एक शख्स जो बनाता है गौरैयों का आशियाना

चिरंजी लाल खन्ना
    • Author, रोहित घोष
    • पदनाम, कानपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

कानपुर में सुबह उठकर अगर आप चिड़ियों का चहचहाना सुनते हैं तो इसका श्रेय बहुत हद तक चिरंजी लाल खन्ना को जाता है.

70 वर्षीय चिरंजी लाल खन्ना पिछले 13 सालों से गौरैयों के लिए लकड़ी के छोटे-छोटे घोंसले बनाकर लोगों को मुफ़्त में बांट रहे हैं.

<documentLink href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2012/06/120623_maina_vk.shtml?bw=bb&mp=wm&bbcws=1&news=1" document-type="ms-audio"> (बस्तर की मैना)</documentLink>

गौरैयों की कम होती तादाद से चिंतित होकर कानपुर के आज़ाद नगर में रहने वाले चिरंजी लाल खन्ना ने साल 2001 में अपनी बैंक की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और अपना पूरा समय चिड़ियों के लिए घोंसला बनाने में ही लगाने लगे.

वह कहते हैं, "एक दिन अचानक मन में ख़्याल आया की गौरैयों की तादाद कम हो रही है. आपस में चर्चा की तो पता चला की उनके लिए घोंसला बनाने की जगह ही नहीं है."

उन्होंने बताया, "गौरैया एक ऐसी चिड़िया है जो लोगों के साथ रहती है. आप जंगल में गौरैया नहीं देखेंगे लेकिन अब मकान कंक्रीट के बन रहे हैं जिसमें गौरैया के घोंसले बनाने की कोई जगह नहीं होती. प्रदूषण बढ़ रहा है. खाने के तरीक़े बदल रहें हैं. अब हम सब पैकेट में ख़रीद के लाते हैं. छत पर अनाज नहीं फैलाते तो गौरैया खाएगीं क्या? इन सब की वजह से गौरैया कम हो रही थी."

अनुकूल परिणाम

चिरंजी लाल खन्ना का बनाया गौरैया का घोंसला

चिरंजी लाल खन्ना ने सोचा कि क्यों न गौरैया के लिए घोंसला बना के घरों में रखा जाए?

वह कहते हैं, "कुछ लकड़ी के घोंसले बनाकर अपने घर पर रखे. परिणाम अनुकूल मिला. गौरैया ने उन घोंसलों को अपना लिया. अंडे दिए. बच्चे हुए. प्रयोग सफल हुआ."

<documentLink href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2011/03/110324_bird_audio_sz.shtml" document-type="ms-audio"> (ग़ायब होती गौरैया)</documentLink>

अपने घर में प्रयोग सफल होते देख चिरंजी लाल खन्ना ने अपने दोस्तों को घोंसले दिए. दोस्तों के घरों में गौरैया पैदा हुई, पली और बड़ी हुई. यह देख उनके दोस्तों के दोस्तों ने चिरंजी लाल खन्ना से घोसलों की मांग की. कड़ी बढ़ने लगी.

अब तक चिरंजी लाल खन्ना क़रीब 600 लोगों को घोंसले दे चुके हैं.

चिरंजी लाल खन्ना उस व्यक्ति का नाम, टेलीफ़ोन नंबर और पता अपनी एक डायरी में लिख लेते हैं जो भी उनसे घोंसले की मांग करता है.

साक्षात्कार

चिरंजी लाल खन्ना का बनाया गौरैया का घोंसला

वह उनका साक्षात्कार करते हैं. इसके पीछे एक वजह है.

<link type="page"><caption> (मैना की कहानी)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/09/100902_mynah_extinct_sj.shtml" platform="highweb"/></link>

उन्होंने बताया, "साक्षात्कार के बाद अगर मुझे पता चले कि व्यक्ति को गौरैया से प्रेम नहीं है तो मैं उसे घोंसला नहीं देता हूँ. मैं घोंसले को बहुत ही ख़ूबसूरत बनाता हूँ. उनमें चटख़ रंग होता है. उसे आप घर में एक शो पीस की तरह रख सकतें हैं. कई व्यक्ति घोसलों को शो पीस की तरह लेने आते हैं. मुफ़्त में जो मिल रहा होता है. मैं उन्हें घोंसला नहीं देता हूँ."

वे कहते हैं कि उनकी इस मुहीम से गौरैयों की संख्या में अच्छी वृद्धि हुई है.

चिरंजी लाल खन्ना कहते हैं, "घोंसला देने के बाद मैं लोगों से पूछता हूँ कि गौरैयों ने बसेरा बसाया कि नहीं. अगर उनका जवाब न होता है तो मैं उनको सम्भावित कारण बताता हूँ."

उन्होंने अपने घर में क़रीब 20 घोंसले लगा रखे हैं. सभी में गौरैया का परिवार वास करता है.

मज़दूरी मुफ़्त

चिरंजी लाल खन्ना का बनाया गौरैया का घोंसला

अब दूसरी जगहों से भी चिरंजी लाल खन्ना के पास घोंसलों की मांग आ रही है.

<link type="page"><caption> (परिंदों ने आपकी ज़िंदगी को सुर दिए)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/03/130312_traffic_noise_songbirds_vr.shtml" platform="highweb"/></link>

उन्होंने बताया, "मुझे एक घोंसला बनाने में आठ घंटे का समय लगता है. लकड़ी की क़ीमत क़रीब 100 रुपए और मज़दूरी का ख़र्चा, वो तो मुफ़्त है, मैं ही करता हूँ."

कच्चे माल के तौर पर चिरंजी लाल खन्ना सेब की पेटियों को ख़रीदते हैं.

"हिमांचल प्रदेश और कश्मीर से जो सेब की पेटियां आती हैं वो घोंसला बनाने के लिए सबसे उपयुक्त हैं."

चिरंजी लाल खन्ना को उनके काम के लिए श्रेय तो मिल ही रहा है पर उन्हें इस बात की ख़ुशी ज़्यादा है कि उनके काम को उनकी आगे की पीढ़ी भी बढ़ा रही है.

कारवां बनता गया

चिरंजी लाल खन्ना का बनाया गौरैया का घोंसला

वह कहते हैं, "गौरैया हमारे साथ रहती है इसलिए हमें ही उनके लिए कुछ करना पड़ेगा."

<link type="page"><caption> (पंछियों के कलरव में तनाव)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2011/05/110509_birds_stress_us.shtml" platform="highweb"/></link>

उन्होंने कहा, "मैंने ये काम शुरू किया था तो पता नहीं था कि इतने लोग मेरे साथ जुड़ते चले जाएंगे. वे भी प्रबुद्ध वर्ग के लोग. वही बात है, 'मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर लोग साथ आते गए कारवां बनता गया."

चिरंजी लाल खन्ना ने कहा, "मेरे पास अब कॉलेज के बच्चे आते हैं और मुझ से घोंसला बनाने का हुनर सीखते हैं. वे दूसरी जगह जा कर घोंसला बनाते हैं और लोगों को बांटते हैं. ऐसा कर के वे गौरैयों की संख्या बढ़ा रहें है."

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