पाक: जिहादियों का बोरिया बिस्तर समेटना क्यों मुश्किल है

- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
बीते हफ़्ते पाकिस्तान के उर्दू अखबारों में जहां एक ड्रोन हमले में तालिबान कमांडर हकीमुल्लाह महसूद की मौत और चरमपंथियों से बातचीत की सरकार की घोषणा चर्चा रही तो भारत में आम चुनावों से पहले बनते बिगड़ते राजनीति समीकरण सुर्खियों में बने हुए हैं.
पिछले दिनों दिल्ली में सांप्रदायिकता के विरोध में जुटी 17 पार्टियों के सम्मेलन पर 'अख़बारे मशरिक़' का संपादकीय है- सिर्फ हवाई इरादे, बुनियाद मज़बूत नहीं.
<link type="page"><caption> उर्दू अखबारों में सचिन की धूम</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/10/131012_urdu_press_review_aa.shtml" platform="highweb"/></link>
अख़बार कहता है कि तालकटोरा स्टेडियम में हुए सम्मेलन को यूं तो गैर कांग्रेसी और गैर बीजपी मंच कहा गया लेकिन वहां मौजूद नेताओं ने कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन की आलोचना करने से गुरेज किया. उनका सारा नजला आरएसएस, बीजेपी, उसकी तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर गिरा.
अख़बार लिखता है कि सच तो यह कि इस सम्मेलन में हिस्सा लेने वाली पार्टियां चुनाव के बाद इस या उस गठबंधन में शामिल होने के लिए मारी मारी फिरेंगी. इनकी बुनियाद बहुत कमज़ोर है और इन पर कोई मजबूत ढांचा नहीं खड़ा हो सकता है.
अखिलेश की नाकामी
'हिंदुस्तान एक्सप्रेस' ने अपने संपादकीय को शीर्षक दिया है- 'सरदार पटेल का सियासी इस्तेमाल'.
अख़बार लिखता है कि सरदार पटेल के सिलसिले में कांग्रेस और बीजेपी में ज़ुबानी जंग छिड़ी हुई है. कुछ लोगों को महसूस हो रहा है कि जिस तरह जवाहर लाल नेहरू का झुकाव सेक्युलरिज़्म की तरफ़ था, उसी तरह सरदार पटेल का झुकाव हिंदुत्व की तरफ था.
अख़बार के अनुसार पहले भी स्वतंत्रता सेनानियों को जात पात और किसी ख़ास इलाके का प्रतीक बना कर उनकी प्रतिमाएं लगवाने या उन्हें अपने दौर का महानतम व्यक्ति क़रार देने की कोशिशें होती रही हैं लेकिन इस पूरी कवायद में उनके नज़रिए को पलट देने की कोशिश पहली बार हो रही है.
<link type="page"><caption> मनमोहन-शरीफ वार्ता पर मिली जुली प्रतिक्रिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/09/130930_pak_newspapers_on_inidia_pak_talks_ra.shtml" platform="highweb"/></link>
उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले में फिर हिंसा होने पर 'जदीद ख़बर' लिखता है कि मुसलमानों के जानो माल के लंबे चौड़े दावे करने वाली अखिलेश यादव सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने में फिर नाकाम रही है.
अख़बार के मुताबिक़ सांप्रदायिक और फ़साद करने वाले तत्वों के हौसले इस क़दर बुलंद हैं कि उन्हें न तो सरकार का कोई ख़ौफ़ है और न ही वो क़ानून से डरते हैं. छोटी सी अवधि में दो बार इस तरह के घटनाओं में मुसलमानों को निशाना बनाए जाने को संयोग नहीं कहा जा सकता है.
अखबार कहता है कि ताज्जुब की बात तो ये है कि मुसलमानों के वोटों से सत्ता में आने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार इस तरह की घटनाओं को नहीं रोक पा रही है. पिछली बार हुई हिंसा के दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई न कर पाने के कारण फिर ऐसी हिंसा हुई है.
जिहाद की चुनौती

कराची से छपने वाले 'जंग' ने तालिबान के नेता की खबर पर सुर्खी लगाई, तहरीके तालिबान के नेता की हकीमुल्लाह महसूद की ड्रोन हमले में मौत.
अख़बार की ख़बर के मुताबिक ये हमला उत्तरी वज़ीरिस्तान में तब हुआ जब तालिबान के कमांडरों की अहम बैठक हो रही थी.
इससे पहले तालिबान से बातचीत शुरू करने की प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की घोषणा को सभी अखबारों ने अपने पहले पन्ने पर जगह दी.
<link type="page"><caption> फतवों की मुसीबत और हकीकत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130831_fatwa_cartoon_islam_deoband_vr.shtml" platform="highweb"/></link>
लाहौर से छपने वाले दैनिक 'इंसाफ' ने इस पर संपादकीय लिखा है कि भले ही सरकार के आलोचक उस पर तालिबान से बातचीत पर गंभीर न होने का आरोप लगाएं लेकिन सरकार ने दो टूक कहा है कि इस बारे में काम जारी है और कुछ धार्मिक नेताओं के जरिए उनसे संपर्क किया जा रहा है.
अख़बार कहता है कि अगर कुछ लोग ये समझ रहे हैं कि चंद दिनों में आमने सामने बैठेंगे और चार दिन में उनके बीच कोई समझौता हो जाएगा तो वो गलतफहमी का शिकार हैं.
तालिबान की दिलचस्पी
अख़बार के अनुसार बातचीत के लिए दोनों पक्षों की रज़ामंदी के बाजवूद सबसे बड़ी समस्या ये है कि सरकार संविधान के दायरे मे रह कर ही बातचीत करना चाहती है जबकि तालिबान के कुछ तत्व पाकिस्तानी संविधान को छोड़ शरियत को लागू करने की बातें कर रहे हैं.
वैसे देखना होगा कि हकीमुल्लाह की मौत के बाद बातचीत में तालिबान की कितनी दिलचस्पी बचेगी.
दैनिक 'एक्सप्रेस' ने अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी के इस बयान को पहले पन्ने पर जगह दी कि पाकिस्तान में जिहादी गुटों को ख़त्म किए बिना अमन संभव नहीं है.
<link type="page"><caption> पाक प्रेस में जश्न</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/05/130512_pakistan_celebrations_ss.shtml" platform="highweb"/></link>
हक्कानी का कहना है कि पाकिस्तान में जिहादियों के लिए राष्ट्रीय स्तर समर्थन पाया जाता है इसलिए किसी भी सरकार के लिए जिहादियों का बोरिया बिस्तर समेटने मुश्किल काम है, लेकिन पकिस्तान में ऐसा किए बिना अमन मुमकिन नहीं है.
अख़बार के अनुसार हक्कानी ने ये भी कहा है कि अमरीका इस धोखे में न रहे कि पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक मदद देकर उसे पाकिस्तान पर असर डाल सकता है. हक्कानी कहते हैं कि पाकिस्तान में सत्ता प्रतिष्ठान सिर्फ वही करता है जो उसे अपने हित में दिखाई देता है.
कश्मीर पर मध्यस्थता

दैनिक 'औसाफ़' ने एक बार फिर कश्मीर के मुद्दे पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की मांग पर लिखा है कि जब कश्मीर के मुद्दे पर दोनों पक्षों में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नही है तो तीसरे पक्ष की मध्यस्थता बेहद अहम हो जाती है.
लेकिन भारत किसी भी सूरत में इस मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि वो इस मसले का हल नहीं चाहता है और इसे यूं ही लटकाए रखना चाहता है. अख़बार के अनुसार अगर भारत की दिलचस्पी इसे हल करने में होती तो भला संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के बढ़कर और क्या विकल्प हो सकात है, लेकिन चूंकि भारत को पहले से ही हकीकत का पता है, इसलिए वो यूं ही ढुलमुल रवैया अपनाए रखेगा.
इसी विषय पर दैनिक 'वक्त' ने लिखा है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य न हो पाने की एक बड़ी वजह कश्मीर है, इस मुद्दे पर दोनों देशों में लडाई भी हो चुकी हैं.
अख़बार कहता है कि ये हक़ीक़त सब जानते हैं कि 1948 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कश्मीर मुद्दे को हल के लिए संयुक्त राष्ट्र ले गए, लेकिन भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीरियों को दिए गए जनमत संग्रह के हक से उन्हें आज तक वंचित रखा है.
'वक्त' ने भी अब कश्मीर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की तीसरे मध्यस्थता की मांग को दुरुस्त बताया है.
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