'काम ऐसा कीजिए जिसमें ख़तरा कम और फ़ायदा ज़्यादा हो'

- Author, सुहैल हलीम
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
आख़िर वो घड़ी आ ही गई जिसका कुछ को डर था, कुछ को बेसब्री से इंतज़ार. कभी न कभी तो यह होना ही था. ज़िंदगी का यही दस्तूर है.
सचिन तेंदुलकर का आख़िरी टेस्ट मैच बस अब शुरू होने को है और जब यह मैच ख़त्म हो जाएगा, जो ज़्यादा से ज़्यादा पाँच दिन में होना ही है तो सवा अरब लोगों की ज़िंदगी में एक ऐसा ख़ालीपन पैदा हो जाएगा जिसे रोहित शर्मा और मोहम्मद शामी मिलकर भी नहीं भर पाएँगे. कम से कम अख़बारों से तो यही लग रहा है.
लेकिन एक शख्स ऐसा भी है जो पोलिटकली करेक्ट बातें करना नहीं जानता. पाकिस्तान के मशहूर बल्लेबाज़ जावेद मियाँदाद ने कहा है कि सचिन के जाने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. उनकी कमी महसूस नहीं होगी क्योंकि भारतीय टीम में सक्षम खिलाड़ियों की कोई कमी नहीं है.
मियाँदाद ने यह भी कहा कि सचिन को दो साल पहले ही सन्यास ले लेना चाहिए था और टीम में रुककर सचिन ने वही ग़लती की है जो ख़ुद मैंने की थी.
जावेद भाई नहीं समझते कि कभी-कभी मौक़े की नज़ाकत को भी समझना चाहिए. वो भूल गए कि सचिन उस वक़्त से इंडियन क्रिकेट टीम की सेवा कर रहे हैं जब वो मासूम बच्चे थे.
क्रिकेट बोर्ड के ओहदेदार इतने रसूख़ वाले न होते तो सचिन को खिलाने के बदले बाल श्रम के आरोप में शायद वो जेल जा सकते थे.
जावेद भाई, बहुत से लोगों के लंबे इंतज़ार को बस अब ख़त्म होने दीजिए और दुआ कीजिए की सचिन अपनी आगे की ज़िंदगी में जो भी करें उसमें कामयाब रहें और साल छह महीने बाद रिटायरमेंट ख़त्म करके टीम में वापस आने की कोशिश न करने लगें!
क्योंकि वो कई बार कह चुके हैं कि उन्हें क्रिकेट के अलावा कुछ और नहीं आता. तो ऐसे में बस यही शेर याद आता है, "करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम, मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता."
इंसाफ़ का तराज़ू

मंगल के लिए भारत का ऐतिहासिक मिशन हो या सियासी परिदृश्य पर नए चमकते हुए सितारे, बड़े लोगों के बड़े कारनामों का ज़िक्र तो आप पढ़ते ही रहते हैं लेकिन यह डायरी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में है जिसका आपने शायद नाम भी न सुना होगा.
आसिफ़ ने पंद्रह साल पहले दसवीं की परीक्षा दी थी. शायद तैयारी पूरी नहीं थी या बिल्कुल नहीं थी इसलिए उन्होंने अपनी जगह किसी दूसरे बच्चे को इम्तिहान देने भेज दिया. दोनों की शक्लें ज़्यादा नहीं मिलती थीं इसलिए परीक्षा के दौरान उनकी जगह बैठने वाला लड़का पकड़ा गया.
मुक़दमा क़ायम हुआ और अब पंद्रह साल बाद दिल्ली की एक अदालत ने आसिफ़ को तीन साल क़ैद की सज़ा सुनाई है. इस दौरान आसिफ़ ने शादी कर ली और अब उसके तीन बच्चे भी हैं. आसिफ़ की कहानी से कई सबक़ मिलते हैं. भारत में आप और कुछ भी कर लें लेकिन बोर्ड के इम्तिहान में नक़ल न करें.
क्योंकि नक़ल करने वाले को यहाँ बख़्शा नहीं जाता और अगर करें भी तो फिर शादी नहीं करें क्योंकि जब पंद्रह साल बाद जेल जाना पड़ेगा तो बीबी बच्चों को बहुत परेशानी होगी.
अगर क़ानून तोड़ना आपका शौक़ या मजबूरी है तो आप मैच फ़िक्सिंग कर सकते हैं जिसके लिए भारत में आज तक किसी को अदालत में सज़ा नहीं सुनाई गई है. अगर आप जेल जाने से नहीं डरते हैं तो सरकारी ख़ज़ाना भी लूट सकते हैं. सज़ा ज़्यादा से ज़्यादा पाँच साल, चाहे तो लालू प्रसाद यादव से पूछ लीजिए.
ऐसे में कम से कम बुढ़ापा तो आराम से गुज़रेगा. इस तरह के उदाहरणों की सूची लंबी है लेकिन आप अब तक मेरा मतलब समझ ही गए होंगे, काम ऐसा कीजिए जिसमें ख़तरा कम और फ़ायदा ज़्यादा हो और स्कूल के सर्टिफ़िकेट की उसमें कोई ज़रूरत न हो.
भारत की मुद्रा या पाकिस्तानी

यह इल्ज़ाम तो पुराना है लेकिन अब अख़बारी जानकारी के मुताबिक़ भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने संसद की एक समिति को बताया है कि भारत में जो जाली नोट प्रचलन में हैं उनके स्तर से साफ़ ज़ाहिर होता है कि वो पाकिस्तान के सरकारी छापेख़ाने में छपते हैं.
यह इल्ज़ाम किस हद तक सही है ये तो शायद कभी मालूम न हो लेकिन इसके मद्देनज़र कुछ दिलचस्प सवाल ज़रूर उठते हैं. जैसे, क्या भारतीय मुद्रा का मूल्य इसलिए आश्चर्यजनक रूप से गिरा है क्योंकि ये नोट उसी छापेख़ाने में छप रहे हैं जहाँ बेहद कमज़ोर पाकिस्तानी मुद्रा के नोट छपते हैं.
और अगर वहाँ छपाई का स्तर इतना ही अच्छा है तो भारत सरकार अपनी नोटों की छपाई का पूरा ठेका ही पाकिस्तान सरकार को क्यों नहीं दे देती? ऐसा करने से कुछ और नहीं तो कम से कम जाली नोटों की समस्या तो ख़त्म हो ही सकती है.
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