क्या तहलका का हश्र बंगारू लक्ष्मण की तरह होगा?

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
तहलका की शुरुआत साल 2000 में एक इंटरनेट मैगज़ीन के तौर पर हुई थी और अब ये हर हफ़्ते प्रिंट में प्रकाशित होती है. इस पूरे सफ़र में तहलका भारत की कुछ सबसे बड़ी न्यूज़ स्टोरीज़ का विस्फोटक रहस्योद्घाटन कर तहलका मचा चुकी है.
लेकिन इसके संस्थापक संपादक तरुण तेजपाल अपनी एक साथी महिला पत्रकार के यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे हैं और इन सब के बीच तहलका के भविष्य पर अनिश्चतता के बादलों का साया देखा जाने लगा है.
वो तहलका.कॉम का एक स्टिंग ऑपरेशन ही था जिसने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण के भविष्य को गर्त में धकेल दिया. आज तहलका के सामने लगभग उसी तरह के हश्र का ख़तरा मुंह बाए खड़ा है.
<link type="page"><caption> पढ़ेंः तेजपाल के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131122_tejpal_tehelka_probe_dp.shtml" platform="highweb"/></link>
तहलका के एक पत्रकार ने कंपनी में चल रहे घटनाक्रम के बारे में बीबीसी को फोन पर बताया, "तेजी से बदलते हालात में मैं हताश, निराश और डरा हुआ हूँ. मुझे जरा भी अंदाजा नहीं है कि कल मेरे साथ क्या होने वाला है?"
इस बीच तहलका के संस्थापक संपादक तरुण तेजपाल ने कंपनी की एक महिला कर्मचारी के यौन उत्पीड़न के आरोपों को खारिज करने के लिए कानूनी बचाव की शुरुआत कर दी है. लेकिन इसके साथ ही ये सवाल भी खड़ा हो गया है कि अपनी खोजी पत्रकारिता के बदौलत जबरदस्त शोहरत बटोरने वाली तलहका मैगज़ीन के लिए आगे का रास्ता क्या है?
तहलका की मशहूर और विवादास्पद पत्रकारिता का हथियार था गुप्त कैमरा और इसके स्टिंग ऑपरेशंस का शिकार बने छद्म रक्षा सौदों के नाम पर अवैध धन लेते नेता और फौजी अफ़सर. तहलका के गुप्त कैमरों ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों की फिक्सिंग की बातचीत करते हुए क्रिकेटरों को भी रिकॉर्ड किया.
खोजी पत्रकारिता

दक्षिणपंथी हिंदू भी तहलका के छुपे हुए कैमरों के सामने साल 2002 के गुजरात दंगों के दौरान मुसलमानों के कत्ल की बात कथित तौर पर कबूल करते देखे गए.
तहलका ही वह मैगज़ीन थी जिसने भारत के एक सीनियर जज पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की पड़ताल की थी और एक मॉडल के कत्ल के मशहूर मामले में बयान से मुकर गए एक गवाह के भंडाफोड़ का सेहरा भी इसी पत्रिका के सिर पर बंधा था.
इसके समर्थकों के लिए तलहका की पहचान उसकी बेखौफ और जुझारू पत्रकारिता थी. सत्ता में बैठे लोगों से दो-चार करने के उत्साह के साथ तहलका प्रकाशन ने मुख्यधारा की मीडिया में हाशिए पर छूट गए मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर उठाया. ये विडंबना ही है कि इन विषयों में भारत में औरतों की स्थिति जैसे 'जनहित के मुद्दे' भी थे.
<link type="page"><caption> पढ़ेंः मीडिया में यौन शोषण?</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131121_women_journalists_sexual_harassment_da.shtml" platform="highweb"/></link>
पत्रकारिता के हथियार के तौर पर गुप्त कैमरों के इस्तेमाल पर जबरदस्त बहस हुई लेकिन बाद में इस चलन को कई लोगों ने अपना लिया.
तहलका को अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी तेजी से शोहरत मिली. ब्रिटेन के दी गार्डियन अखबार ने लिखा, "भारत में खबरों के सबसे बेहतरीन स्रोतों में से एक."
बीबीसी ने कहा, "खोजी पत्रकारिता के क्षेत्र में तहलका ने बहुत काम किया है और संपादकीय दृष्टि से भी इसने नई सीमाएँ तय की हैं..."
लेकिन आलोचकों ने तहलका पर सत्तारूढ़ कांग्रेस से करीबी रखने और खास मकसद से की जाने वाली पत्रकारिता करने का आरोप लगाया. हालांकि तरुण तेजपाल इन आरोपों का लगातार खंडन करते रहे. कुछ लोग ये भी कहते हैं तहलका की पत्रकारिता से ज्ञान बघारने वाले प्रचार की गंध आती है.
तहलका पर कुछ लोगों का ये भी आरोप है कि ये पत्रिका खुलेआम एक पक्ष की तरफ खड़ी नजर आती है. बेहद साधारण वेतन पाने वाली तहलका की युवा, उत्साही और ऊर्जा से लबरेज करीब 50 लोगों की टीम को जल्दी ही भारत के सबसे बेहतर मीडिया टीम के तौर पर जाना जाने लगा. हालांकि तहलका छोड़कर जाने वाले लोगों का भी तांता लगा रहा.
इस्तीफ़ा

तरुण तेजपाल ने इसकी वजह बड़े मीडिया समूहों के मुताबिक वेतन देने की अपनी असमर्थता बताई. तहलका को कई बार निवेशकों से पैसा जुटाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा ताकि कंपनी चलती रहे. लेकिन अतीत में तहलका से जुड़ी रहीं मंजुला नारायण कहती हैं कि कई पत्रकारों ने कंपनी के काम करने के तौर तरीकों से नाखुश होकर मैगज़ीन छोड़ी.
लेकिन पिछले हफ्ते तहलका को उस वक्त सबसे बड़े खतरे का सामना करना पड़ा जब 50 वर्षीय तरुण तेजपाल पर महिला सहकर्मी का यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगा जिसके बाद वे मैगज़ीन के संपादक के पद से अस्थायी तौर पर हट गए. इस सिलसिले में तेजपाल फ़िलहाल पुलिस तफ़्तीश का सामना कर रहे हैं.
<link type="page"><caption> पढ़ेंः पीड़ित पत्रकार ने तहलका छोड़ा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131125_tehelka_journalist_resignation_vs.shtml" platform="highweb"/></link>
और जैसे ही तरुण तेजपाल ने खुद को संपादक की जिम्मेदारी से अलग किया, तहलका की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी आरोपों से घिरे तरुण का बचाव करती हुई दिखीं. शुरुआत में शोमा ने दावा किया कि पीड़िता मैगज़ीन की ओर से की गई कार्रवाई से 'संतुष्ट' है. बाद में शोमा ने इस कथित यौन उत्पीड़न के मामले में तरुण की अलग राय का हवाला देते हुए आरोप के दूसरे पहलू के बारे में बात की.
तहलका से इस्तीफ़ा देने से पहले मैगजीन के अगले अंक के लिए तरुण तेजपाल पर ही कहानी लिखने का सुझाव देने के बारे में सोच रहे एक पत्रकार ने बताया, "स्टाफ़ की एक मीटिंग में हमने शोमा से कहा भी कि वो इस मसले से ठीक से नहीं निपटीं. इससे तहलका की छवि और खराब हुई." लेकिन इस कहानी की पेशकश का उन्हें मौका मिलेगा भी या नहीं, वे इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं थे.
तहलका की मुश्किलों में और इजाफा करती हुए शोमा चौधरी ने भी गुरुवार को कार्यकारी संपादक के पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने मामले पर लीपा-पोती करने के आरोपों से इनकार किया और कहा, "तहलका के लिए ये एक मुश्किल वक्त है."
भविष्य अनिश्चित?

तरुण तेजपाल के कारोबारी दोस्त केडी सिंह के पास फिलहाल तहलका की 35 फीसदी हिस्सेदारी है. दो साल पहले ये हिस्सेदारी 65 फीसदी हुआ करती थी.
राज्यसभा सांसद केडी सिंह कहते हैं, "तहलका इससे बेहतर तरीके से निपट सकता था. शोमा और पीड़िता के बयान में बड़ा अंतर है. किसी ने मुझसे बात की होती तो मैं अलग सलाह देता."
तहलका की मिल्कियत अनंत मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के पास है. सरकारी दस्तावेजों के हवाले से कुछ मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है अनंत मीडिया प्राइवेट लिमिटेड केडीएस कॉरपोरेशन की सहायक कंपनी है. केडीएस कॉरपोरेशन के मालिक केडी सिंह हैं. तरुण तेजपाल के पास तहलका की 19 फीसदी हिस्सेदारी है.
तो सवाल उठता है कि क्या तहलका का भविष्य अनिश्चित है?
<link type="page"><caption> पढ़ेंः गिरफ्तारी से राहत नहीं</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131127_tehalka_parrikar_probe_goa_an.shtml" platform="highweb"/></link>
यौन उत्पीड़न के इस मामले के उभरने के बाद शोमा चौधरी समेत तहलका के छह पत्रकारों ने मैगज़ीन से इस्तीफा दे दिया है.
विरोध में तहलका छोड़ने वाले एक पत्रकार ने बताया, "मुझ पर कोई कर्ज नहीं है और मैं परिवार की कोई जिम्मेदारी भी नहीं उठा रहा. इसलिए मैंने इस्तीफ़ा देने का फैसला किया. लेकिन मेरे कुछ पूर्व सहकर्मी जॉब मार्केट की हालात खराब होने की वजह से पसोपेश में हैं."
'बदनामी' के दाग से जूझ रही तहलका अब एक अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ रही है. तहलका के वास्तविक मालिक केडी सिंह कहते हैं कि तरुण तेजपाल पर लगाए गए आरोप विचलित करने वाले हैं.
उन्होंने कहा, "पहले चार दिन मैंने किसी से भी बात करने से इनकार कर दिया क्योंकि मैं भी अचंभित था. उसके बाद मैंने एक बयान जारी किया क्योंकि मुझे अपनी स्थिति स्पष्ट करनी थी. मैंने तहलका की मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए इसमें निवेश किया था."
'कारोबारी निर्णय'

केडी सिंह जो कि तृणमूल पार्टी से राज्य सभा सांसद हैं वो कहते हैं "कौन गलत है और कौन सही', ये मैं नहीं तय करना चाहता. मैं 'आखिरी फ़ैसले' का इंतजार करूंगा. पत्रिका में हिस्सेदारी में कमी करने का फ़ैसला पूरी तरह एक 'कारोबारी निर्णय' होगा और इस घटना का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा."
सिंह ने आगे जोड़ा, "भले ही तरुण तेजपाल का नाम तहलका के साथ जुड़ा हुआ है लेकिन मैगज़ीन को किसी एक व्यक्ति के रास्ते से भटकने की सूरत में भी बने रहना चाहिए, चाहे लगाए गए आरोप सही साबित हो जाएँ."
तरुण तेजपाल और शोमा चौधरी से एसएमएस और ई-मेल के जरिए तहलका के भविष्य के बारे में पूछे गए सवालों का कोई जवाब नहीं मिल पाया. तरुण तेजपाल के एक करीबी रिश्तेदार ने बताया, "चीजें इतनी तेजी से हो रही हैं कि हमें नहीं पता कि अगले घंटे में क्या होगा. हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं."
स्वतंत्र पत्रकार परांजॉए गुहा ठाकुरता कहते हैं, "तहलका की साख पर लगे इस बड़े से धब्बे ने मैगज़ीन में निवेशकों के और पैसा लगाने की संभावना को लगभग खत्म ही कर दिया है."
वरिष्ठ पत्रकार हरतोष सिंह बल वर्ष 2006 में संपादकीय मतभेदों की वजह से तहलका से अलग हुए थे. वे कहते हैं, "तहलका का कोई भविष्य नहीं है. इसकी पहचान तरुण तेजपाल और शोमा चौधरी के नाम से जुड़ी हुई है. अब चूंकि उनकी छवि पर ही सवाल खड़े हो गए हैं तो पैसा जुटाने के मुद्दे पर आगे बचा क्या रह जाता है?"
लेकिन हर किसी ने उम्मीद नहीं छोड़ी है. तहलका के कुछ पत्रकारों ने कंपनी को चलाने के लिए एक बोर्ड के गठन का विचार सुझाया है जिसमें स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को जगह दी जाए. ठाकुरता उम्मीद जताते हैं कि ये विचार तहलका की साख को बचाने में मदद कर सकता है.
केडी सिंह की नजर में ये एक अच्छा विचार है. वे कहते हैं, "मैं धुंध के छंटने का इंतजार कर रहा हूँ लेकिन फ़िलहाल मैं इस कदर निराश हूँ कि मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है."
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