उत्तर प्रदेश में कौन है कांग्रेस के क़रीब?

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कौन कांग्रेस के कितने क़रीब हैं ? इस बात पर अब उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है.
बहस समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के उस बयान के बाद छिड़ी है जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव पर कांग्रेस की चापलूसी करने का आरोप लगाया था.
अविभाजित बिहार में हुए चारा घोटाले के सिलसिले में जेल से रिहा होने के बाद लालू प्रसाद यादव मुज़फ़्फ़रनगर के दंगा पीड़ितों के कैम्पों में पहुंचे. इस बात से मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी ख़ासी नाराज़ है.
मुलायम सिंह यादव ने लालू प्रसाद यादव पर कांग्रेस का एजेंट होने के साथ-साथ यहाँ तक कह दिया कि "वह जाएँ और कांग्रेस की चापलूसी करें."
कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के दौरे के फ़ौरन बाद लालू मुज़फ़्फ़रनगर के दंगा पीड़ितों से मिलने पहुंचे और उन्होंने वहाँ पर 'व्याप्त बदइंतज़ामी' पर अपनी चिंता व्यक्त की. उन्होंने मुलायम सिंह के सैफ़ई के एक सांस्कृतिक समारोह में शिरकत करने की आलोचना भी की.
समाजवादी पार्टी को लालू के इस दौरे से राजनीतिक षड्यंत्र की बू आने लगी है.
दोनों कांग्रेस के क़रीब

हाल ही में राजनारायण की पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में मुलायम ने कहा कि मुज़फ़्फ़रनगर के दंगा पीड़ितों के मुआवज़े और पुनर्वास के रूप में राज्य सरकार ने 90 करोड़ रुपए पहले ही खर्च कर दिए. उसके बावजूद मुज़फ़्फ़रनगर पर राजनीति हो रही है.
राष्ट्रीय जनता दल के नेता अब्दुल बारी सिद्दीक़ी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि इस तरह के बयान वरिष्ठ नेताओं को शोभा नहीं देते. उनका कहना था कि अगर मुज़फ़्फ़रनगर के कैंपों की बदइंतज़ामी की तरफ ध्यान आकृष्ट कराया गया तो उसे राजनीति के रूप में नहीं लेना चाहिए था.
वह कहते हैं, "जहाँ तक बात है कांग्रेस के तलवे चाटने की बात है तो ये दुनिया जानती है कि कौन ऐसा करता है."
मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव की ये नोक-झोंक इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि दोनों ही पर कांग्रेस के क़रीब होने की बात कही जाती रही है. कांग्रेस से इनके रिश्ते भी कोई छुपी बात नहीं है.
लखनऊ में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार अतुल चंद्रा का कहना है कि दोनों- मुलायम और लालू- कांग्रेस के क़रीबी माने जाते हैं.
उनका कहना है कि अभी हाल ही में मुलायम को सीबीआई से आय से अधिक संपत्ति के मामले में बड़ी राहत मिली है. अतुल चंद्रा कहते हैं कि अगर मुलायम सिंह यादव लालू प्रसाद पर कांग्रेस के तलवे चाटने का आरोप लगा रहे हैं तो उन्होंने यानी मुलायम ने भी कई अहम मौक़ों पर कांग्रेस की बड़ी मदद की है. चाहे वो संसद में जनलोकपाल बिल का मामला हो या फिर परमाणु नीति पर बिल के समर्थन का मामला हो.
वह कहते हैं कि कुल मिलाकर दोनों ही नेता और उनकी पार्टियां कांग्रेस के क़रीब हैं और वक़्त पड़ने पर दोनों ही कांग्रेस को मदद करेंगे या फिर उसे समर्थन देंगे.
लालू को फ़ायदा या मुलायम को नुक़सान?
विश्लेषकों का कहना है कि लालू प्रसाद यादव मुज़फ़्फ़रनगर गए जहाँ से उन्हें कुछ लेना-देना ही नहीं है. वह मानते हैं कि लालू शायद बिहार के मुसलमानों को यह दिखाना चाहते हैं कि वह इस समुदाय के कितने हमदर्द हैं. विश्लेषकों को ये भी लगता है कि मुलायम और लालू शुरू से ही एक दूसरे के खिलाफ रहे हैं. कुछ वक़्त वे साथ ज़रूर चले. मगर जल्द ही दोनों के रास्ते जुदा हो गए.

साल 1997 में जब एच डी देवेगौड़ा ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया था तब मुलायम सिंह यादव के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ़ हो रहा था.
कहा जाता है, तब मुलायम के मंसूबों पर लालू ने ही पानी फेर दिया था. उसके बाद से ही दोनों नेता एक-दूसरे के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करते रहे हैं.
अतुल चंद्रा का कहना है कि मुज़फ़्फ़रनगर के दौरे या समाजवादी पार्टी की सरकार के खिलाफ बयानबाज़ी से लालू को कोई ख़ास लाभ नहीं मिल सकता.
मगर कुछ राजनीतिक चिंतक मानते हैं कि लालू को फ़ायदा अगर न भी मिले, मगर उनके मुज़फ़्फ़रनगर दौरे और बयान से मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को राजनीतिक नुक़सान होता ज़रूर नज़र आ रहा है.
ऐसा इसलिए भी है क्योंकि मुज़फ़्फ़रनगर के दंगा पीड़ितों के कैम्पों के बारे में उनके बयान की काफी आलोचना हो चुकी है. यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी ने भी मुलायम के बयान पर अपना विरोध दर्ज किया था.
अब इस बात पर लोगों की नज़रें टिकी हैं कि इन दोनों में से कौन कांग्रेस से ज़्यादा क़रीब है. आने वाले लोकसभा चुनाव से काफी पहले ये बात साफ़ होती चली जाएगी.
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