नेता बनने के धुन में झारखंड के आईएएस-आईपीएस

- Author, नीरज सिन्हा
- पदनाम, रांची से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
झारखंड में भी भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को अब नेता बनना भाने लगा है. ये अधिकारी नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ने के लिए अलग-अलग राजनीतिक दलों में शामिल भी हो रहे हैं.
हाल ही में तीन आईपीएस अधिकारियों के चुनावी राजनीति में सक्रिय होने के बाद राज्य की राजनीति में क़यास लगाए जा रहे हैं कि अगली बारी किसकी है.
हालांकि इन अधिकारियों के उम्मीदवारी की घोषणा अभी बाक़ी है.
आईपीएस अधिकारियों के अलावा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का राजनीतिक दलों में शामिल होने का सिलसिला भी जारी है.
आइपीएस
सोमवार को आईएएस विनोद किसपोट्टा कांग्रेस में शामिल हो गए. राजनीति में आने के लिए उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ली है.
पिछले महीने सेवानिवृत आईएएस अधिकारी मुख़्तयार सिंह भाजपा में शामिल हुए हैं.
आईएएस विमल कीर्ति सिंह के स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने पर भी अटकलों का दौर जारी है. वैसे अभी तक उनकी ओर से ऐसा कोई बयान नहीं आया है.

अमिताभ चौधरी राज्य के अपर पुलिस महानिदेशक के पद पर कार्यरत थे. उन्होंने नौकरी छोड़ दी है. पिछले हफ़्ते वे पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा में शामिल हुए हैं. वे रांची लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे हैं.
इस बीच पंजाब कैडर के आईपीएस अधिकारी अरूण उरांव ने भी नौकरी छोड़ने का आवेदन राज्य सरकार को दे दिया है. हाल तक वे झारखंड में आईजी के पद पर थे.
उनके पिता बंदी उरांव, ससुर कार्तिक उरांव व सास सुमति उरांव भी झारखंड में आदिवासियों के बड़े नेता रहे हैं.
पत्नी गीताश्री उरांव वर्तमान में झारखंड सरकार में मंत्री हैं.
भाजपा में दिलचस्पी
अरूण उरांव भाजपा के टिकट पर लोहरदग्गा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहते हैं.
पिता, सास-ससुर और पत्नी कांग्रेस से जुड़े रहे हैं तो अरूण उरांव भाजपा से चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं? इस सवाल पर अरूण कहते हैं कि ये उनका व्यक्तिगत फ़ैसला है और अपनी विचारधारा है.
वे बताते हैं कि घर के लोगों को भी इस फ़ैसले पर आपत्ति नहीं है.
सार्वजनिक जीवन में कितना समन्वय बना पाएंगे, यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "मेरे पिता बंदी उरांव भी आईपीएस की नौकरी छोड़ राजनीति में आए थे. राजनीति में उन्होंने काफ़ी लोकप्रियता भी हासिल की."
अरूण उरांव ने माना कि उन्हें भी इस बात पर भरोसा है कि वे राजनीति मे रहकर जवाबदेह भूमिका निभा सकेंगे.

नौकरशाही की राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी पर वे कहते हैं, "प्रोफ़ेशनल्स को राजनीति में आना चाहिए."
अपना- अपना एजेंडा
इनसे पहले पूर्व डीजीपी भी चुनावी मैदान में आ गए हैं. राज्य के पुलिस महानिदेशक रहे बीडी राम भाजपा में शामिल हो चुके हैं.
वे लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं.
राजनीति में प्रवेश के सवाल पर वे कहते हैं, "देखिए, नौकरीशाही के भीतर राजनीति की ख़ामियों की बातें होती हैं. वे समझते हैं कि राजनीति में भागीदार बनकर चीज़ों को बदलने की कोशिशें करनी चाहिए."
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रजत कुमार गुप्ता कहते हैं, "राजनीतिक दलों में नेतृत्व कमज़ोर होने का नतीजा है कि आला अधिकारी पद और छवि के बूते पार्टियों में ऊंची जगह पा रहे हैं. अंतत: यह राजनीतिक दलों को कमज़ोर करता है."
वे आगे कहते हैं, "इनसे क्या झारखंड की राजनीति में कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे, इस सवाल पर गुप्ता कहते हैं, क़त्तई नहीं, सबका अपना- अपना एजेंडा है."
राजनीति में अधिकारी
आजसू पार्टी के वरिष्ठ विधायक पूर्व मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी का मानना है कि चुनाव के ज़रिए राजनीति में प्रवेश यह ज़ाहिर करता है कि अधिकारी मौक़ा देखकर ये राह चुनते हैं. वर्षों तक तपे-तपाए जनप्रतिनिधि का वे विकल्प नहीं बन सकते.
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत कहते हैं कि लंबे समय तक नौकरी करने या रिटायरमेंट के बाद अधिकारियों का राजनीति में आना सुनियोजित होता है.
नौकरशाहों का राजनीति में प्रवेश के मुद्दे पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र राय का कहना है कि सरकारी सेवकों के राजनीति में प्रवेश का मतलब है कि उन्हें भी लोकतांत्रिक ताक़तों का अहसास है.

झारखंड में सबसे पहले साल 2004 में डॉ रामेश्वर उरांव भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी छोड़कर लोहरदग्गा से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीते थे. 2009 में वे चुनाव हार गए.
साल 2009 में ही कोडरमा लोकसभा क्षेत्र से बसपा के टिकट पर आईएएस अधिकारी सभापति कुशवाहा चुनाव लड़े थे, लेकिन वे भी हार गए थे.
इसके बाद भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे डॉ अजय कुमार झारखंड विकास मोर्चा के टिकट पर 2010 में जमशेदपुर लोकसभा उपचुनाव जीता.
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