'ये बिजली भला किस काम आती है'

- Author, संजॉय मजूमदार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
उत्तरप्रदेश के गाँव पूर्वा में मिट्टी और ईंट से झोंपड़ी में सुखरानी रात के खाने के लिए मसूर की दाल बना रही हैं और वह भी अँधेरे में.
कुछ ही सालों में 60 साल की होने जा रही इस महिला के पास रोशनी के नाम पर सिर्फ जलती मोमबत्ती और चूल्हे की आग ही हैं.
सुखरानी के गाँव में बिजली नहीं है, क्योंकि ये कभी यहाँ तक पहुंची ही नहीं.
चेहरे से पसीना पोंछते हुए सुखरानी कहती हैं, " मैं कभी बिजली का बल्ब नहीं देखा."
उन्होंने बताया, "जिस गाँव में मेरा जन्म हुआ था, उसमे भी बिजली नहीं थी और शादी के बाद यहाँ आए तो यहाँ भी बिजली नहीं मिली.
पूर्वा भारत के उन हज़ारों गाँवों में से एक है, जहाँ अब तक बिजली नहीं पहुँच पाई है या फिर जहाँ बिजली किश्तों में आती है.
भारत की स्वतंत्रता के 66 साल बीत गए हैं. इसके बाद भी एक अनुमान के मुताबिक देश की एक अरब 20 लाख आबादी के आधे से ज़्यादा लोगों को अभी बिजली नहीं मिल सकी है.
सुखरानी की तरह ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया है.
वह कहती हैं, मैंने सुना है कुछ लोगों के पास बिजली है, लेकिन मैंने कभी नहीं देखी, इसलिए मुझे नहीं पता कि यह किस काम आती है."
'अच्छा और रोशन'

लेकिन पूर्वा से केवल पाँच किमी दूर, पास के जनगाँव में हालातों की तस्वीर बिलकुल अलग है.
चूड़ी बनाने वाले अशरफ़ अली भी सुखरानी जैसी झोंपड़ी में ही रहते हैं लेकिन यह सौर उर्जा से चलने वाली <link type="page"><caption> लैंप के सफ़ेद प्रकाश में</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/04/130320_lighting_bulbs_technology_vr.shtml" platform="highweb"/></link> नहाई हुई है.
अशरफ़ अली के बगल में एक पंखा रखा है, यह पंखा भी सौर उर्जा से ही चलता है.
पर इस सबके लिए उन्हें हर महीने कुछ खर्चा करना पड़ता है.
अशरफ़ और उनकी पत्नी पास के बाज़ार में बेचने के लिए रात को चटख रंगों वाली लाख की चूड़ियाँ बनाते हैं. अशरफ़ के घर में एक और कमरा है जिसमें उनके बच्चे भी सफ़ेद रोशनी में पढ़ते हैं.
अशरफ़ कहते हैं, " जबसे हमारे गाँव में सौर बिजली आई है, मेरी ज़िंदगी बहुत आसान हो गई है."
यह रोशनी बहुत अच्छी और तेज़ है, देखने में आसानी होती है. अब हम ज़्यादा समय तक काम कर सकते हैं इसलिए काम -धंधा भी पहले से अच्छा हो गया है."

अशरफ़ के घर से कुछ ही दूर पर एक कम ऊँचाई का भवन है, जिसकी छत पर लगभग 25 आयताकार सौर पैनल लगे हैं. यहीं से अशरफ़ के घर बिजली पहुँचती है.
बिजली के इस स्रोत से जनगाँव समेत 30 गाँवों को बिजली पहुँचती है. यह घरों के साथ साथ स्कूलों, मोबाइल टावरों और स्थानीय व्यापार के लिए भी बिजली देता है.
'अपार संभावनाएं'
यह सौर बिजली घर ओमिनीग्रिड माइक्रोपावर कंपनी का है. इसके सह-संस्थापक रोहित चंद्रा हैं.
यह कंपनी उन सैकड़ों निजी कंपनियों में से एक है जिन्होंने देश के सबसे ग़रीब राज्यों में सौर <link type="page"><caption> उर्जा केंद्र स्थापित</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130506_kudankulam_supreme_court_ra.shtml" platform="highweb"/></link> किए हैं.
रोहित चंद्रा कहते हैं, " असम, बिहार, पूर्वोतर, पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश में देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या रहती है. इसलिए इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं.
वह कहते हैं सौर उर्जा के क्षेत्र में अब ज़्यादा कंपनियां आ रही हैं क्योंकि अब तकनीक आसानी से उपलब्ध और सस्ती हो गई है. भारत में साल भर सूरज अच्छी तरह चमकता भी है."
आवश्यकताओं का जवाब ?

यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या सौर उर्जा ही भारत के उर्जा की आवश्यकताओं का जवाब है ?
भारत सरकार को आधारभूत ढाँचे और ख़ास तौर से उर्जा पर सलाह देने वाले विनायक चटर्जी कहते हैं, " देश में <link type="page"><caption> उर्जा की कमी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/southasia/2012/08/120718_southasia_powercrisis_akd.shtml" platform="highweb"/></link> को देखते हुए मुझे लगता है कि, अगले तीन दशकों तक सौर ऊर्जा बड़े बिजली घरों की जगह नहीं ले पाएगी."
विनायक बताते हैं, " निश्चित तौर पर सौर उर्जा एक विकल्प है. यह एक ऐसा आविष्कार है जिसे भारत के उन ग्रामीण इलाकों में खूब पसंद किया जा रहा है जहाँ पहले कभी बिजली नहीं पहुंची."
लेकिन जनगाँव सूरज डूबने पर सौर उर्जा की सफ़ेद रोशनी से सराबोर हो जाता है.
यह उम्मीद की एक किरण है. अगर इसका इस्तेमाल अच्छे से किया जाए तो इससे ग्रामीण भारत की सूरत बदल सकती है.
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