कश्मीर: मीडिया अपनी 'औक़ात' जानती है

कश्मीर में पुलिस पेट्रोलिंग

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    • Author, बशीर मंज़र
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

रिपोर्टर्स विदआउट बार्डर ने 2014 के वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम सूचकांक में भारत को 140वां स्थान दिया है.

इस रिपोर्ट में कश्मीर और छत्तीसगढ़ का ख़ासतौर से ज़िक्र किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक़ इन दोनों स्थानों पर हिंसा और 'सेंसरशिप' अभी भी बनी हुई है.

कश्मीर में मीडिया की हालत पर सरसरी निगाह डालने से ये साफ़ हो जाता है कि यहां मीडियाकर्मियों के लिए हालात काफ़ी मुश्किल हैं.

बीते दो दशक से अधिक समय के दौरान ज्ञात या अज्ञात बलों के हाथों 10 मीडियाकर्मी मारे जा चुके हैं. पत्रकारों को गिरफ़्तारी, अपहरण और अपमान का सामना करना पड़ता है और राजनीतिक संकट की स्थिति में उन्हें पुलिस और सुरक्षा बलों के हाथों मार भी सहनी पड़ती है.

हालांकि पिछले कुछ सालों के दौरान हालात सुधरे हैं और ऐसा लगता है कि मीडियाकर्मियों को किसी ख़तरे का सामना नहीं करना पड़ रहा है, लेकिन इसका ये अर्थ नहीं है कि कश्मीर में मीडिया वास्तव में आज़ाद है.

मीडिया की सीमा

श्रीनगर से प्रकाशित दैनिक उर्दू समाचार पत्र उक़ाब के संपादक मंज़ूर अंजुम कहते हैं, "बाहर से देखने पर कश्मीर में मीडिया आज़ाद लगता है लेकिन गहराई में जाने पर आपको एक अलग ही कहानी दिखाई देगी."

उर्दू समाचार पत्र उक़ाब के संपादक मंजूर अंजुम
इमेज कैप्शन, उर्दू समाचार पत्र उक़ाब के संपादक मंज़ूर अंजुम कहते हैं कि कोई स्थापित सेंसरशिप भले न हो लेकिन ये उनके दिमाग़ में काफ़ी गहराई से समाई हुई है.

अपनी दलील को समझाते हुए अंजुम कहते हैं, "हालांकि यहां कोई स्थापित सेंसरशिप नहीं है लेकिन ये हमारे दिमाग़ में काफ़ी गहराई से समाई हुई है. हम इस बारे में बातें नहीं कर सकते या लिख नहीं सकते, लेकिन हम अपनी सीमाएं जानते हैं."

उन्होंने बताया, "कश्मीर में कई <link type="page"><caption> ज्ञात और अज्ञात बल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130924_gen_vksingh_kashmir_ia.shtml" platform="highweb"/></link> काम कर रहे हैं. हो सकता है कि क्या लिखना है और क्या नहीं, इस बारे में आपको इन बलों से कोई दिशानिर्देश न मिला हो, लेकिन आपको ये पता रहता है कि वो लाइन कौन सी है जिसे आपको पार नहीं करनी है."

कश्मीर एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष ताहिर मोहिउद्दीन कहते हैं कि कश्मीर में मानसिक सेंसरशिप अधिक है.

वो बताते हैं, "पिछले दो दशक से अधिक समय के दौरान हमने काफ़ी कुछ देखा है. हमारे साथी मारे गए, उनका अपहरण और अपमान हुआ. अख़बारों के दफ़्तरों पर हमले हुए. बम विस्फोट हुए और घाटी में काम कर रहे सभी फ़ैक्टर किसी न किसी तरह से इसमें शामिल रहे हैं."

मनोवैज्ञानिक असर

मोहिउद्दीन घाटी के एक समाचार पत्र चट्टान का संपादन करते हैं. वो बताते हैं, "अब हालात में काफ़ी सुधार हुआ है लेकिन मनोवैज्ञानिक असर के चलते आप अपने ऊपर ख़ुद ही सेंसरशिप ओढ़ लेते हैं."

कश्मीर में कर्फ्यू

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मोहिउद्दीन कहते हैं कि स्थानीय अख़बार अपनी वित्तीय ज़रूरतों के लिए राज्य सरकारों पर निर्भर हैं और इसके चलते भी प्रेस को अपनी आज़ादी से समझौता करना पड़ता है.

वो बताते हैं, "<link type="page"><caption> कश्मीर में राज्य सरकार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130902_zubeen_kashmir_ssr.shtml" platform="highweb"/></link> सबसे बड़ी विज्ञापनदाता है, इसलिए समाचार पत्र पूरी तरह से इस पर निर्भर हैं. ऐसे में आप एक वॉचडॉग की तरह काम नहीं कर सकते हैं क्योंकि आपको अपनी आर्थिक स्थिति का भी ख़्याल रखना है."

एक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया, "समाचार पत्रों में पिछले आठ महीनों के दौरान प्रकाशित विज्ञापनों के लिए सरकार ने अभी तक कोई भुगतान नहीं किया है." उन्होंने बताया, "ज़्यादातर समाचार पत्रों के लिए अख़बार का प्रकाशन करना काफ़ी मुश्किल हो गया है. जब नौबत जान बचाने की आ गई है तो ऐसे में आज़ादी से तो अपने आप समझौता कर लिया जाता है."

श्रीनगर में सहारा न्यूज़ नेटवर्क के साथ काम करने वाले एक युवा पत्रकार परवेज़ माजिद की राय है कि कश्मीर में दो तरह की सेंसरशिप है. "एक सेंसरशिप तो दिखाई देती है. घाटी में जब कहीं भी कोई संकट आता है तो अधिकारी कर्<link type="page"><caption> फ़्यू</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130719_kashmir_bandh_protest_fma.shtml" platform="highweb"/></link> लगा देते हैं. वो सेंसरशिप या मीडिया पर लगाम लगाने की घोषणा नहीं करते हैं लेकिन साथ ही वो पत्रकारों को कर्फ़्यू पास जारी नहीं करते हैं. ऐसा 2008 से 2010 के दौरान तो अक्सर हुआ."

निशाने पर फ़ोटो पत्रकार

कश्मीर एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष ताहिर मोहिउद्दीन
इमेज कैप्शन, कश्मीर एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष ताहिर मोहिउद्दीन कहते हैं,"हमने काफ़ी कुछ देखा है. हमारे साथी मारे गए, उनका अपहरण और अपमान हुआ. अख़बारों के दफ्तरों पर हमले हुए."

उन्होंने आगे बताया, "इसके अलावा न दिखाई देने वाली सेंसरशिप भी है. आपको <link type="page"><caption> अलगाववादी राजनीतिज्ञों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130813_kishtwar_ved_bhasin_sk.shtml" platform="highweb"/></link> के साथ <italic>होली काउ</italic> की तरह बर्ताव करना पड़ता है. आप अपनी रिपोर्टिंग की सीमाएं जानते हैं. आप उन सीमाओं को जानते हैं, जिन्हें पार नहीं करना है."

फ़ोटो पत्रकारों को सबसे अधिक निशाना बनाया जाता है.

कश्मीर फ़ोटोग्राफर संघ के अध्यक्ष फ़ारूक़ जावेद ख़ान ने बताया, "हम सबसे बुरी हालत का सामना कर रहे हैं. पुलिस और सुरक्षाबल किसी भी संकटग्रस्त जगह पर हमारी मौजूदगी का विरोध करते हैं. हमारे साथियों की बेरहमी से साथ पिटाई की जाती है और यहां तक की पथराव या आन्दोलन को कवर करने के दौरान हमारे ऊपर ही गोली चला दी जाती है."

वो आगे बताते हैं कि आंदोलनकारी लोग भी उन्हें नहीं बख़्शते हैं और कई लोग फ़ोटोग्राफ़रों पर ही पत्थर चला देते हैं.

ऐसे हालात में ज़्यादातर लोग हालात में सुधार के बावजूद प्रेस फ़्रीडम सूचकांक के नतीजों से सहमत होगें. कर्फ़्यू या किसी तरह की अशांति की स्थिति में अधिकारी मोबाइल इंटरनेट और संचार सेवाओं को बंद कर देते हैं. हाल में संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरू को फांसी देने के एक साल पूरा होने पर बीती नौ फ़रवरी को ऐसा ही किया गया. प्री-पेड मोबाइल सेवाओं पर पिछले कई वर्षों से बिना बताए एसएमएस पर प्रतिबंध लगा हुआ है.

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