत्या होने के मामले में सबूत न मिलने को स्वीकार कर सकती है?”

दिवाकर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को हवाला देते हुए कहते हैं कि अदालत को ग़रीबों तक पहुंचना अभी बाक़ी है.

नरसंहार के बाद विनोद को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिली. अब वो अपने बच्चों के भविष्य को उज्जवल बनाना चाहते हैं. बेहतर क़ानून व्यवस्था और जाति टकराव में गिरावट वो भी चाहते हैं.

लेकिन अतीत में मिले उनके ज़ख़्म शायद तब तक हरे रहेंगे जब तक इंसाफ़ नहीं मिलेगा.

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