अरबों डॉलर भेजने वालों की लाशों पर 'भारत में ख़ामोशी'

कतर में अप्रवासी मजदूरों की मुश्किलें

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    • Author, शकील अख़्तर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, दिल्ली

खाड़ी देशों में काम करने वाले लोगों को कई तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है. निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले ज्यादातर मज़दूर तो अक्सर अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं.

लेकिन दक्षिण एशियाई देशों की हालत ख़ुद इतनी ख़राब रही कि रोजी-रोटी की मजबूरी में इन देशों के लाखों मज़दूर, कारीगर और शिक्षित लोग अरब देशों में हर तरह की कठिनाइयों और बंदिशों का सामना करने के बावजूद वहाँ काम करते रहे हैं.

भारत के लाखों नागरिक सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ओमान और क़तर में वर्षों से अपने हुनर और अपनी मेहनत से इन देशों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

यूँ तो भारतीय दुनिया के लगभग सभी देशों में फैले हैं. विदेशों में बसे और काम करने वाले भारतीयों की संख्या इस समय तकरीबन ढाई करोड़ है.

पिछले तीन वर्षों में विदेशों में बसे इन भारतीयों ने अपनी मेहनत और परिश्रम की कमाई से लगभग 190 अरब डॉलर की रकम भारत भेजी है. इसमें से 80 अरब डॉलर केवल खाड़ी देशों से आया.

यह उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष बाहर काम करने वाले भारतीयों की तरफ से भेजी जाने वाली रकम 75 अरब डॉलर पार कर जाएगी.

इसमें सबसे बड़ा हिस्सा उन भारतीय निवासियों का होगा जो अरब देशों में काम कर रहे हैं. पिछले दिनों ब्रिटेन के अखबार 'द गार्डियन' ने यह ख़बर प्रकाशित की थी कि जनवरी 2012 से क़तर के निर्माण क्षेत्र में काम कर रहे भारत के 500 से अधिक मज़दूर मारे गए हैं.

मौत की वजह

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इस साल जनवरी में 24 मज़दूर मौत का शिकार हो चुके हैं. क़तर की सरकार और कंपनियों ख़ामोश हैं. भारत के विदेश मंत्रालय का कहना है कि पिछले चार साल में जो एक हज़ार मौतें हुई हैं, इसमें कोई असामान्य बात नहीं है और ज्यादातर मौतें स्वाभाविक कारणों से हुई हैं.

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंनटरनेशनल ने भारत सरकार से ज़ोर देकर कहा है कि वो इन मौतों को स्वाभाविक मौत करार देने की बजाय यह जानकारी मुहैया कराए कि ये मौतें काम करने के स्थान पर हुई हैं या लेबर कैंप में अमानवीय परिस्थितियों के कारण, सड़क हादसों में या फिर प्राकृतिक कारणों से हुईं है.

भारतीय नागरिकों के साथ साथ क़तर में साल 2013 में 185 नेपाली नागरिक भी मारे गए थे.

उनकी मौत के कारणों की पड़ताल से पता चला है कि उनमें से दो तिहाई श्रमिक अचानक हार्ट अटैक या काम के स्थान पर मारे गए.

नेपाली नागरिकों की मौत की ख़बर सामने आने के बाद क़तर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना हुई थी और इस पर जोर दिया गया था कि वे श्रम कानूनों के अंतर्राष्ट्रीय मानकों का पालन करें और काम करने की स्थिति मानवीय बनाएं.

क़तर में साल 2022 के फुटबॉल विश्व कप के लिए बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा है.

क़तर की कंपनियां इन मज़दूरों को सीधे भर्ती करने की बजाय अलग-अलग एजेंसियों के माध्यम से उनकी भर्ती करती हैं. किसी दुर्घटना की स्थिति में क़तर की ये कंपनियां हर तरह की जिम्मेदारी से बची रहती हैं.

क़तर की सरकार

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अकसर भर्ती करने वाली कंपनियां इसे प्राकृतिक मौत बताकर किसी मुआवज़े के बग़ैर इनकी लाशों को उनके परिवारजनों को सौंप देती हैं.

ग़म के माहौल में लाश सौंपने से पहले एक 'नो-आब्जेक्शन सर्टीफ़िकेट' भी परिवारजनों से लिया जाता है ताकि वह क़ानूनी कार्रवाई न कर सकें. पिछले चार साल से क़तर की सरकार हर महीने औसतन बीस लाशें भारत भेज रही हैं.

उन्हें कुदरती मौत का प्रमाणपत्र देने वाली भारत सरकार ने पिछले पांच सालों में शायद ही कभी किसी मामले में क़तर की सरकार से जवाब तलब किया हो.

प्रभावित लोग कहते हैं कि समझ में नहीं आता कि भारतीय दूतावास भारतीयों की मदद के लिए है या क़तर की सरकार की हाँ में हाँ मिलाने के लिए है.

क़तर से हर महीने बीस लाश भारत आते रहने के बावजूद ये सवाल न कभी संसद में उठा और न कभी ये ख़बर भारतीय अख़बारों में छपी और न कभी टीवी चैनलों पर इसका कोई जिक्र तक हुआ.

पिछले दिनों जब एक भारतीय राजनयिक को अपनी नौकरानी को निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी के आधे वेतन देने और वीजा फॉर्म में गलत जानकारी देने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था तो भारत के टीवी चैनलों पर पंद्रह दिनों तक इस ख़बर पर बहस होती रही लेकिन एक हज़ार मज़दूरों की मौत पर पूरा भारत ख़ामोश है.

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