'गांव उबारेंगे देश को आर्थिक बदहाली से'

- Author, देवेंदर शर्मा
- पदनाम, कृषि विशेषज्ञ, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
रुपए में लगातार गिरावट और रेटिंग एजेंसी फिच की डाउनग्रेड की धमकी के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था साल 1991 के बाद सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है. लेकिन 6.90 करोड़ टन के खाद्यान्न भंडार और अच्छे मॉनसून की वजह से मायूस होने की कोई बात नहीं है.
बुरी से बुरी बात हो, भारत के ख़ाने-पीने का इंतज़ाम हो जाएगा.
ऐसे समय में जब शहरों में लोग अपनी कमर कस रहे हों और शेयर बाज़ार ग़मगीन हों तो भारतीय कंपनियां गांवों का रुख कर रही हैं.
यही नहीं कुछ सालों से एफएमसीजी सेक्टर यानी तेल, साबुन, शैम्पू और ऐसी ही दूसरी चीज़ों की कंपनियां दूरदराज़ के इलाकों में पहुंचने की आक्रामक कोशिश कर रही हैं.
अब सुज़ुकी, होन्डा, महिंद्रा एंड महिंद्रा, वीडियोकॉन, एलजी और बड़ी टेलीकॉम कंपनियां जैसे वोडाफोन, भारती और आइडिया भी ग्रामीण भारत पर ध्यान दे रही हैं.
इसकी साफ़ वजह है गांवों के बाज़ार का 10 से 14 फीसदी की रफ्तार से बढ़ना.
ग्रामीण समृद्धि का मॉडल
अक्टूबर में फसल की कटाई के बाद किसानों के हाथ में और पैसा आने की उम्मीद से उद्योग चमक रहे हैं.
हालांकि जब निराश कर देने वाली कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से पैसा भारतीय कंपनियों के खातों में जाएगा, तब भारत को चाहिए एक ऐसा मॉडल जो गांवों में भी समृद्धि लाए. ऐसा आर्थिक मॉडल होने से आर्थिक विकास के पहिए हमेशा घूमते रहेंगे.
यहीं भारत लड़खड़ा रहा है. आर्थिक विचार और योजना को स्टैंडर्ड एंड पूअर, फिच और मूडीज़ जैसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के हवाले कर भारत के नीति निर्माता ऐसी स्थायी विकास नीतियां तैयार करने में नाकाम रहे हैं जो गांवों में भी खुशहाली लाए. उन गांवों में जहां 70 करोड़ लोग रहते हैं.
वर्ल्ड बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने ख़ुद ये माना है कि ‘समावेशी विकास’ का वक़्त पूरा हो चुका है.
उन्होंने सलाह दी है कि आर्थिक विकास का नया आधार ‘समझदारी से भरा विकास’ होना चाहिए.
खेती हार का सौदा

ये साल 2004-2008 के दौरान ही साफ़ होना चाहिए था जब भारत की अर्थव्यवस्था नौ फीसदी के हिसाब से बढ़ रही थी. योजना आयोग के करवाए गए एक अध्ययन से आंखें खुल जानी चाहिए थीं.
ऊंचे आर्थिक विकास के इस दौर में कृषि क्षेत्र में 1 करोड़ 40 लाख नौकरियां और फैक्ट्रियों से 53 लाख नौकरियां जा चुकी थीं.
दूसरे शब्दों में कहें तो खेती और फ़ैक्ट्रियों का उत्पादन.. दोनों ही ऊंची आर्थिक विकास दर की भेंट चढ़ चुके थे.
अब ये पता चला है कि इतिहास में पहली बार खेतों में काम करने वाले भूमिहीन मज़दूरों की तादाद उनसे ज़्यादा हो गई है जिनके पास ज़मीन है.
खेती अब हार का सौदा बन चुकी है.
अगर इतना ही काफ़ी नहीं है तो साल 2010 में मकिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट: ‘इंडिया अर्बन अवैकनिंग: बिल्डिंग इनक्लूसिव सिटीज़, सस्टेनिंग इकोनॉमिक ग्रोथ’ यानी ‘भारत का शहरी जागरण: समावेशी शहरों का निर्माण, आर्थिक विकास दर को बनाए रखना’ हमारे सामने निराश कर देने वाली तस्वीर पेश करती है.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2010-2020 के बीच भारत में नई नौकरियों का 70 फीसदी हिस्सा शहरों में होगा और ये गांवों में मिलने वाली नौकरियों से दोगुना ज़्यादा फायदे वाली होंगी.
आसान शब्दों में कहें तो मकिंसे रिपोर्ट आर्थिक उदासी की ओर इशारा करती है.
जब गांवों के युवाओं को ज़्यादा बेहतर नौकरियों के लालच में शहरों की ओर खींच लिया जाएगा तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ढहना तय है.

ये ‘समझदारी से भरा विकास’ नहीं है. खेती को मुनाफे का सौदा बनाने और गांवों की अर्थव्यवस्था में निवेश करने के बजाय पूरा ध्यान गांवों की जनसंख्या को शहरों में खींच लेने पर है. इसलिए जब गांव खाली होंगे तब अंत में खाद्य सुरक्षा को ही सबसे ज़्यादा खामियाज़ा भुगतना होगा.
आशा की किरण
खाद्य सुरक्षा बिल के तहत जिस अनाज का वादा किया गया है वो भविष्य में विदेश से आएगा. जब दुनिया के बाज़ारों में आसानी से अनाज मिल नहीं रहा है तब आयात किया गया अनाज चालू खाते के घाटे को और बढ़ाएगा ही.
क्या अब कोई रास्ता बाकी बचा है?
गांवों में समृद्धि लाने का क्या कोई ऐसा तरीका है जो स्थायी भी हो और टिकाऊ भी?
हर एक शख़्स के लिए आर्थिक विकास लाने का रास्ता महाराष्ट्र के हिवरे बाज़ार से जाता है. कभी ये गांव सूखाग्रस्त था. जहां शहरों की ओर पलायन ही ज़िंदा बचने का रास्ता था. इस गांव में अब 60 लखपति हैं.
शराब और तंबाकू पर पाबंदी है. और कोई भी खुले में शौच करता नहीं दिखाई देता. इस गांव ने ये कर के दिखाया है कि कैसे पर्यावरण के नज़रिए से बर्बाद हो चुका एक इलाका चहल-पहल भरा बाज़ार बन सकता है.
अगर आर्थिक विकास का मूल विचार जनसंख्या के एक बड़े हिस्से तक समृद्धि पहुंचाना है तो मैं हिवरे बाज़ार को मिसाल पेश करने वाला मानता हूं.
कल्पना करिए कि अगर साल 2020 तक भारत के 6.4 लाख गांवों में से सिर्फ आधे गांव आत्मनिर्भर हो जाएं और हर गांव में 30 लोग लखपति हों तो भारत के गांवों में 10 करोड़ लखपति होंगे. तब अर्थव्यवस्था का आधार हमेशा से उपेक्षित रहे भारत में होगा और वहीं भविष्य है.
हर आपदा एक मौका देती है. भारत की अर्थव्यवस्था में गिरावट भी नीति में सुधार करने का एक ऐसा मौका है जिससे विकास के टिकाऊ मॉडल पर ध्यान दिया जा सके.
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