नामः मोहनदास करमचंद गांधी, पेशाः खेती

मोहनदास करमचंद गांधी

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    • Author, देवीदास देशपांडे
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकाम के लिए

मोहनदास करमचंद गांधी ने वकालत की पढ़ाई की थी और वे बैरिस्टर थे, यह तो सभी को पता है. लेकिन स्वयं गांधी अपने आप को एक किसान मानते थे. यह बात दर्ज है उनके अपने हस्ताक्षर से पुणे की एक संस्था में.

पुणे स्थित ये जानी-मानी संस्था है भंडारकर प्राच्य विद्या संशोधन संस्था (भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इन्स्टीट्यूट).

इस 97 साल पुरानी संस्था में भारत तथा एशियाई देशों से संबंधित अनेक प्राचीन पांडुलिपियां और पुस्तकें हैं. इनके अलावा संस्थान का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है यहां की विजिटर्स बुक.

वर्ष 1917 में स्थापना के बाद अनके नामी-गिरामी हस्तियों ने यहां दौरा किया और इस विजिटर्स बुक में अपने संस्मरण एवं टिप्पणियां लिखीं.

इन्हीं दौरों में से एक था महात्मा गांधी और राजकुमारी अमृत कौर तथा सरदार वल्लभभाई पटेल का दौरा.

खेडुत

महात्मा गांधी

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संस्थान में दर्ज रिकॉर्ड के अनुसार एक सितंबर, 1945 को इन तीनों हस्तियों ने इस संस्था का दौरा किया था. उनके साथ मणिलाल गांधी भी थे.

इस विजिटर्स बुक में तीन स्तंभ थे- नाम, टिप्पणी और पेशा.

संपूर्ण संस्था का मुआयना करने के बाद महात्मा गांधी ने विजिटर्स बुक में हस्ताक्षर किए. टिप्पणी के खाने में उन्होंने लिखा, 'बहुत आनंद हुआ'. पेशा के खाने में उन्होंने गुजराती में लिख दिया, 'खेडुत' जिसका अर्थ है किसान.

यह प्रसंग संयोगवश ही उजागर हुआ. वर्ष 2001 में राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता और तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने संस्था का दौरा किया.

विजिटर्स बुक में हस्ताक्षर करते समय संस्था के तत्कालीन मानद सचिव एमजी धडफले ने उन्हें बताया कि कभी महात्मा गांधी भी यहां आए थे.

इस पर पवार ने जानना चाहा कि बापू ने अपना पेशा क्या लिखा था. इसलिए पुरानी विजिटर्स बुक लाई गई और तब यह सार्वजनिक हुआ.

यही रिकॉर्ड दिखाता है कि राजकुमारी अमृत कौर ने अपना पेशा 'देश सेविका' लिखा था जबकि सरदार पटेल ने भी किसान लिखा था और मणिलाल गांधी ने लिखा था, 'संपादक, इंडियन ओपिनियन'.

'गांधीवादी गोडसे'

महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल

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संयोग से पुणे, वही शहर है जहां गांधीजी की हत्या करने वाले नाथू राम गोडसे का भी घर है.

गोडसे के छोटे भाई और गांधी हत्या के सहअभियुक्त गोपाल गोडसे जब तक जीवित थे, तब तक नाथू राम गोडसे की स्मृति में एक कार्यक्रम का सार्वजनिक आयोजन किया जाता था.

यह कार्यक्रम 15 नवंबर यानी जिस दिन नाथू राम को फांसी दे दी गई उसी दिन आयोजित किया जाता था. लेकिन छह वर्षों पूर्व उनकी मृत्यु के बाद और खासकर मालेगांव बम विस्फोट में अभिनव भारत संगठन का नाम आने के बाद, इस कार्यक्रम का सार्वजनिक आयोजन बंद किया गया.

पिछले दो तीन वर्षों से गोडसे के पुश्तैनी घर में इस दिन एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाता है. अभिनव भारत संगठन का दावा है कि इस दिन एकत्रित लोग अखंड भारत की पुनर्स्थापना के लिए प्रार्थना करते हैं.

खुद हिमानी सावरकर, जो गोपाल गोडसे की बेटी और नाथू राम की भतीजी हैं, ने सार्वजनिक रूप से कई बार अपने चाचा एवं पिता का समर्थन किया है.

गांधीजी के पुण्य दिवस पर इस संदर्भ में कुछ भी कहने से उन्होंने इनकार किया.

पिछले साल अक्तूबर में सनातन संस्था के समाचारपत्र को दिए साक्षात्कार में उन्होंने दावा किया था कि उनके पिता गांधीवादी थे.

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