भारत के लिए क्या हैं तेलंगाना के मायने?

भारत की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश को बाँटकर नए तेलंगाना राज्य के गठन की घोषणा कर दी है. विश्लेषक लुई टिलिन बता रही हैं कि भारत के लिए इसके क्या निहितार्थ हैं.
तेलंगाना के गठन के साथ ही उन लोगों का संघर्ष खत्म होगा जिन्होंने लंबे समय तक राज्य के निर्माण की लड़ाई लड़ी लेकिन अब नए राज्य के स्वरूप को लेकर नया संघर्ष शुरू होगा.
अलग तेलंगाना की मांग को लेकर दशकों तक चले आंदोलन में कई उतार-चढ़ाव आए. राज्य गठन के नाम पर राजनीतिक गठबंधन बने और टूटे. कांग्रेस ने राजनीतिक और आर्थिक दशा के अनुकूल देश के पुनर्गठन की दूरगामी सोच के बजाए अगले साल होने वाले आम चुनावों के गुणाभाग को देखते हुए तेलंगाना के गठन की घोषणा की है.
ऐसे में भारत के व्यापक जनसमुदाय और लोकतंत्र की दिशा और दशा तय करने वाले लोगों के लिए इसके क्या मायने हैं?
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ये पहला मौका है जब भाषा के नाम पर गठित किसी राज्य का विभाजन हो रहा है.
आधार

1950 के दशक में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के लिए जो आंदोलन चला था उसमें आंध्र की अहम भूमिका थी. मद्रास प्रांत को बांटकर तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग प्रदेश बनाने की मांग सबसे प्रबल थी.
इस मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे एक स्थानीय नेता की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों को देखते हुए देश के पहले प्रधानमंत्री को मद्रास को बांटने की मांग के आगे झुकना पड़ा था.
तब तेलंगाना के तेलुगु भाषी ज़िलों को आंध्र प्रदेश में मिलाया गया था. इसके बाद दक्षिण और पश्चिम भारत में भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ.
कन्नड़, मलयालम, मराठी और गुजराती बोलने वाले लोगों के लिए अलग-अलग प्रदेश बने. बाद में पंजाब और हरियाणा भी भाषा के आधार पर अलग हो गए. पंजाबी बोलने वालों को पंजाब मिला और हिन्दी बोलने वालों को हरियाणा.
देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दी बोलती है और हिन्दीभाषी उत्तर और मध्य के कई राज्यों में फैले हैं. अपवाद के रूप में हिन्दी को छोड़कर देश की अधिकांश प्रमुख भाषाएं किसी एक राज्य की प्रमुख भाषा है.
विरोध

नेहरू ने भाषा के आधार पर राज्यों के गठन का विरोध किया था क्योंकि उन्हें आशंका थी कि ऐसे राज्य राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा हो सकते हैं और इससे अलगाववाद को बढ़ावा मिल सकता है.
बावजूद इसके क्षेत्रीय राजनीतिक समुदायों के लिए भाषा एक सशक्त माध्यम बन गई. पिछले कुछ दशकों में भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उभार इसी भाषाई क्षेत्रवाद की उपज है.
1989 के बाद से कोई भी एक दल संसदीय चुनावों में बहुमत हासिल नहीं कर पाया है. केन्द्र में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले कई दलों का गठन भाषाई पहचान के आधार पर हुआ है.
अधिकांश मामलों में केन्द्र सरकार नए राज्य बनाकर क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति करने में सफल रही है.
हाल के वर्षों में हिन्दी पट्टी में कई राज्यों का गठन हुआ है लेकिन इन मामलों में भाषा कोई बड़ा मुद्दा नहीं था.
साल 2000 में आदिवासी बहुल झारखंड और छत्तीसगढ़ का गठन हुआ. साथ ही उत्तर प्रदेश के पहाड़ी ज़िलों को मिलाकर उत्तराखंड बनाया गया.
हिन्दी पट्टी

हिन्दी पट्टी में पिछड़ी जातियों की राजनीतिक जागरुकता के चलते बड़े राज्यों को एक साथ रखना मुश्किल हो गया था. इन राज्यों में पहले अगड़ी जातियों का दबदबा हुआ करता था.
ऐसे में राजनीतिक विकेन्द्रीकरण को समाहित करने के लिए नए राज्यों का गठन किया गया.
तेलंगाना के मामले में भी राज्य आंदोलन भाषाई आधार से निकलकर राजनीतिक महत्वाकांक्षा बन गया.
तेलंगाना की मांग 1960 के दशक के अंत में और 1970 के दशक की शुरुआत में क्षेत्रीय भेदभाव को मुद्दा बनाकर शुरू हुई थी. बाद में इस आंदोलन में कई समकालीन मुद्दे जुड़ते गए.
आर्थिक उदारीकरण के बाद उभरी आर्थिक विषमता ने भी आग में घी का काम किया.
राज्य की राजधानी हैदराबाद में दुनिया भर से निवेश हो रहा है. भारत में फेसबुक का नया मुख्यालय इसी मेगा शहर में है. भौगोलिक रूप से हैदराबाद तेलंगाना में है लेकिन क्षेत्र के ग्रामीण हिस्सों से इसका संपर्क नहीं के बराबर है.
भारत के दूसरे नए राज्यों का अनुभव दिखाता है कि केवल राज्य गठन क्षेत्रीय असमानता को दूर करने के लिए रामबाण नहीं है.
राज्य बनने के बाद नई सरकार चुनने, नया प्रशासनिक ढांचा बनाने, राजस्व उगाहने और केन्द्र सरकार के साथ मोलभाव करने की कठिन चुनौती सामने आती है.
लक्ष्य

अलग राज्य के गठन की मांग के लिए चलाए जा रहे आंदोलनों का एकमात्र लक्ष्य राज्य हासिल करना होता है लेकिन इस लक्ष्य की पूर्ति के बाद भी कई दीर्घकालिक लक्ष्य होते हैं जिन्हें साथ लेकर चलने की जरूरत होती है.
तेलंगाना और शेष आंध्र के लिए राजधानी हैदराबाद को साझा करना भी एक बड़ी चुनौती होगा. हैदराबाद आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बना रहेगा. भौगोलिक रूप से ये शहर तेलंगाना में आता है लेकिन संभव है कि इसे केन्द्र प्रशासित क्षेत्र बनाया जाए.
ऐसा पहली बार हुआ है कि जब केन्द्र सरकार को नया राज्य बनाने के लिए अविभाजित राज्य के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है.
तेलंगाना का गठन अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है लेकिन ये राजनीतिक विकेन्द्रीकरण और आर्थिक बदलाव के लंबे इतिहास को परिलक्षित करता है.
इससे दूसरे इलाक़ों में नए राज्यों के गठन के आधार पर बहस हो सकती है. साथ ही आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन के बाद बने राज्यों को प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
(लुई टिलिन किंग्स कॉलेज, लंदन में राजनीति विज्ञान की लेक्चरर और 'रिमैपिंग इंडियाः न्यू स्टेट्स एंड देयर पॉलिटिकल ऑरिजिंस' की लेखक हैं)
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