अलग गोरखालैंड की मांग, तीन दिन का बंद

अलग <link type="page"><caption> तेलंगाना</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> राज्य की मांग को लेकर तेज़ होती राजनीति देखते हुए अब पृथक गोरखालैंड का मुद्दा भी गर्मा गया है. दार्जीलिंग के पर्वतीय क्षेत्र में आंदोलन चला रही गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने आज से 72 घंटे के बंद का आह्वान किया है.
गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का कहना है कि अगर अलग तेलंगाना राज्य की मांग पूरी की जाती है, तो अलग गोरखालैंड की उनकी पुरानी मांग भी पूरी की जानी चाहिए.
बंद का आह्वान देखते हुए प्रशासन की तरफ़ से क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने की तैयारी की गई है.
दार्जीलिंग ज़िले के डीएम सौमित्र मोहन ने बीबीसी को बताया कि पूरे पर्वतीय क्षेत्र में सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था की गई है और ये सुनिश्चित किया गया है कि आम लोगों को बंद की वजह से कोई परेशानी न हो.
उन्होंने कहा, "पूरे पर्वतीय क्षेत्र के संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए हैं. साथ ही विशेष सुरक्षा दस्ते का इंतज़ाम भी किया गया है. हमारी कोशिश रहेगी कि जितनी भी ज़रूरी सेवाएं हैं, वो बाधित न हों. हम लोगों ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से भी ऐसा आश्वासन ले लिया है."
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गोरखालैंड की माँग
पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्सों को मिलाकर गोरखालैंड बनाने की माँग ने 1980 के दशक में ज़ोर पकड़ा था.
अलग राज्य की मांग में मुख्य रूप से दार्जीलिंग की पहाड़ियों के अलावा उससे लगे सिलीगुड़ी के इलाक़े भी थे. उस समय सुभाष घीसिंग ने गोरखालैंड नेशनल लिबरेशन फ़्रंट या जीएनएलएफ़ नाम के संगठन की स्थापना की.
उनके आंदोलन ने हिंसक रूप भी लिया, जिसकी वजह से तत्कालीन सरकार ने आंदोलन को दबाने की कोशिश की. नतीजा ये हुआ कि उस क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां ठप होने लगीं.
आठ साल बाद पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार दार्जीलिंग की पहाड़ियों के इलाक़े को अर्द्धस्वायत्तशासी क्षेत्र के बतौर मान्यता देने को राज़ी हुई. अगस्त 1988 में दार्जीलिंग गोरखालैंड पर्वतीय परिषद की स्थापना हुई.
परिषद के पहले चुनाव में घीसिंग को जीत मिली और वह परिषद के चेयरमैन नियुक्त हुए.
घीसिंग की नियुक्ति के बाद
उनके लिबरेशन फ़्रंट ने तीन बार चुनाव में जीत हासिल की. चौथे चुनाव 2004 में होने थे, मगर तब चुनाव न कराकर घीसिंग को ही परिषद की कमान दे दी गई.
इसके बाद स्थानीय तौर पर कुछ असंतोष उभरा और उसी असंतोष की लहर पर सवार होकर बिमल गुरुंग ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का गठन किया.

उन्हें जनसमर्थन मिला, जिसे देखते हुए घीसिंग ने 2008 में चेयरमैन पद से इस्तीफ़ा दे दिया. अब गुरुंग ने अलग गोरखालैंड राज्य की मांग का झंडा उठा लिया.
जनमुक्ति मोर्चा का असर
देश के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने 2009 के आम चुनाव से पहले तेलंगाना और गोरखालैंड जैसे राज्यों के गठन के समर्थन की घोषणा की थी.
इसके बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को गोरखालैंड जनमुक्ति मोर्चो ने समर्थन दे दिया और जसवंत सिंह बड़े अंतर से दार्जीलिंग लोकसभा सीट पर चुने गए.
अप्रैल 2011 में पश्चिम बंगाल राज्य विधानसभा चुनाव में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने दार्जीलिंग पहाड़ी क्षेत्र की तीनों विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की. इसके बाद ये संकेत साफ़ हुए कि उस क्षेत्र में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का असर है.
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