अब शुरू होगा अफ़ग़ानिस्तान का असली इम्तिहान

    • Author, अहमद राशिद
    • पदनाम, लेखक एवं पत्रकार, पाकिस्तान

कोई भी ठीक-ठीक नहीं जानता है कि 2014 के बाद अफ़ग़ानिस्तान में क्या होगा. अटकलें बहुत अधिक हैं. वैकल्पिक परिदृश्यों का दायरा दिमाग़ को चकराने वाला है और खोस्त की पहाड़ियों से लेकर अमरीकी विदेश मंत्रालय तक सभी आगामी परिस्थितियों से अनजान हैं.

हालांकि, यह एक सैन्य हस्तानांतरण है और कितने अमरीकी सैनिक रुकेंगे, किस शर्त पर रुकेंगे, इस बारे में वाशिंगटन और काबुल विचार कर रहे हैं.

सच्चाई यह है कि शायद अन्य मुद्दों के मुक़ाबले सैन्य हस्तानांतरण आसान होगा.

महत्वपूर्ण कारक

इस समय अफ़ग़ानिस्तान में क़रीब 87,000 पश्चिमी सैनिक हैं, जो बीते साल के 150,000 के मुक़ाबले कम है. अगले बसंत तक इनकी संख्या 40,000 से कम होगी और 2014 के अंत तक शून्य होगी. हालांकि, उम्मीद है कि अमरीका अपने पीछे एक छोटा प्रशिक्षण बल यहां छोड़ जाएगा.

अगले 12 महीनों के दौरान सबसे महत्वपूर्ण बात राजनीतिक हस्तानांतरण है. क्या अगले अप्रैल में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव तुलनात्मक रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से हो पाएंगे और क्या ऐसी विधि सम्मत सरकार बन पाएगी जो अधिकांश अफ़ग़ानियों को मंज़ूर हो.

जब हम अफ़ग़ानिस्तान में चुनावों की बात करते हैं तो सतर्कता सबसे महत्वपूर्ण है. भविष्य में देश में स्थायित्व इसी बात पर निर्भर करेगा, न कि तालिबान के हमलों की प्रबलता या कितने अमरीकी सैनिक रुके रहेंगे, इस बात पर.

राष्ट्रपति हामिद करज़ई इस बार चुनाव में खड़े नहीं हो सकते हैं और इसमें कोई शक नहीं कि वो अब तक सामने आ चुके 11 उम्मीदवारों में से अपने पसंदीदा उम्मीदवार को चुनेंगे.

करज़ई ऐसे प्रत्याशी को चुनना चाहेंगे जो उन्हें और उनके परिवार को सबसे बेहतर तरीक़े से संरक्षण दे सकता हो, ख़ासतौर से भ्रष्टाचार के आरोपों से.

इस बात की काफ़ी उम्मीद है कि उनका समर्थन उनके भाई क़यूम करज़ई या उनके विदेश मंत्री ज़ालमई रसूल को मिलेगा.

कठिनाई यह है कि अफ़ग़ानिस्तान के 2009 के चुनावों में धांधली को लेकर काफ़ी निंदा हुई थी. इस प्रक्रिया के दौरान लगभग गृह युद्ध जैसे हालात बन गए थे. ऐसे में क्या 2014 के चुनावों और संभावित नतीजों में विश्वसनीयता का अभाव होगा. अगर हालात पिछली बार के मुक़ाबले आधे बुरे रहे, तो भी भविष्य की स्थिरता दांव पर रहेगी.

<link type="page"><caption> पढ़ें: आला जनरल ने दी ख़तरे की चेतावनी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/12/131222_afghan_general_warns_sdp.shtml" platform="highweb"/></link>

क्या करेंगे करज़ई?

ऐसे में यह काफ़ी महत्वपूर्ण होगा कि करज़ई नस्ली कार्ड कैसे खेलते हैं.

उन्होंने 2009 में दक्षिण और पूर्व में अपने साथी पश्तूनों की मदद लेकर मामूली बहुमत से जीत हासिल की थी. इसी इलाक़े की मतपेटियों में सबसे अधिक छेड़छाड़ हुई थी.

उत्तर और पश्चिम के ताजिक, उज़्बेक, हज़ारा और अन्य नस्ली समूहों ने परिणामों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. इन ग़ैर-पश्तून लोगों का दावा था कि जीत उनकी हुई है. अमरीकी मध्यस्थों के हस्तक्षेप के बाद ही उत्तर के प्रत्याशी अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह दोबारा चुनाव की मांग से पीछे हटे थे.

अगले अप्रैल में ऐसे हालात दोबारा पैदा हो सकते हैं और हो सकता है कि परिणाम अधिक विनाशकारी हों.

इस बार अगर उन्हें लगेगा कि करज़ई ने चुनावों में धांधली की है तो ग़ैर-पश्तून पीछे नहीं हटेंगे.

इस बार पश्चिम ऐसी स्थिति में नहीं होगा कि वो समझौते के लिए दबाव बना सके और इस बात की उम्मीद भी कम ही है कि वो अनुदान का एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकेंगे.

इसी तरह आर्थिक हस्तानांतरण का भी अभाव है. इस देश में 2001 से सामाजिक क्षेत्र में 100 अरब डॉलर ख़र्च करने के बावजूद पश्चिम यहां एक ऐसी स्वदेशी अर्थव्यवस्था का निर्माण नहीं कर सका है जो युवाओं को रोज़गार और देश को राजस्व दे सके.

<link type="page"><caption> पढ़ें: 'अमरीका के सब्र की परीक्षा ले रहा है अफ़ग़ानिस्तान' </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/12/131210_afghanistan_america_vt.shtml" platform="highweb"/></link>

अर्थव्यवस्था का सवाल

विदेशी ताक़तों के साथ काम करने वाले हज़ारों शिक्षित और लोकतंत्र समर्थक अफ़ग़ान नागरिक अब सड़कों पर होंगे और उन्हें अपने भविष्य के बारे में कुछ पता नहीं होगा. उनमें से कई विदेश चले जाएंगे और ग़ैरक़ानूनी प्रवासी बन जाएंगे.

पश्चिमी बलों के बाहर चले जाने और अनुदान पैकेज में कटौती के बाद संभावित अर्थव्यवस्था के बारे में वाशिंगटन और काबुल दोनों ही पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे हैं.

सेना और अर्थव्यवस्था के लिए अमरीका और नाटो हर साल आठ अरब डालर देने का वादा कर रहे हैं लेकिन यह राशि एक साल से काफ़ी पहले ही ख़त्म हो सकती है. अमरीका और यूरोप में कुछ लोग ही अधिक भुगतान करने के लिए तैयार होंगे, ख़ासतौर से तब जब गृह युद्ध जारी हो.

क्षेत्रीय हस्तांतरण पर भी या तो बिल्कुल नहीं या बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है. अफ़ग़ानिस्तान के मामलों में हस्तक्षेप न करने के लिए ईरान, पाकिस्तान, चीन, भारत, रूस और सउदी अरब जैसे आस-पड़ोस के देशों के साथ समझौतों के लिए राजनयिक प्रयासों की ज़रूरत है.

इन देशों के साथ इस बात के लिए भी समझौता होना चाहिए कि वो अपने पसंद के गुट को हथियार और धन नहीं देंगे, जैसा कि उन्होंने 1990 के दशक में किया और जिसके कारण इस देश को गृह युद्ध जैसे हालात से गुज़रना पड़ा.

ये हस्तांतरण ज़रूरी हैं. सबसे बढ़कर तालिबान के साथ मेलमिलाप और समझौता करने की आवश्यकता है ताकि उन्हें राजनीतिक व्यवस्था में शामिल किया जा सके.

<link type="page"><caption> पढ़ें: करज़ई की नाक तले तालिबान की 'हुकूमत'</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/12/131203_taliban_afghanistan_justice_ap.shtml" platform="highweb"/></link>

तालिबान के साथ बातचीत

अगर अप्रैल में व्यापक समर्थन के साथ एक नए राष्ट्रपति का आगमन होता है और जिस पर तालिबान भरोसा कर सकता है तो बातचीत बहाल हो सकती है. लेकिन क्या अमरीका और नाटो इस तरह की बातचीत में मदद करने के लिए तैयार हैं.

अगर इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर करज़ई के साथ अभी चर्चा नहीं की गई तो इसके नतीजे विनाशकारी होंगे.

चुनाव में धांधली और तालिबान के साथ गृह युद्ध जारी रहने से हज़ारों लोगों की जान जा सकती है और लाखों लोग शरणार्थी बनेंगे. यह मानवीय संकट होगा और अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी समूह अफ़ग़ानिस्तान में डेरा जमाने लगेंगे.

दुनिया में एक बार फिर हस्तक्षेप करने की इच्छाशक्ति नहीं होगी और पड़ोसी देश धन और हथियार देंगे ताकि कुछ लड़ाकों को वो अपने प्रभाव में ले सकें.

अमरीका के जाने और इन आसन्न समस्याओं के मद्देनज़र एक असली निरपेक्ष मध्यस्थ की जरूरत है जो सभी जटिल समीकरणों से निपट सके और सही नतीजे तक पहुंचे.

संयुक्त राष्ट्र या यूरोपीय संघ या कोई व्यक्ति, नार्वे या जर्मनी जैसे ग़ैर-विवादित देश यह भूमिका निभा सकते हैं.

विडंबना यह है कि अमरीका और नाटो की अगुवाई में चले युद्ध ने शांतिदूतों और मध्यस्तों को अप्रभावी कर दिया है.

हमें एक व्यापक पश्चिमी राजनयिक पहल के साथ पश्चिमी की वापसी के लिए तैयार होना होगा, जो पश्चिमी सैन्य बलों की जगह लेगा.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>