इस भारी मतदान के मायने क्या हैं?

- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान 67 प्रतिशत के आस पास हुआ है. अनेक मतदान केंद्रों पर रात 9.30 बजे तक वोट पड़ते रहे. मतदान की समय सीमा शाम साढ़े पाँच बजे के बाद 1.72 लाख वोट पड़े. लगभग डेढ़ फीसदी वोट उन मतदाताओं का था, जो साढ़े पाँच बजे तक मतदान केंद्र के भीतर आ चुके थे.
दिल्ली के लिए यह मतदान नया कीर्तिमान है. इसके पहले हुए चार चुनावों में क्रमशः 57.8 (2008), 54.4 (2003), 49.0(1998) और 61.8(1993) प्रतिशत मतदान हुआ था. इस बार मिजोरम में 83 फीसदी, छत्तीसगढ़ में 77 फीसदी, मध्य प्रदेश में 76 और राजस्थान में 75 फीसदी मतदान जनता की हिस्सेदारी को साबित करता है.
पिछले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और कर्नाटक में ज्यादा मतदान हुआ. जातीय हिंसा और लंबे ब्लॉकेड के बावजूद मणिपुर में ऊँचा मतदान हुआ था.
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अभी तक की परंपरा है कि हम भारी मतदान के मानये ‘एंटी इनकंबैंसी’ मानते थे. यानी कि सरकार से नाराज़गी. पर पिछले साल पंजाब और हिमाचल पर यह बात लागू नहीं हुई.
बुधवार की शाम दिल्ली में हुए भारी मतदान की खबर के बारे में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से पूछा गया तो उनका जवाब था कि यह लोकतंत्र के मज़बूत होने की निशानी है. लोकतंत्र की मजबूती एक सामान्य निष्कर्ष है.
समांतर राजनीति

भारी मतदान के अलावा यह देखने की जरूरत होगी कि वोटर किस आधार पर किसको वोट देता है.
इस बार के दिल्ली के परिणाम इस माने में महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि आम आदमी पार्टी के रूप में एक समांतर राजनीति भी जन्म ले रही है. इसके अलावा यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि नागरिक का अपनी व्यवस्था में हस्तक्षेप कितना है.
<link type="page"><caption> दिल्ली विधानसभा के लिए रिकॉर्ड 67 प्रतिशत मतदान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/12/131204_delhi_voting_rd.shtml" platform="highweb"/></link>
दिल्ली सही माने में भारत का प्रतिनिधि शहर है. दिल्ली में लाखों तमिल भाषी रहते हैं.
तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, गुजराती, मराठी, बांग्ला और पूर्वोत्तर के राज्यों से आए प्रवासी बड़ी संख्या में रहते हैं. इनमें बड़ी संख्या युवाओं की है. दिल्ली की हर पहल देश की भावी पहल साबित हो सकती है.
मतदान के बेहतर प्रतिशत के पीछे एक कारण है मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण. फ़र्ज़ी वोटरों के नाम काटे जा रहे हैं. इसके कारण मतदान बढ़ता हुआ लगता है. आंशिक रूप से यह बात सच है, पर कुछ सामाजिक, सांस्कृतिक कारण भी हैं.
वोटर की सामाजिक संरचना

देश की कुल जनसंख्या के अनुपात में वोटरों का प्रतिशत भी बढ़ा है. वर्ष 1951 में हमारे यहाँ 17 करोड़ वोटर थे जो कुल आबादी का 47.97 प्रतिशत था.
वर्ष 2009 में वोटरों की संख्या 71 करोड़ थी जो आबादी का 61.08 प्रतिशत थी. हमारी आबादी की तुलना में वोटरों की संख्या ज्यादा तेजी से बढ़ रही है.
<link type="page"><caption> क्या वाकई दिल्ली से तय होगा देश?</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/12/131203_dilli_desh_voter_nid.shtml" platform="highweb"/></link>
इसका मतलब है युवा वर्ग की राजनीतिक भूमिका बढ़ी है. चुनाव आयोग के हस्तक्षेप के कारण अनुसूचित जातियों-जनजातियों की भागीदारी बढ़ी है, अन्यथा एक समय तक उन्हें वोट देने नहीं दिया जाता था. स्त्री वोटरों की संख्या और उनकी मतदान में भूमिका भी बढ़ी है.
जीवन के अनेक मसलों पर महिलाओं की प्रतिक्रिया पुरुषों के मुकाबले ज्यादा व्यवहारिक होती है. देश का स्त्री-पुरुष अनुपात वोटरों के लैंगिक अनुपात के रूप में भी व्यक्त होता है. साठ के दशक में 1000 पुरुष वोटरों के मुकाबले स्त्री वोटरों की सबसे अच्छी संख्या केरल में थी 981. इस समय केरल में 1000 पुरुष वोटरों पर स्त्री वोटरों की संख्या 1075 है.
इस समय प्रति 1000 पुरुष वोटरों के मुकाबले स्त्री वोटरों की 800 से नीचे की संख्या वाले केवल दो राज्य हैं बिहार और उत्तर प्रदेश. साथ ही 1000 से ऊपर दो राज्य हैं केरल और हिमाचल प्रदेश.
जैसी जनता, वैसा देश

देश का चुनाव आयोग केवल चुनावों का संचालन ही नहीं करता बल्कि चुनाव सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का काम करता है.
वोटर को जागरूक बनाने में मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है.
पुरानी भारतीय कहावत ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ के उलट आज का लोकतंत्र ‘यथा प्रजा, तथा राजा’ यानी जैसी जनता वैसा शासन की उक्ति को रेखांकित करता है.
लोकतंत्र हमारे लिए नई प्रणाली है. भारतीय समाज इसे धीरे-धीरे आत्मसात कर रहा है.
आमतौर पर बिचौलियों की मदद से पार्टियाँ वोट बटोरती रही हैं. पूरे परिवार और अक्सर पूरे मोहल्ले का वोट एक प्रत्याशी को जाता रहा है.
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जाति और धर्म भी चुनाव जीतने का माध्यम बनते रहे हैं. हाल के वर्षों में एक नया पढ़ा-लिखा जागरूक वोटर सामने आया है, जो संकीर्ण धारणाओं से अपेक्षाकृत दूर है.
चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, पर लोकतंत्र की एकमात्र निशानी नहीं. चुनाव के मार्फत भी अनेक अलोकतांत्रिक काम हो सकते हैं. इसलिए महत्वपूर्ण है चुनाव का वस्तुनिष्ठ और सार्थक होना.
हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि लोग वोट क्यों देते हैं. और यह भी कि सामान्य व्यक्ति के जीवन में सरकार की भूमिका क्या है.
कौन से लोग राजनीति में शामिल होते हैं, क्यों होते हैं और वे क्या भूमिका निभाते हैं?
गारंटी-वॉरंटी

चुनाव ऐसा उत्पाद है जिसकी कोई गारंटी-वॉरंटी नहीं.
एक बार चुनाव जीत जाने के बाद प्रत्याशी अपने इलाके का रुख करेगा या नहीं कोई नहीं कह सकता.
और न कोई संवैधानिक व्यवस्था है जो इसकी गारंटी दे.
फिर भी मतदान का प्रतिशत बढ़ रहा है. इसका क्या मतलब निकाला जाए? कि जनता को यह सब रास आ रहा है. या वह नाराज़ होकर वोट देने निकल पड़ी है?
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भारतीय व्यवस्था में वोट देना उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हो गया था. यह अंग्रेजों की देन है.
पूरी प्रशासनिक व्यवस्था हमें अंग्रेजों ने दी है. 1952 से अब तक लोकसभा चुनावों में हमारा वोट औसत 55 से 60 के आस-पास रहता है.
साल 1984 में यह सबसे ज्यादा था 64.01 प्रतिशत और वर्ष 2004 में सबसे कम था 48.74 प्रतिशत.
लगता है वर्ष 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से पैदा हुई सहानुभूति का वोट था.
सन 2004 के चुनाव परिणाम को लोग एंटी इनकम्बैंसी वोट मानते हैं. इंडिया शाइनिंग के खिलाफ. पर यह इतिहास का न्यूनतम प्रतिशत था.
केवल मतदान बढ़ना कारगर नहीं

मतदान प्रतिशत बढ़ने के कारण अनेक होते हैं. फसल और पर्व, स्कूलों की परीक्षाएं और मौसम.
हाल में जागरूकता बढ़ाने की जो कोशिशें हुईं हैं. बढ़ती साक्षरता भी एक बड़ा कारण है.
यह शुभ लक्षण है, पर केवल वोट बढ़ाने से क्या होगा?
इसका महत्व तब है जब चुनाव में मुद्दे महत्वपूर्ण बनें. नीतियाँ सामने आएं और उन पर सार्वजनिक चर्चा हो.
हमारी व्यवस्था में राजनीतिक प्रश्न हावी हैं. इस साल दागी जन-प्रतिनिधियों और आरटीआई के दायरे में राजनीतिक दलों को लाने के सवाल उठे.
राइट टु रिजेक्ट को लेकर चर्चा शुरू हुई है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद ‘इनमें से कोई नहीं’ यानी नोटा बटन भी मतदाता को मिला है.
दस फीसदी वोट भी जनादेश!

आमतौर पर तीन या चार कोणीय मुकाबले में ऐसा प्रत्याशी जीतता है, जिसे अपने इलाके के कुल मतदाताओं में से 10 फीसदी के वोट भी नहीं मिलते.
बहुसंख्यक वोट उसके खिलाफ होते हैं. पर वह अपनी जीत को जनादेश कहता है.
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चुनाव मुद्दों पर नहीं गणित के सहारे जीते जाते हैं.
यह गणित इलाके के प्रभावशाली व्यक्तियों और समूहों के जोड़-घटाने से तैयार होता है. इसमें पैसा और बाहुबल दोनों काम करते हैं.
राजनीतिक व्यवस्था के दो चेहरे हैं. एक दिखाने का और दूसरा वास्तविक.
मुख और मुखौटे का यह फ़र्क चुनाव के दौरान नज़र आता है.
लोकतंत्र इस फर्क को मिटाने का नाम है. हमारे पास इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है.
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