किस 'भ्रष्ट मीडिया' को जेल भेजना चाहते हैं केजरीवाल?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
अरविंद केजरीवाल ने जब आम आदमी पार्टी बनाकर अपना राजनीतिक करियर शुरू किया, तब एक साक्षात्कार में उन्होंने मुझसे कहा था, "पत्रकारों को अब तटस्थ नहीं रहना चाहिए. बल्कि उन्हें अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर ईमानदारी का साथ देना चाहिए."
भारतीय राजनीति में अरविंद केजरीवाल तेज़ी से उभरे और उनकी पार्टी एक साल में ही दिल्ली की सत्ता तक पहुँच गई. अरविंद के उदय को मीडिया का करिश्मा कहा गया और ख़ुद अरविंद ने भी कई मौक़ों पर मीडिया का आभार व्यक्त किया.
मगर पिछले कुछ दिनों से अरविंद केजरीवाल ने मीडिया के एक 'ख़ास हिस्से' पर खुलकर निशाना साधा है.
अरविंद आरोपों पर क़ायम
नागपुर में चुनिंदा लोगों के साथ एक प्रायोजित रात्रिभोज के दौरान केजरीवाल ने कहा, "पिछले एक साल से हमारे दिमाग में मोदी को भर दिया गया है. टीवी चैनलों को मोदी को प्रमोट करने के लिए भारी पैसा दिया गया है. मोदी की सच्चाई कोई चैनल नहीं बता रहा. यह एक बड़ी साज़िश है, बड़ी राजनीतिक साज़िश. अगर हमारी कभी सरकार बनी, तो हम इसकी जाँच कराएंगे और मीडिया वालों समेत सबको जेल भेजा जाएगा."
अरविंद के इस कथन को समूची मीडिया के ख़िलाफ़ लिया गया, लेकिन अरविंद ने स्पष्टीकरण दिया है कि वे मीडिया के 'भ्रष्ट हिस्से' के बारे में बात कर रहे थे.
बीबीसी से अरविंद केजरीवाल ने कहा, "मेरे कहने का मतलब यह है कि मीडिया के भ्रष्टाचार की जाँच कराकर भ्रष्ट मीडियाकर्मियों को जेल भेजा जाए. मीडिया का कुछ हिस्सा मोदी के दावों की सच्चाई सामने लाने के बजाय गुजरात के विकास के बारे में झूठ फ़ैला रहा है. यह अंबानी-अडानी से मोदी के संबंधों की जाँच नहीं कर रहा और न गुजरात में हुई किसानों की आत्महत्याएं इसके लिए मुद्दा हैं."
मधु त्रेहन, मीडिया विश्लेषक

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केजरीवाल की टिप्पणी पर मीडिया विश्लेषक मधु त्रेहन कहती हैं, "ऐसा बोलने से पहले वे थोड़ा सोच लेते, तो ठीक रहता. बाक़ी नेता भी कह रहे हैं कि हम इस मीडिया से निराश हैं. यह देश के लोकतंत्र के लिए बहुत ख़राब हैं."
त्रेहन कहती हैं, "जहाँ भी मीडिया का भ्रष्टाचार साबित हुआ हैं, वहाँ पत्रकारों को जेल हुई है. जी न्यूज़ के संपादक को जेल भेजा गया. यदि अरविंद किसी विशेष पत्रकार या संस्थान की बात करते, तो बेहतर होता. लेकिन वे तो सभी के बारे में बोल रहे थे. उन्हें पहले यह बताना चाहिए था कि वे किसके बारे में बात कर रहे हैं.. जिस तरह उन्होंने पहले दस्तावेज़ों के साथ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए वे पत्रकारों पर भी सबूतों के आधार पर ही आरोप लगाते. उनका बयान ग़ैर ज़िम्मेदाराना है."
मीडिया में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन्होंने, "अरविंद के आरोप कुछ संस्थानों के बारे में बिलकुल ठीक हैं. पेड न्यूज़ अब सच्चाई है. मालिक पत्रकारों और संपादकों को पेड न्यूज़ प्रकाशित करने का आदेश देते हैं और जो उनकी बात नहीं मानते उनके लिए काम करना मुश्किल हो जाता है. लेकिन मीडिया में ईमानदार लोग भी हैं. मेरी नज़र में ज़्यादातर पत्रकार ईमानदार हैं."
ओम थानवी, संपादक, जनसत्ता
जनसत्ता के संपादक ओम थानवी केजरीवाल की टिप्पणी को उनकी अनुभवहीनता मानते हैं.
थानवी कहते हैं, "केजरीवाल अनुभवी राजनेता नही हैं. दूसरे राजनेता अनुभवी हैं, इसलिए वे खुलकर बोलते नहीं हैं, लेकिन राजनेताओं और समाज में भी एक बड़ा समुदाय ऐसा है जो मानता है कि मीडिया का एक हिस्सा भ्रष्ट है. केजरीवाल की बातों में सच्चाई है. मीडिया को भी अपने अंदर झाँककर देखना चाहिए. एक संपादक सौ करोड़ की रिश्वत माँगने के मामले में जेल जा चुका है. पेड न्यूज़ मामले की जांच में साबित हो चुका है कि मीडिया ने भ्रष्ट आचरण किया. ऐसे में मीडिया में भ्रष्टाचार के आरोपों को नकारा नहीं जा सकता."
"केजरीवाल मीडिया पर आरोप लगा सकते हैं. लेकिन उनका कथन धमकी के रूप में नहीं आनी चाहिए थी. अगर वे अनुभवी होते, तो लचीले ढंग से अपनी बात कह सकते थे."
हालाँकि थानवी यह ज़रूर मानते हैं कि कि भ्रष्ट नेताओं और अफ़सरों की तरह ही भ्रष्ट पत्रकारों को भी जाँच में ग़लत पाए जाने पर जेल भेजा जाना चाहिए.
क्या समूची मीडिया को केजरीवाल के कथन को अपने ऊपर लेना चाहिए?

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ओम थानवी कहते हैं, "इस विवाद को केजरीवाल बनाम 'भ्रष्ट मीडिया' के रूप में ही देखा जाना चाहिए. अगर समूचा मीडिया केजरीवाल के स्पष्टीकरण के बाद भी इसे अपने ऊपर लेता है और मीडिया के बचाव में लग जाएगा तो मीडिया से रही-सही उम्मीद भी ख़त्म हो जाएगी."
विनोद शर्मा, राजनीतिक संपादक, हिंदुस्तान टाइम्स
हिंदुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा ने केजरीवाल के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा, "केजरीवाल ने जिस तरह यह प्रश्न खड़ा किया है और जो समाधान सुझाया है, उस पर मुझे आपत्ति है. यह सच है कि मीडिया में भ्रष्टाचार है, कुछ कमियाँ हैं. अरविंद ने कोई नई बात नहीं बताई है, लेकिन जो उन्होंने बोला है, वो सरासर धमकी है. मीडिया में भ्रष्टाचार के एक संजीदा मसले को उन्होंने बेहद ग़ैरसंजीदगी से उठाया है और चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की है."
विनोद शर्मा कहते हैं, "मीडिया पर व्यापक बहस की ज़रूरत है लेकिन अरविंद की टिप्पणी से यह ज़्यादा लगता है कि वे मीडिया पर अपनी निजी भड़ास निकाल रहे हैं. हाल के समय में ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें दिखाया गया है कि वे स्वयं अपने साक्षात्कार में हेरफेर की कोशिश करते हैं."
विनोद शर्मा को लगता है कि केजरीवाल की साख गिर रही है.
शर्मा कहते हैं, "केजरीवाल ग़लतियों पर ग़लतियाँ कर रहे हैं. उन्होंने कई मोर्चे एक साथ खोल दिए हैं. वे नेताओं पर आरोप लगा रहे हैं, कॉर्पोरेट पर आरोप लगा रहे हैं और अब मीडिया पर भी आरोप लगा रहे हैं. ऐसे में मीडिया के एक तबक़े में भी उनकी साख गिर रही है."
विनोद शर्मा मानते हैं कि मीडिया का बड़ा हिस्सा आज भी पूरी तरह स्वतंत्र हैं.
शर्मा कहते हैं, "केजरीवाल ने कुछ संस्थानों का नाम लेकर उन पर आरोप लगाए हैं. लेकिन केजरीवाल के आरोप और उनका विपरीत पक्ष टीवी चैनलों के ज़रिए ही जनता तक पहुँच रहा है जो साबित करता है कि मीडिया स्वतंत्र है."
सिद्धार्थ वर्दराजन, वरिष्ठ पत्रकार
वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वर्दराजन कहते हैं, "ये केजरीवाल की बेवकूफ़ी है. वे बिना किसी आधार के मीडिया को जेल भेजने की बात कर रहे हैं. उन्हें निजी बैठक में भी इतनी ग़ैरज़िम्मेदार बात नहीं करनी चाहिए थी."
वर्दराजन सवाल करते हैं, "क़ानून के किस प्रावधान के आधार पर वे पत्रकारों को जेल भेजने की बात कर रहे हैं. केजरीवाल को समझना चाहिए कि क़ानून के उल्लंघन और नैतिक उल्लंघन में फ़र्क होता है. ग़लत रिपोर्टिंग ज़ुर्म नहीं है बल्कि नैतिक उल्लंघन है. यदि कोई चैनल किसी का प्रचार कर रहा है या किसी को अधिक समय दे रहा है तो इसमें क़ानूनी हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं हैं. जनता स्वयं समझ जाएगी कि ये प्रोपेगेंडा है."
हालाँकि वर्दराजन यह ज़रूर मानते हैं कि इस समय ज़्यादातर चैनल केजरीवाल के ख़िलाफ़ हैं और अनैतिक रिपोर्टिंग भी हो रही है.
वे कहते हैं, "यह सच है कि मीडिया में मोदी और बीजेपी के समर्थन में झुकाव है. शुरू में आम आदमी पार्टी की सकारात्मक रिपोर्टिंग हुई थी, जिसका फ़ायदा भी पार्टी को मिला था, लेकिन अब ज़्यादातर चैनलों और अख़बारों की रिपोर्टिंग आप के ख़िलाफ़ नज़र आती है."
वर्दराजन केजरीवाल के कथन को मीडिया के लिए भी ख़तरा मानते हैं, "पत्रकारों की रिपोर्टिंग को क़ानूनी विषय बनाना देश के लिए ख़तरनाक होगा. इसका इस्तेमाल जायज़ आलोचना के ख़िलाफ़ भी किया जा सकता है."
क़मर वहीद नक़वी, संपादकीय निदेशक, इंडिया टीवी
इंडिया टीवी के संपादकीय निदेशक क़मर वहीद नक़वी केजरीवाल के कथन को पूरी तरह अनुचित मानते हुए उनसे सवाल करते हैं, "भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन के दौरान देश की बाक़ी सभी ख़बरों को नज़रअंदाज़ कर मीडिया ने दिन रात उन्हें दिखाया था. केजरीवाल बताएं कि तब कवरेज के लिए उन्होंने किस-किस संपादक को पैसे दिए? साक्षात्कार के दौरान एक पत्रकार को यह समझाना कि क्या पूछना चहिए और क्या नहीं पूछना चाहिए कौन सी ईमानदारी की बात थी?"
मीडिया में भ्रष्टाचार पर नक़वी कहते हैं, "अगर केजरीवाल को लगता है कि मीडिया में कहीं भ्रष्टाचार है, तो वे प्रेस काउंसिल या न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन से शिकायत कर सकते हैं. यदि उनके पास कोई सुबूत है, तो पेश कर सकते हैं. लेकिन वे किसी को धमका नहीं सकते. डरा नहीं सकते."
मीडिया पर नकारात्मक रिपोर्टिंग के आरोपों पर नक़वी कहते हैं, "केजरीवाल के बारे में पहली नकारात्मक रिपोर्ट दिल्ली में बंगला लेने के मामले से शुरू हुई थी. इसके बाद सोमनाथ भारती प्रकरण और केजरीवाल के धरने की मीडिया में आलोचना हुई. कई मुद्दों पर मीडिया ने केजरीवाल के झूठ को एक्सपोज़ किया. यदि मीडिया ऐसा न करता, तो केजरीवाल के लिए मीडिया देशभक्त, ईमानदार और निष्पक्ष बना रहता. मीडिया के बारे में केजरीवाल के विचार निंदनीय हैं. बेहतर होता केजरीवाल सबूतों के आधार पर अपनी बात साबित करते न कि इस तरह का बयान देते."
नक़वी कहते हैं, "आप के नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस में पहले इंडिया टीवी का नाम लिया और फिर बाद में माफ़ी माँग ली. यह दर्शाता है कि वे स्वयं अपने आरोपों को लेकर कितने संवेदनहीन हैं."
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