अध्यादेश पर विवाद: मनमोहन-राहुल मुलाक़ात

दाग़ी नेताओं को बचाने वाले अध्यादेश के मुद्दे पर चल रहे विवाद के बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात की है.
बुधवार सुबह लगभग 10 बजे राहुल गांधी प्रधानमंत्री के निवास सात रेसकोर्स रोड पहुंचे. दोनों के बीच लगभग आधे घंटे तक बातचीत हुई लेकिन मुलाक़ात का आधिकारिक ब्यौरा अभी तक नहीं मिल सका है.
ग़ौरतलब है कि कुछ दिनों पहले राहुल गांधी ने दिल्ली के प्रेस क्लब में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा था कि ये अध्यादेश बकवास है और इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए.
उसके बाद से ही केन्द्र की यूपीए सरकार चौतरफ़ा हमले झेल रही है और ऐसी ख़बरें आने लगीं थीं कि सरकार इस अध्यादेश को वापस ले लेगी.
राहुल गांधी ने ये बयान ऐसे समय में दिया था जब प्रधानमंत्री अमरीका गए हुए थे.
अमरीका से लौटते वक़्त मनमोहन सिंह ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था कि वह इस विषय पर राहुल गांधी से बात करेंगे और ये जानने की कोशिश करेंगे कि उनकी नाराज़गी की वजह क्या है और उन्होंने किन हालात में ऐसे बयान दिए.
अध्यादेश के मुद्दे पर बुधवार को ही कैबिनेट में चर्चा की जाएगी. बुधवार को ही दोपहर में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाक़ात करेंगे.
प्रतिक्रिया

इस बीच यूपीए के समर्थक दलों और विपक्षी पार्टियों के बयान भी आने लगे हैं.
यूपीए को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी ने अध्यादेश को वापस लिए जाने का विरोध किया है.
सपा के नरेश अग्रवाल ने एक टीवी चैनल से बातचीत के दौरान कहा कि सरकार को किसी भी हालत में अध्यादेश वापस नहीं लेना चाहिए.
नरेश अग्रवाल का कहना था, ''अध्यादेश वापस लेने से साबित हो जाएगा कि प्रधानमंत्री कमज़ोर होता है और व्यक्ति बड़ा होता है.''
अग्रवाल ने कहा कि सर्वदलीए बैठक में भी भारतीय जनता पार्टी समेत सभी पार्टियों ने इसका स्वागत किया था.
उधर भाजपा ने कहा है कि अध्यादेश देश के हित में नहीं है. पार्टी के वरिष्ठ नेता मोख़्तार अब्बास नक़वी का कहना था, ''अगर अध्यादेश वापस लिया जाता है तो ये देश और देश की जनता की जीत है.''
जनता दल-यू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने कहा कि सहयोगी दलों को भरोसा में लिए बग़ैर सरकार नहीं चल सकती. तिवारी के अनुसार कांग्रेस को गठबंधन सरकार के बारे में अभी और तजुर्बे की ज़रूरत है.
ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि दो साल से ज़्यादा दिनों तक जेल की सज़ा पाने वाले सांसदों और विधायकों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी जाएगी और वो अगला चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे.
इस फ़ैसले को निरस्त करने के लिए सरकार ने लोक सभा में एक बिल पेश किया जिसे सदन ने पारित कर दिया. राज्य सभा में बिल आने के बाद इसे स्टैंडिंग कमेटी के पास भेज दिया गया और फ़िलहाल बिल स्थायी समिति के पास ही है.
लेकिन इसी बीच सरकार ने अध्यादेश लाने का फ़ैसला कर लिया.
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