'सरकार को तलवार की धार पर चलना होगा'

- Author, प्रभाकर सिन्हा
- पदनाम, आर्थिक मामलों के जानकार
उम्मीद थी कि पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी का आंकड़ा पांच प्रतिशत से ज़्यादा होगा क्योंकि पिछले तिमाही में 4.9 प्रतिशत की दर से विकास हुआ था और लोगों को उम्मीद थी कि इस बार हालात सुधरेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
इसका मतलब है कि आर्थिक मंदी धीरे-धीरे गहराती जा रही है.
इसे रोकने के लिए भारत सरकार को बहुत जल्दी, बहुत प्रभावी कदम उठाने की ज़रूरत है ताकि अर्थव्यवस्था को फिर से विकास की पटरी पर लाया जा सके.
विकास गति धीमी होने के कई कारण हैं.
कारण
एक कारण है कई परियोजनाओं का अधर में पड़ा होना. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि सरकार प्रशासनिक स्तर पर किसी भी योजना को लागू नहीं करवा पा रही है. इसमें या तो पर्यावरण मंत्रालय की आपत्ति आ जाती है या फिर भूमि अधिग्रहण की समस्या आ जाती है.

इन हालात में निवेशक सोचता है कि पता नहीं यह परियोजना कब शुरू हो और वो उसे छोड़ कर चला जाता है और दूसरा नया निवेशक भी परियोजना शुरू ही नहीं करता.
एक अन्य वजह है निवेश में कमी. इसके लिए प्रशासनिक देरी के साथ ही मंहगाई या मुद्रास्फिति का बढ़ना भी है.
मंहगाई बढ़ने की वजह से मांग घटती जा रही है. तो ज़ाहिर है कोई भी निवेश नहीं करना चाहेगा क्योंकि वो सोचेगा कि मांग नहीं होगी तो हमारा माल नहीं बिकेगा और इसलिए वो उत्पादन नहीं करेगा.
साथ ही रुपये का मूल्य और ब्याज़ दर बढ़ गई हैं, ऐसे में कोई भी बाज़ार से उधार कोई भी मार्किट में नहीं लगाना चाहता.
उठाने होंगे मुश्किल कदम
आर्थिक संकट गहराने की एक और वजह डॉलर के मुक़ाबले रुपये का लगातार गिरना भी है.

अगर ये जारी रहा तो इससे मंहगाई बढ़ेगी. उसपर काबू करने के लिए जो भी कदम उठाए जाएंगे उससे ब्याज़ दर बढ़ेगी और उससे फिर आर्थिक मंदी आएगी. यानी ये एक दुष्चक्र बन गया है जिसे तोड़ना सरकार के लिए आसान नहीं होगा. सरकार को पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में बढ़ोतरी जैसे कुछ कठिन कदम उठाने होंगे.
अगर पेट्रोल की कीमत बढ़ेगी तो इससे ख़पत कम होगी, जिसकी वजह से आयात कम होगा और डॉलर की कम ज़रूरत पड़ेगी और इन सारे कारणों से अर्थव्यवस्था को फ़ायदा होगा.
लेकिन इसका दूसरा असर ये भी हो सकता है कि इससे आर्थिक चुनौतियां और बढ़ जाएं जिससे नौकरियां जाने का ख़तरा जैसी समस्याएं भी आ सकती हैं.
तो ये तलवार की धार पर चलने के समान है इसलिए सरकार को बहुत सोचसमझ कर कदम उठाने होंगे.
हालांकि पहली तिमाही में निर्माण क्षेत्र ने अच्छा प्रदर्शन किया है और मॉनसून अच्छा रहा जिससे सरकार की उम्मीदे बढ़ी हैं.
इससे शायद ग्रामीण इलाकों में थोड़ी मांग बढ़ जाए लेकिन वो इतनी नहीं होगी कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार आ जाए. उसके लिए ज़रूरी था सेवा क्षेत्र और ख़ासकर निर्माण क्षेत्र में विकास को तेज़ करना.
अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए और विकास की गति तेज़ करने के लिए कठिन फैसलों की ज़रूरत जो आम आदमी के खिलाफ़ जाएं. ऐसा नहीं किया गया तो स्थिति और ख़राब हो जाएगी और चुनावी साल में ये फैसले लेना सरकार के लिए आसान नहीं होगा.
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