कानपुर में रंग उड़ते हैं हफ़्ते भर

इमेज स्रोत, ROHIT GHOSH
- Author, रोहित घोष
- पदनाम, कानपुर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
मथुरा या वृंदावन में होलिका दहन से काफी पहले ही रंगों से खेलना शुरू हो जाता है, लेकिन कानपुर में ठीक इसका विपरीत होता है.
होली दहन की ठीक अगले दिन धुलेंडी होती है. कानपुर में धुलेंडी से रंग खेलने का जो सिलसिला शुरू होता है वह करीब एक हफ़्ते तक चलता है.
एक हफ़्ता होली खेलने के बाद, अनुराधा नक्षत्र के दिन कानपुर के लोग सरसैया घाट पर जा के गंगा में नहाते हैं और अपना रंग छुड़ाते हैं. गंगा मेला होता है, उसके अगले दिन फिर से बाज़ार खुलते हैं.
धुलेंडी से करीब एक दिन बाद तक कानपुर के मुख्य बाज़ार पूरी तरह से बंद हो जाते हैं.
नवीन मार्किट और बड़ा चौराहा को आज कानपुर का हृदय माना जाता है, लेकिन एक समय में आज़ादी से पहले हटिया बाज़ार कानपुर का केंद्र हुआ करता था.
होली पर गिरफ़्तारी
हटिया और कानपुर के बारे एक जुमला बहुत मशहूर था - हटिया खुला, बजाजा बंद (कानपुर का कपडा बाज़ार), झड़े रहो कलक्टरगंज.
सार यह था कि चाहे कुछ भी हो जाए हटिया बाज़ार खुला ही रहता था.

इमेज स्रोत, ROHIT GHOSH
कानपुर में अपने कॉलेज के दिन बिता चुके पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी यहां आने पर अपने भाषण में अपने लहज़े में चटखारा ले के इस जुमले को ज़रूर कहा करते थे.
सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारणों के कारण कानपुर में एक ऐसा समय आया कि हटिया बाज़ार भी बंद होने लगा.
कानपुर के इतिहास के जानकार 65 वर्षीय मनोज कपूर बताते हैं, "कानपुर में होली होलिका दहन के अगले दिन शुरू होती है और अनुराधा नक्षत्र के दिन तक चलती है. इसके पीछे कानपुर के सामाजिक और आर्थिक कारण आते हैं. कानपुर मज़दूरों का शहर था, बाज़ार खुलने या बंद होने का समय निर्धारण नहीं था, साप्ताहिक अवकाश का कोई प्रावधान नहीं था."

इमेज स्रोत, ROHIT GHOSH
वो कहते हैं, "सवेरे से शाम तक मज़दूरों को काम करना पड़ता था कोई छुट्टी नहीं मिलती थी. मजदूर ज़्यादतर कानपुर से बाहर के निवासी होते थे. मज़दूर होली में अपने घर जाने लगे. कानपुर के बाज़ार बंद होने लगे."
वह कहते हैं, ""बाज़ार बंद होने का जो सिलसिला तब शुरू हुआ आज भी चलता चला आ रहा है. अब कानपुर के सभी पुराने बाज़ार बंद हो जाते हैं- जैसे हटिया, नया गंज, कलक्टरगंज, टोपी बाज़ार, लाठी मोहाल."
यह तो हो गया सामाजिक और आर्थिक कारण. ऐतिहासिक कारण क्या था?

इमेज स्रोत, ROHIT GHOSH
78 वर्षीय मूलचंद सेठ कहते हैं, "आज़ादी से पहले हटिया शहर का हृदय हुआ करता था. मेरे पिता गुलाब चंद हटिया के एक बड़े व्यापारी थे. हम लोगों के घर पर होली बहुत धूमधाम से मनाई जाती थी. साल मुझे याद नहीं पर एक बार अंग्रेजों को पता चला कि हटिया में हुड़दंग हो रहा है और वह घोड़े पर सवार होकर आ गए और काफ़ी लोगों को गिरफ़्तार कर लिया."
वो बताते हैं, "गिरफ़्तारी की बात जब फैली तो उसमें आज़ादी के दीवाने जुड़ते चले गए. आखिरकार अंग्रेजों ने जिस दिन भारतीयों को छोड़ा वो अनुराधा नक्षत्र वाला दिन था. एक परंपरा बन गयी कि धुलेंडी से अनुराधा नक्षत्र वाले दिन तक होली खेली जाने लगी."
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi " platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












