हम गुनहगार औरतें...

अपनी मां और छह भाई-बहन के साथ पूजा फ़ुटपाथ पर रहती है.
इमेज कैप्शन, अपनी मां और छह भाई-बहन के साथ पूजा फ़ुटपाथ पर रहती है.
    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

वे कौन सी औरतें हैं, जो सड़क पर रहने को मजबूर हैं, डरती हैं कि कोई ‘ग़लत फ़ायदा’ ना उठा ले? इसलिए रात को सोती नहीं, पर दिन में नौकरी कर पैसे कमाती हैं.

जैसे <link type="page"><caption> पूजा शर्मा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131003_homeless_delhi_da.shtml" platform="highweb"/></link>, जिनसे मैं मिली दिल्ली के हनुमान मंदिर के फ़ुटपाथ पर. हज़ारों बेघरों के बीच एक महिला की अपनी ज़िन्दगी बसाने की कोशिश.

वे कौन सी औरतें हैं, जो अपने से वरिष्ठ सहकर्मी के ख़िलाफ़ यौन शोषण की शिकायत करने का साहस करती हैं?

जैसे <link type="page"><caption> एस अकिला</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131121_women_journalists_sexual_harassment_da.shtml" platform="highweb"/></link> जिन्होंने मुझे बताया कि शिकायत के लिए आवाज़ उठाने का ख़ामियाज़ा उन्हें सन टीवी में अपनी नौकरी गंवाकर चुकाना पड़ा.

वे कौन सी औरतें हैं, जो अपने साथ हुई यौन हिंसा के सच्चे अनुभव बेबाक़ तरीके से दुनिया के सामने एक नाटक में अभिनय कर दिखाती हैं?

जैसा ‘निर्भया’ के साथ सामूहिक बलात्कार पर बने नाटक में हुआ. स्कॉटलैंड के फ्रिंज फ़ेस्टिवल में मैं मिली <link type="page"><caption> छह महिलाओं</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/08/130816_nirbhaya_da_ak.shtml" platform="highweb"/></link> से जिन्होंने ‘निर्भय’ होकर एक नाटक का मंचन कर दुनियाभर के सामने खोल के रख दिए अपनी ज़िन्दगी के घाव.

 एडिनबरा के अलावा नाटक 'निर्भया' का मंचन लंदन में भी हुआ.
इमेज कैप्शन, एडिनबरा के अलावा नाटक 'निर्भया' का मंचन लंदन में भी हुआ.

वे कौन सी औरतें हैं, जिनके काम को अश्लील फ़ब्तियों, आरोपों और धमकियों के ज़रिए बदनाम किया जाता है?

जैसे <link type="page"><caption> सागरिका घोष</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130426_cyber_abuse_women_da.shtml" platform="highweb"/></link>, जिन्होंने मुझे कहा कि उनकी पत्रकारिता पर बहस की जगह सेक्सिस्ट और अभद्र भाषा का इस्तेमाल हो, तो उन्हें बहुत गुस्सा आता है, कभी लड़ पड़ती हैं तो कभी नज़रअंदाज़ कर देती हैं.

वे कौन सी औरतें हैं, जो शादी तो करती हैं पर मां न बनने का फ़ैसला करती हैं, या मां बन सकती हैं लेकिन बच्चे गोद लेने का विकल्प चुनती हैं?

जैसे ठीक मेरी उम्र की <link type="page"><caption> अंजना कुमार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/12/131212_motherhood_da.shtml" platform="highweb"/></link>, जब मैंने उनसे पूछा मां न बनने पर लोग क्या कहते हैं, तो बोलीं, “जजमेंटल हो जाते हैं, ग़ैर-ज़िम्मेदार कहते हैं, पर घर, करियर और मां-बाप का ज़िम्मा बख़ूबी निभाने वाली मैं ग़ैर ज़िम्मेदार कैसे?”

शायद कुछ ऐसी ही औरतों के ज़हन में रखते हुए पाकिस्तानी शायरा <link type="page"><caption> किश्वर नाहीद</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/04/100417_kishwar_naheed_dps.shtml" platform="highweb"/></link> ने अपनी कविता ‘हम गुनहगार औरतें हैं’, लिखी होगी.

किश्वर नाहीद की कविता में औरतें ताक़त का रौब नहीं खातीं, न सर झुकाती हैं और न हाथ जोड़ती हैं. पिछले साल मैं ऐसी कई महिलाओं से मिली.

सागरिका घोष को ट्विटर पर भेजा गया एक ट्वीट.
इमेज कैप्शन, सागरिका घोष को ट्विटर पर भेजा गया एक ट्वीट.

कुछ ऐसी भी थीं, जिनसे मैं मिल नहीं पाई, पर जिनकी आवाज़ बहुत बुलंद थी. क्योंकि वे एक प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज के ख़िलाफ़ उठी थीं.

कुछ अब भी सहमी थीं, कड़े यौन हिंसा क़ानून के पारित होने के बाद भी पुलिस के ग़ैर-ज़िम्मेदार औऱ असंवेदनशील रवैये से.

जैसे एक कामकाजी औरत <link type="page"><caption> राखी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130311_gangrape_followup_da.shtml" platform="highweb"/></link>, जिन्होंने दो महीने तक एक आदमी के पीछा करने औऱ तेज़ाब फेंकने की धमकी से डरकर जब पुलिस से मदद मांगी तो पलटकर पुलिस ही उस पर इल्ज़ाम लगाने लगी.

कुछ अब भी सड़कों पर सुरक्षित नहीं महसूस कर रही थीं. त्यौहार जैसे मौकों पर गुंडागर्दी के माहौल को हल्ला-गुल्ला मानकर बर्दाश्त करने का चलन नहीं तोड़ पा रही थीं.

जैसे कॉलेज में पढ़नेवाली <link type="page"><caption> प्रांशिता</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130326_holi_harassment_da.shtml" platform="highweb"/></link> जिन्होंने होली से एक हफ्ते पहले लड़कों की छेड़छाड़ से तंग होकर कॉलेज जाना ही छोड़ दिया.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के बनाए पोस्टर.
इमेज कैप्शन, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के बनाए पोस्टर.

सब लड़ नहीं रहीं, पर आवाज़ें चारों ओर हैं. निर्भया के साथ हुए सामूहिक बलात्कार को एक साल हुआ, तो 16 दिसंबर 2013 को मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय गई.

वहां कई ‘गुनहगार औरतें’ मिलीं. वे नारे लगा रही थीं, ‘महिलाएं मांगें आज़ादी, बसों में चलने की, रात को निकलने की, ख़ाप से आज़ादी, बाप से भी आज़ादी..’

‘बेख़ौफ़ आज़ादी’ के उस माहौल में किसी ने कहा कि हिंसा चाहे सड़क पर हो या घर के अंदर, फ़ैसला शादी का हो या नौकरी का, ये बहस अब गर्मा गई है, इस अनोखे साल में कुछ दीवारें तो ढह गई हैं.

उस बात में कुछ बल तो ज़रूर होगा, जो ‘गुनहगार औरतों’ का ऐसा लेखा-जोखा मैं जोड़ती आई हूं और आप पढ़ते जा रहे हैं.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml " platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>