पहली बार देखा कि घरवाले कितने निर्मम हो सकते हैं...

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
साल 2013 कई साल बाद ऐसा पहला साल था, जब मैंने चरमपंथी हमलों, चरमपंथियों के ख़िलाफ़ हाईप्रोफ़ाइल मुक़दमों या उनकी ग़िरफ़्तारी पर रिपोर्टिंग नहीं की.
इसका मतलब यह नहीं कि देश में शांति रही या हिंसा और हत्याएं नहीं हुईं. इस साल मैंने रिपोर्टिंग के दौरान अक्सर व्यक्तिगत त्रासदी को क़रीब से देखा.
लंबे समय से बम धमाकों और चरमपंथी हमलों पर रिपोर्टिंग करते हुए मौत को इतना क़रीब से देखा कि अब मौत की ख़बरों पर अधिक भावुक नहीं होता.
यह शर्म की बात है, लेकिन सालों तक हिंसा और मारधाड़ पर रिपोर्टिंग करने से शायद हिस मर जाता है.
कम से कम मैं अब तक यही समझता था. मगर सितंबर में रोहतक के एक गाँव में <link type="page"><caption> ऑनर किलिंग पर रिपोर्टिंग</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130919_rohtak_honour_killing_creamation_rd.shtml" platform="highweb"/></link> करने गया, तो लगा कि हिस अभी भी ज़िंदा है. एक लड़के और एक लड़की के बीच प्रेम दोनों की हत्या का कारण बना. इस घटना ने मुझे अंदर तक झिंझोड़ दिया था.
ऑनर किलिंग पंजाब से लेकर तुर्की तक होती हैं, मगर कभी इतने क़रीब से देखने का मौक़ा नहीं मिला था.

दोनों युवाओं को उनके ही परिवार वालों ने पीट-पीटकर मार डाला था. लड़के के हाथ-पैर और सिर को बदन से काटकर अलग कर दिया गया. जब दोनों की चिता जल रही थी तो मैंने बातचीत के दौरान पाया कि दोनों के <link type="page"><caption> घरवालों के दिलों में कोई दर्द</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130919_honour_killing_vk.shtml" platform="highweb"/></link> नहीं था.
<link type="page"><caption> देखें: रोहतक में मानवता की हत्या</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130919_honour_killing_vk.shtml" platform="highweb"/></link>
जब उन्होंने कहा वो ऐसा करके एक मिसाल कायम करना चाहते थे, तो हमें अहसास हुआ कि भाग्यशाली हैं वो प्रेमी जो इस गांव या ऐसी मानसिकता रखने वालों के क़रीब नहीं रहते.
मुंबई में मैंने चरमपंथी हमलों में कई मौतें देखी हैं लेकिन उन्हें अपने परिवार वालों ने नहीं मारा था. परिवार के लोग अपनों को मार सकते हैं, इससे अधिक कठोरता और क्या हो सकती है?
एक महीने बाद एक दूसरी घटना की रिपोर्टिंग के दौरान मुझे यह निर्ममता तो नहीं दिखी मगर यह अहसास ज़रूर हुआ कि हमारे समाज में इंसान की जान की क़ीमत कितनी कम है.
झाँसी के पास मध्य प्रदेश के दातन गांव में दशहरा उत्सव के दौरान एक भगदड़ ने 100 से ज़्यादा लोगों की जान ले ली थी. अगले दिन हम सुबह पहुंचे और सोच रहे थे कि शायद वहाँ मातम छाया होगा.
हम यह देखकर हैरान थे कि लोग <link type="page"><caption> नाच-गाकर त्योहार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131016_datia_stampede_diary_aa.shtml" platform="highweb"/></link> मना रहे हैं. जिस पुल पर हादसा हुआ था, उससे महज़ कुछ गज़ के फ़ासले पर दर्जन भर महिलाए मज़े में <link type="page"><caption> घूम-घूमकर नाच</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131014_datia_pilgrimes_sm.shtml" platform="highweb"/></link> रही थीं. मर्द उन्हें देख रहे थे और शाबाशी दे रहे थे.
मैंने सोचा कि कहीं मैं ग़लत जगह पर तो नहीं आ गया हूं? यहां हमें केवल तीन लोग मिले, जो दुखी थे. उनके बच्चे पिछले दिन मची भगदड़ के बाद से लापता थे और वो अपने बच्चों की तलाश में निकले थे.
<link type="page"><caption> देखें:हादसे के बीच अपनों की तलाश</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131013_datia_stampede_sks.shtml" platform="highweb"/></link>

इन दो घटनाओं के अलावा यह साल रिपोर्टिंग के लिहाज़ से एक संतोषजनक साल रहा. मैंने कई तरह के मुद्दों पर रिपोर्टिंग की, जिनमें मनोरंजन की ख़बरों से लेकर संस्कृति, सियासत और सामाजिक सभी टॉपिक शामिल थे.
बीबीसी एक विदेशी समाचार और विश्लेषण मीडिया एजेंसी है. इस कारण हमारे लिए ज़रूरी है कि भारतीय समाज में तेज़ी से होने वाले परिवर्तन को बाहरी दुनिया को बताया जाए और विदेश में होने वाली अहम घटनाओं और बदलाव को भारत तक पहुंचाया जाए.
मैं इस साल मार्च में कोच्चि की एक ऐसी संस्था में गया था, जहाँ भारत की युवा पीढ़ी इन्फ़ॉर्मेशन टैक्नोलॉजी के मैदान में नई खोज का पता लगाने में एकजुट हैं. वहाँ का हर विद्यार्थी आईटी सेक्टर में नई ईजाद करने में लगा है. <link type="page"><caption> 'स्टार्टअप विलेज'</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130410_innovative_ideas_kochi_zubair_sy.shtml" platform="highweb"/></link> नाम की इस संस्था में नई पीढ़ी की मेहनत और लगन देखकर सीना फूल सा गया और मैंने उनकी संस्था और उनकी उपलब्धियों पर बीबीसी टीवी, रेडियो और ऑनलाइन सभी माध्यमों पर रिपोर्टिंग की.

अगले महीने मैंने चेन्नई का दौरा किया जहाँ मैंने पाया कि कर्नाटक संगीत और दक्षिण भारतीय कला के गुरु अपने विदेशी शागिर्दों को <link type="page"><caption> ऑनलाइन ट्रेनिंग</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130509_skype_music_lesson_sy.shtml" platform="highweb"/></link> दे रहे हैं. एक महिला अपने दो बच्चों और पति के साथ अमरीका से हमेशा के लिए वापस लौट आईं. अब वह कर्नाटक म्यूज़िक एक फ्रांस की महिला को ऑनलाइन माध्यम से ट्रेनिंग दे रही हैं.
इस कहानी का सबसे यादगार नज़ारा मैंने सुरेश घटम के घर देखा. स्काइप पर वह एक तरफ़ और टोक्यो में उनका एक जापानी शागिर्द दूसरी तरफ़. दोनों के बीच घटम की जुगलबंदी देखकर मैं हैरान हो गया. हज़ारों मील एक-दूसरे से दूर, लेकिन कला ने कैसे एक-दूसरे को जोड़ रखा था.
साल का अंत हुआ अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की चुनाव में जीत और सरकार बनाने की घोषणा पर रिपोर्टिंग से. जिस तरह पिछले साल मैंने अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव पर अपना साल ख़त्म किया था, इस साल भी दिल्ली में 'आप' की चुनावी जीत पर यह साल ख़त्म किया है.
अब इंतज़ार है अगले साल का. अगले साल भी चुनाव (भारतीय आम चुनाव) शायद रिपोर्टिंग का सबसे बड़ा हाईलाइट हो.
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