छत्तीसगढ़ः 70 फ़ीसदी धान के सड़ने का ख़तरा

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
छत्तीसगढ़ में बेमौसम बारिश की वजह से सरकार ने जो धान खरीदा था उसके बड़ी मात्रा में खराब होने की आशंका है.
सरकार हर साल किसानों से समर्थन मूल्य पर धान खरीदती रही है, लेकिन धान रखने के लिए इंतज़ाम नहीं होने की वजह से उसे महीनों तक खुले मैदान में रखा जाता है.
पिछले एक सप्ताह से राज्य भर में हो रही बारिश के कारण अधिकांश जगहों पर खुले में रखा धान भीग रहा है.
विपक्षी दल कांग्रेस का आरोप है कि राज्य सरकार ने जानबूझ कर धान को भीगने के लिए छोड़ दिया है. इसके पीछे कांग्रेस ने करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है.
लेकिन राज्य सरकार ने धान भीगने की ख़बरों को सिरे से नकार दिया है.
छत्तीसगढ़ में सरकार ने इस साल 15 फरवरी तक रिकॉर्ड 80 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा है. इसके लिए किसानों को अब तक करीब 10,000 करोड़ रुपए का भुगतान भी किया गया है.
किसानों से खरीदे गए धान को राज्य के 1,971 धान उपार्जन केंद्रों में रखा गया था.
बेमौसम बरसात

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धान खरीद के पखवाड़े भर के भीतर राज्य भर में बेमौसम बारिश का सिलसिला शुरू हो गया. बारिश और ओले के कारण खुले मैदान में बोरियों में भर कर रखा गया धान भीग गया.
कुछ इलाकों में तो धान की बोरियों को तालपत्र से ढकने की कोशिश की गई लेकिन हर जगह ऐसा संभव नहीं हो सका.
राज्य के मुख्य सचिव विवेक ढांड ने हर ज़िले में धान भीगने की ख़बरों के बाद आदेश जारी किया कि जिन सहकारी समितियों के प्रबंधकों की लापरवाही की वजह से धान बारिश में भीगकर खराब हुआ है, उन प्रबंधकों को बर्खास्त करने की कार्रवाई शुरू की जाए.
हालांकि राज्य भर में कुल कितना धान भीगा है, इसका आकलन अभी तक सरकार नहीं कर पाई है.
कांग्रेस के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला का कहना है कि संग्रहण केंद्रों और खरीद केंद्रों में खुले में पड़ा धान अंकुरित हो गया है, धान के अंकुर बोरियों से बाहर निकल चुके हैं.
वह कहते हैं, “धान संग्रहण केंद्रों में रखे गए धान के बोरे की छल्लियों में पानी भरा हुआ है जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं की गई है. फटे हुए कैप कवर और तिरपाल सिर्फ खानापूर्ति के लिए लगाए गए हैं. आधे से अधिक छल्लियों में तो कैप कवर और तिरपाल लगाए ही नहीं गए हैं.”
विपक्ष का आरोप

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प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और विधायक भूपेश बघेल धान भीगने को सरकार का षड्यंत्र क़रार देते हैं. उनका आरोप है कि इस साल राज्य में धान की उपज 25 प्रतिशत तक कम हुई है लेकिन राज्य सरकार की खरीद के रिकॉर्ड में धान की पैदावार बढ़ी है.
बघेल का आरोप है कि पिछले वर्ष 75 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद की गई थी. उपज में 25 प्रतिशत की कमी के आधार पर देखा जाए तो इस वर्ष राज्य में धान की पैदावार मात्र 56.25 लाख टन ही हुई है, जबकि भाजपा सरकार दावा कर रही है कि उसने 80 लाख टन धान खरीदा है.
बघेल कहते हैं, “सरकार ने 23.75 लाख टन धान की खरीद मात्र कागज़ों में की है, जिसका मूल्य 1,320 रूपए प्रति क्विंटल के हिसाब से 31,350 करोड़ रुपए होता है. इसी घोटालेबाज़ी और फ़र्ज़ीवाड़े को छिपाने के लिए धान को असुरक्षित तरीके से खुले में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया ताकि धान के खराब होने के बहाने इस घपले पर पर्दा डाला जा सके.”
लेकिन राज्य के सहकारिता और खाद्य मंत्री पुन्नूलाल मोहले सिरे से धान भीगने की बात को नकार रहे हैं. मोहले का कहना है कि राज्य में कहीं से भी धान भीगने की ख़बर उनके पास नहीं आई है.
अंकुरित धान
वह कहते हैं, “कहीं भी धान अंकुरित नहीं हुआ है. हमारे पास तो ऐसी ख़बर नहीं आई है. जहां धान भीगा है, वहां मौसम खुलेगा, धूप निकलेगी तो धान भी सूख जाएगा.”
रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉक्टर एसएस शॉ का कहना है कि धान के बीजों में अगर अंकुरण आ जाए तो उसका खाद्यान के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
वह कहते हैं, “अंकुरण होने के बाद न तो उसका चावल बन सकता है और न ही उसका खाद्यान के रूप में कोई और उपयोग संभव है. उसे अगर चाहें तो खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.”
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