जिन्होंने साल 2000 में मैच-फ़िक्सिंग केस सुलझाया

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
क्रिकेट के खेल में पिछले दो दशक के दौरान मैच-फ़िक्सिंग के तमाम मामले उठते रहे हैं.
लेकिन भारतीय और विश्व क्रिकेट के इतिहास में साल 2000 में मैच-फ़िक्सिंग के मामलों का जो साया मंडराया वो अविश्वसनीय था.
दक्षिण अफ़्रीक़ा के कप्तान हैंसी क्रोनिए ने इसमें 'लिप्त' होने की बात स्वीकार की और कई सटोरियों और सट्टेबाज़ों के बारे में जांचकर्ताओं को कुछ जानकारी भी दी.
इसके बाद भारत की ओर से हुई जांच में केंद्रीय जांच ब्यूरो की एक टीम गठित की गई थी जिसने भारतीय क्रिकेट में मैच-फ़िक्सिंग के आरोपों की विस्तृत छान-बीन की.
सीबीआई के इस तीन सदस्यीय जांच दल का एक अहम हिस्सा थे तब पुलिस निरीक्षक रहे एमए गणपति जिन्होंने लगभग 14 साल बाद पहली बार बीबीसी हिंदी से खुल कर बात की.
उन्होंने बताया, "शुरुआत में हमारे पास कोई भी ठोस सुबूत नहीं था. समय भी कम था क्योंकि मीडिया और पब्लिक की तरफ़ से दबाव था. हमने सबसे पहले बुकीज़ और पन्टर्स को भारत भर में तलाशना शुरू किया, उनके फ़ोन टैप करने शुरू किए. इसमें सिर्फ़ खेल तक के बुकी सीमित नहीं थे."

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वो आगे बताते हैं, "फिर हमने भारतीय क्रिकेटरों के फ़ोन वग़ैरह की पड़ताल शुरू की. पता चला कि कुछ के कनेक्शन साफ़ दिख रहे हैं. इसके बाद हमें कुछ दस्तावेज़ भी मिले और हमने आयकर विभाग की बहुत मदद ली. क्योंकि मामले में एक क़ानून न होने की वजह से केस तो दर्ज नहीं हुआ था."
कम समय
एमए गणपति इन दिनों भारत सरकार के गृह मंत्रालय में बतौर संयुक्त सचिव कार्यरत हैं.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से हुई बात में स्वीकार किया कि उनके पास वर्ष 2000 में जांच करने का समय बहुत कम था. उन्होंने कहा, "जिन खिलाड़ियों का आपने नाम लिया उन में से कुछ ने फ़िक्सिंग में अपने रोल को स्वीकार किया था. जिन्होंने इनकार किया था उनके ख़िलाफ़ भी हमारे पास पुख़्ता सुबूत थे. हां, ये सभी बड़े खिलाड़ी थे, हीरो थे, लेकिन जब हमने सबूत उनके सामने रखे उन्हें मानना ही पड़ा."
सीबीआई ने बहुत कम समय में हुई इस जांच के बाद 162 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को सौंपी थी.

इस जांच के आधार पर तत्कालीन भारतीय क्रिकेट कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन और अजय शर्मा पर आजीवन प्रतिबंध लगाया गया था.
टीम के उप-कप्तान अजय जडेजा और मनोज प्रभाकर पर पांच-पांच साल तक क्रिकेट न खेलने का प्रतिबंध लगाया गया जबकि टीम के फ़िज़ियो अली ईरानी पर भी प्रतिबंध लगा था. एक लंबे समय तक क्रिकेट कवर करने वाले पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन को तो लगता है कि जब मैच-फ़िक्सिंग का मामला सामने आया उससे कुछ साल पहले ही उन्हें इसकी सुगबुहाहट मिल रही थी.
उन्होंने बताया, "1996 में जब भारत कलकत्ता में विश्व कप सेमीफ़ाइनल हारा था तब भी पत्रकारों में इस तरह की बात उठी थी. उसके बाद इसी माहौल में मैं साल 1997 में वेस्टइंडीज़ दौरे पर टीम के साथ गया. वहां मुझे एक व्यक्ति मिला जिसने पहले तो बताया कि वो एक फ़ैन है भारत से आया है. हालांकि बाद में खुलने पर उसने बताया कि वो एक बुकी (सट्टेबाज़) है. बाद में उसने मुझसे कहा कि अगर आप मुझे टीम और पिच की जानकारी देंगे तो मैं आपको बहुत सारे पैसे दूंगा. बाद में उसने मुझसे कहा कि अगर मैं उसे कप्तान अज़हर से और दूसरे खिलाड़ियों से मिलवा दूं तो मुझे दिल्ली में फ़्लैट तक दे देगा".
अज़हर की सफ़ाई

उन्होंने कहा, "मैंने तत्कालीन कप्तान सचिन तेंदुलकर से मिलकर उन्हें ये बातें बताई और उन्होंने ऑफ़ द रिकॉर्ड बताया कि उन्होंने भी ऐसा सुना है. उन्होंने मुझे सलाह दी कि आप स्टोरी करने के बजाय उस व्यक्ति का अता-पता पुलिस को दे दीजिए." उन्होंने बताया, "देखिए इससे पहले कि हैंसी क्रोनिए भारत के उस बड़े खिलाड़ी का नाम भी लेते जिसने उन्हें एक बुकी से मिलवाया था, एक दिन पहले ही अज़हरुद्दीन ने सफ़ाई दे डाली की उनका मामले से कोई लेना-देना नहीं है.” बहरहाल एमए गणपति से मैंने बहुत ज़ोर देकर जानना चाहा कि आख़िर जिन खिलाड़ियों पर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने प्रतिबंध लगाया था उन्होंने बुकीज़ या सटोरियों से किस तरह के फ़ायदे लिए थे?
उनका जवाब था, "देखिए आज के दौर से तुलना करें तो ग़लत होगा۔ लेकिन उस दौर में भी पैसा काफ़ी था और साथ में कभी-कभी होटल वग़ैरह में रुकाया जाना भी बड़ी बात होती थी और हमें इसी तरह के प्रमाण मिले थे."
क्रिकेट में मैच-फ़िक्सिंग की अगली कड़ी में हम आपको बताएंगे कि क्या इसकी रोकथाम के लिए कोई ठोस क़ानून न होना परेशानी का सबब है?
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