लोकपाल की ट्रॉफ़ी के लिए होड़

राहुल गांधी

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    • Author, डॉक्टर सतीश मिश्रा
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, सीनियर फ़ैलो, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फॉउंडेशन

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश केटी थॉमस के लोकपाल के गठन के लिए बनाई जाने वाली सर्च कमिटी का प्रमुख बनने से मना करने के बाद इस ऐतिहासिक क़दम का संभावित श्रेय लेने के लिए यूपीए सरकार की कोशिशों को एक और झटका लगा है.

थॉमस ने अपने बयान में कहा, "मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि जब चयन समिति लोकपाल के सदस्यों का चुनाव कर सकती है तो एक सर्च पैनल की ज़रूरत क्या है. चूँकि सर्च कमेटी के सुझाव पर अमल करने के लिए चयन समिति बाध्य नहीं है इसलिए सर्च कमेटी जो काम करेगी वही काम चयन समिति कर सकती है."

सरकार को लिखे अपने पत्र में थॉमस ने कहा कि चयन समिति का काम केवल कार्मिक विभाग की दी गई सूची में नाम चुनने का है. वह स्वतंत्र रूप से नामों का चयन नहीं कर सकती.

भारत सरकार के कार्मिक विभाग ने <link type="page"><caption> लोकपाल</caption><url href="131218_lokpal_law_parliament_loksabha_adg" platform="highweb"/></link> में नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे थे. जो नाम आए हैं उनमें से चयन समिति अंतिम नाम चुनेगी. इस तरह से आवेदन मंगाने का काफ़ी विरोध हुआ ख़ासकर क़ानूनी हलक़ों में.

विरोध

पिछले हफ़्ते जाने-माने न्यायविद् फ़ाली नारीमन ने भी इस पैनल का अंग बनने से मना कर दिया था. उन्होंने कहा था कि वर्तमान चयन प्रक्रिया के तहत 'सबसे योग्य, सबसे स्वतंत्र और सबसे साहसी' लोगों को नहीं चुना जा सकता.

अन्ना हज़ारे

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21 फ़रवरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकपाल चयन समिति की अध्यक्षता करते हुए इस सर्च कमेटी के नामों की घोषणा की.

इस कमेटी में थॉमस और नारीमन के अलावा पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई क़ुरैशी, एलएसआर कॉलेज की प्रधानाचार्य मीनाक्षी गोपीनाथ, शिक्षाविद मृणाल मिरि, आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव काकी माधव राव और राज्य सभा सांसद एच के दुआ के नाम हैं.

इससे पहले लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने प्रख्यात वकील पी पी राव को चयन समिति में रखे जाने पर आपत्ति जताई थी. सुषमा ने राव के कांग्रेस के क़रीबी होने का तर्क दिया था.

राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली भी लगातार इसकी प्रक्रिया पर सवाल उठाते रहे हैं.

राष्ट्रपति की मंज़ूरी

संसद के शीतकालीन सत्र में संसद के दोनों सदनों में लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक के पारित होने के बाद राष्ट्रपति ने इसे मंज़ूरी दे दी.

अगर इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो लगता है कि इसके मूल में राजनीति है और यह खेल अपने को सबका अगुआ दिखाने का है.

विभिन्न सरकारों ने भ्रष्टाचार दूर करने के लिए लोकपाल विधेयक लाने की कोशिशें की थीं लेकिन 18 दिसंबर, 2013 से पहले कोई भी सरकार इसमें किसी न किसी कारण से सफल नहीं हो सकी थी.

अरुण जेटली

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लोकपाल का मसला सार्वजनिक बहस में पिछले चार दशकों से है, लेकिन यह सुर्ख़ियों में तब आया जब साल 2010 में अन्ना हज़ारे के नेतृत्व ने सिविल सोसाइटी ने आंदोलन किया.

यह भी सच है कि जब तक यह विधेयक पारित नहीं हुआ था तब तक विपक्ष को इसकी जल्दी थी और सरकार इसे पारित करने में कोई ख़ास तेज़ी नहीं दिखा रही थी.

राजनीतिक दंगल का शिकार

सिविल सोसाइटी के आंदोलन और आम आदमी पार्टी के दबाव के कारण ही कांग्रेस और भाजपा के बीच इस एक विधेयक को संसद में पारित कराने के लिए एक अघोषित सहमति बनी और यह पारित हो भी गया.

लेकिन इसके बाद राजनीतिक रस्साकशी ने पूरे मामले में अपना असर दिखाया.

कांग्रेस चाहती है कि वो देश को लोकपाल देने का श्रेय ले तो भाजपा नहीं चाहती कि लोकपाल की ट्रॉफ़ी कांग्रेस ले उड़े. भाजपा को उम्मीद है कि केंद्र में अगली सरकार भाजपा की होगी.

इसलिए अभी जिस तरह के विवाद उठ रहे हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि लोकपाल के गठन के लिए कुछ और महीनों तक इंतज़ार करना होगा क्योंकि कांग्रेस के लिए लोकपाल के गठन की राह आसान नहीं है.

शायद नियति ने लोकपाल के गठन का काम आगामी सरकार के लिए तय कर रखा है. फिलहाल तो यह विधेयक राजनीतिक दंगल का शिकार हो कर रह गया है.

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