पटना में मोदी: घावों पर मरहम या सियासी दांव?

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवादाता
नरेंद्र मोदी, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, एक सप्ताह के अंदर दूसरी बार फिर पटना का रुख़ कर रहे हैं. इस बार उनके दौरे का उद्देश्य पिछले रविवार को उनकी रैली से पहले पटना में हुए बम विस्फ़ोटों में मारे गए छह लोगों के परिजनों से मिलना है.
मोदी शनिवार सुबह से ही छह गांवों के दौरे पर हैं जहां उन्हें पीड़ित परिवारों से मिलना है.
पटना विस्फोटों के बाद भाजपा के नेताओं ने देश के 23 अलग अलग शहरों में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ अलग अलग आरोप लगाए.
किसी ने कहा वो सिर्फ कांग्रेस के क़रीब आना चाहते हैं, किसी ने सुरक्षा में ढील की बात कही. लेकिन एक बात सभी ने कही कि वो मृतकों के परिवार वालों से मिलने भी नहीं गए.
इसके बाद नीतीश कुमार ने अपने एक भाषण में नरेंद्र मोदी के गांधी मैदान के भाषण का ठोस जवाब देने की कोशिश की. लेकिन इस भाषण में <link type="page"><caption> बम के</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131101_patna_blast_einul_ap.shtml" platform="highweb"/></link> पीड़ितों से सहानुभूति न दिखाने पर वो भाजपा के बिहार अध्यक्ष सुशील मोदी की आलोचना का शिकार बने.
नीतीश के गढ़ में सेंध
ऐसे में नरेंद्र मोदी पीड़ित परिवारों से मिलने बिहार जा रहे हैं. ज़ाहिर है मोदी के इस दौरे के लिए उनके समर्थक उनकी सराहना करेंगे. उनके आलोचक कहेंगे वो इसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं.
<link type="page"><caption> नीतीश कुमार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131030_nitish_modi_bjp_ssr.shtml" platform="highweb"/></link> अपने बचाव में यह कह सकते हैं कि <link type="page"><caption> बम विस्फोट</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131030_imtiyaj_connection_patna_blast_vs.shtml" platform="highweb"/></link> कि रात वो घायलों से मिलने अस्पताल गए थे लेकिन उनके आलोचक उन्हें याद दिला सकते हैं कि मुख्यमंत्री कुछ महीने पहले मिडडे मील स्कीम के अंतर्गत भोजन करने के बाद मरने वाले स्कूल के बच्चों के परिवार वालों से अब तक नहीं मिले हैं.

वहीं नरेंद्र मोदी के बारे में भी उनके आलोचक ये कहते हैं कि वो दस साल बाद गुजरात दंगों के पीड़ित परिवारों से मिलना तो दूर उनके आंसू पोछने भी नहीं गए. लेकिन ये दस साल पुरानी बात है और कहते हैं राजनीति में एक सप्ताह एक लम्बा समय होता है.
रविवार को गांधी मैदान में अपने भाषण के बाद एक सप्ताह के अंदर राज्य में लौटने का मतलब साफ़ है कि मोदी को यह अंदाज़ा हो गया कि बिहार में उनकी रैली सफल रही है और नीतीश कुमार के गढ़ में सेंध मारने में वह कामयाब रहे हैं.
दूसरी तरफ उनके आलोचकों को इसमें संदेह नहीं कि बिहार में पीड़ितों के परिवारों से मिलने के पीछे <link type="page"><caption> मोदी की रणनीति</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131031_modi_statue_of_unity_rns.shtml" platform="highweb"/></link> के पीछे राजनीति है और यह भी कि आगामी आम चुनावों को देख कर यह क़दम उठाया जा रहा है.
नरेंद्र मोदी की राजनीति पर गहरी निगाह रखने वाले अमरीका में रहने वाले राजनीतिक जानकार पंडित सदानंद धूमे कहते हैं, "मोदी का ऊंचा क़द, उनकी योग्यता, ईमानदारी और कड़ी मेहनत उनकी सफलता का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन साथ ही उनके कई विरोधियों के लिए वो उच्च महत्वाकांक्षा और आत्म उन्नति के एजेंट हैं."
कहा जाता है कि मोदी की राजनीति नैतिकता के आधार पर है. उनके परस्पर विरोधी और उनके समर्थक उनकी नैतिकता पर निर्भर राजनीति को सामने रख ही अपनी राय बनाएंगे.
दोनों पक्ष बिहार में बम विस्फ़ोटों के घायलों से नरेंद्र मोदी की इस मुलाक़ात को सियासी नैतिकता के इसी तराज़ू में तोलेंगे.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml " platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












