'अपहरण, यौन शोषण फिर बंधुआ मज़दूरी'

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- Author, शिल्पा कन्नन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत के गांव-कस्बों से हजारों लोग हर दिन अपने सपनों की तलाश में बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं, लेकिन उन सपनों का क्या जो इन बड़े शहरों की गुमनाम दीवारों में कैद होकर रह जाते हैं.
दूरदराज के इलाकों से बड़ी संख्या में बच्चों को अवैध रूप से शहर लाकर उनसे जबरन काम कराया जाता है.
ऐसी ही एक लड़की लक्ष्मी है, जिसे चार साल पहले पूर्वोत्तर भारत के एक गांव से अपहरण करके दिल्ली लाया गया था.
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बाल संरक्षण अधिकारियों ने उसे बचा तो लिया है, लेकिन वो अभी काफी कमजोर और डरी हुई है. 13 साल की लक्ष्मी पश्चिम दिल्ली में लोगों के घरों में खाना बनाने, साफ-सफाई और बच्चों के देखभाल का काम करती थी.
यौन दुर्व्यवहार
लक्ष्मी बताती है, "मुझे आराम करने की इजाज़त नहीं थी. कोई ग़लती करने या उनकी मर्जी के मुताबिक़ काम नहीं करने पर वो मुझे मारते थे."
उसने बताया, "मुझे कभी भी घर से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं मिलती थी, इसलिए मुझे पता नहीं नहीं चला कि मैं दिल्ली में हूं. मुझे काम पर रखने वाले ने मुझे बताया कि हम मद्रास में हैं."
लक्ष्मी ने यह भी बताया कि उसका अपहरण करने वाले व्यक्ति ने उसके साथ यौन दुर्व्यवहार भी किया.
लक्ष्मी के माता-पिता बचपन में ही चल बसे थे. उसके चाचा उसे वापस पाकर काफी खुश हैं. वो असम के चाय बागान में मजदूरी करते हैं.
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लक्ष्मी के चाचा बताते हैं, "हम कर ही क्या सकते हैं? हम ग़रीब लोग हैं- मेरे पास इतना धन नहीं है कि मैं दिल्ली आकर अपनी गुमशुदा भतीजी की तलाश करता."
गुलामी की ज़िंदगी
ये कहानी सिर्फ लक्ष्मी की नहीं है. भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा गुम होता है और उनमें से लगभग आधे बच्चे फिर कभी नहीं मिलते.
अगवा किए गए बच्चों को अक्सर यौन कारोबार में ढकेल दिया जाता है. लेकिन ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं, जिसमें बच्चों को घरेलू काम में लगा दिया जाता है. ये बच्चे घर की चारदीवारी में बंद रहते हैं और आम लोगों की नज़र में नहीं आते हैं.
सरकारी अनुमानों के मुताबिक़ करीब पांच लाख बच्चे इस हालत में हैं.
बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था 'बचपन बचाओ आंदोलन' के प्रमुख कैलाश सत्यार्थी का कहना है, "ये भारत के विकास का सर्वाधिक अफसोसजनक पहलू है. मध्यवर्ग सस्ते और उनके काबू में रहने वाले मजदूर की मांग कर रहा है."
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क़ानूनी स्थिति

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सत्यार्थी कहते हैं, "ऐसे में सबसे सस्ते और कमजोर श्रमिक बच्चे ही हैं. खासतौर से लड़कियां. ऐसे में सस्ते मजदूर की मांग भारत के दूरदराज के गांवों से बड़े शहरों की तरफ बच्चों की तस्करी को बढ़ावा दे रही है."
एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में दुनिया के किसी भी हिस्से के मुकाबले अधिक बाल मजदूर हैं.
जाहिर तौर पर बच्चों का अपहरण ग़ैरक़ानूनी है, लेकिन इस मसले पर क़ानूनी स्थिति साफ़ नहीं है कि कब वो क़ानूनी तौर से काम कर सकते हैं.
बाल श्रम क़ानून 14 साल से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखने की इजाज़त नहीं देता है, लेकिन क़ानूनी रूप से 18 वर्ष से कम उम्र होने पर उसे बच्चा ही माना जाता है.
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बदलाव की उम्मीद
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की प्रमुख कुशल सिंह बताती हैं, "दुर्भाग्य से हमारा बाल श्रम निषेध और विनियमन क़ानून पूरी तरह से पुराना पड़ चुका है."
वो बताती हैं, "ये क़ानून कहता है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को ख़तरनाक व्यवसायों में काम नहीं दिया जा सकता है. क्या इसका ये अर्थ है कि ग़ैर-ख़तरनाक कामों में दो साल के बच्चों को लगाया जा सकता है?"
उन्होंने बताया, "जाहिर है कि ये काफ़ी पुराना है. अब इस मुद्दे को उठाया गया है और संसद में एक संशोधन लंबित है. हालांकि ये संशोधन काफी समय से लटका हुआ है."
अगर क़ानून में बदलाव होता है तो बच्चों के अपहरण के खिलाफ लड़ाई थोड़ी आसान हो जाएगी.
लेकिन क्या सिर्फ क़ानून में एक बदलाव करने से हालात बदल जाएंगे?
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