केदारनाथ मंदिर की असल में हालत क्या है?

- Author, शालिनी जोशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए, देहरादून
एक ओर सरकार जहां केदारनाथ में पूजा शुरू कराने को लेकर अपने उतावलेपन में लगातार बयान दे रही है वहीं धरातल पर सच्चाई ये है कि पूजा शुरू कराना दूर की कौड़ी है.
आपदा के एक महीने बाद भी वहां सफाई का काम ही बेहद कठिन लग रहा है और केदारनाथ को संवारने का काम आसान नहीं है. इसके लिये गहन भूवैज्ञानिक अध्ययन और नियोजन जरूरी है.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग या एएसआई का एक उच्चस्तरीय दल वहां का निरीक्षण करने के बाद लौटा है. उसकी रिपोर्ट और <link type="page"><caption> तस्वीरों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/06/130629_uttarakhand_gallery_rd.shtml" platform="highweb"/></link> से साफ है कि आपदा ने केदारनाथ का भूगोल बदल दिया है और मंदिर परिसर को भी भारी क्षति पंहुची है.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिशासी पुरातत्वेत्ता अतुल भार्गव ने बीबीसी को बताया कि, “मंदिर के मंडप के भाग को क्षति पंहुची है,पूर्वी द्वार के पास स्तंभ को काफी नुकसान हुआ है जहां से पत्थर हट गये हैं,पश्चिमी द्वार को भी नुकसान है और गर्भगृह के उत्तर पूर्वी कोने से भी नीचे के पत्थर हट गए हैं.”

“मंदिर के भीतर और सीढ़ियों पर तीन-तीन फीट तक गाद भरी हुई है. चारों ओर बड़े-बड़े बोल्डर बिखरे हुए हैं. मुख्य मंदिर से सटा हुआ ही एक और मंदिर था जिसे ईशान मंदिर कहते थे वो पूरी तरह ध्वस्त हो गया है और शायद नींव के ही कुछ पत्थर रह गये होंगे.”
भूगर्भीय सर्वेक्षण हो
उनका कहना है कि, “<link type="page"><caption> केदारनाथ</caption><url href="केदारनाथ: सफाई है बड़ी चुनौती " platform="highweb"/></link> एक टापू की तरह दिख रहा है. वहां अभी काम के हालात ही नहीं हैं. पहले आवश्यक है कि भूगर्भीय सर्वेक्षण हो कि वहां जो नई धाराएं बन गई हैं उन्हें कैसे रोका जा सकता है.”
दरअसल केदारनाथ में सबसे बड़ी चुनौती वहां बाढ़ और भूस्खलन से दूर-दूर तक बहकर आया मलबा है. यह बड़ा सवाल है की इसे कैसे हटाया जाएगा और कहां डाला जाएगा. इस मलबे को हटाए बिना कोई काम शुरू ही नहीं किया जा सकता.
<link type="page"><caption> अगले महीने तक शुरू हो पाएगी केदारनाथ में पूजा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130628_kedarnth_temple_worship_vs.shtml" platform="highweb"/></link>
मलबा हटाने के लिये जेसीबी मशीनों को ले जाने की बात कही जा रही है लेकिन वहां जेसीबी जा ही नहीं पा रही हैं और भूविज्ञानी भी इस बारे में चेतावनी दे चुके हैं कि "ये एक ग्लेशियल डिपोजिट है और उसे हटाने की हड़बड़ी फिलहाल नहीं करनी चाहिये."
उनका कहना है इसके लिये पहले भूगर्भीय सर्वेक्षण किया जाना चाहिये क्योंकि जिस तरह से मलबा फैला है उसे हटाए जाने से दूसरा खतरा हो सकता है.
ऐतिहासिक महत्व
अभी तक यही तय नही हुआ है कि वहां मलबा कैसे हटेगा और हटेगा भी या नहीं. दूसरी आशंका ये भी है कि मलबे के नीचे सैकड़ों शव भी हो सकते हैं.

अब सारी नजरें भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण संस्थान की टीम के दौरे पर टिकी हुई हैं.
<link type="page"><caption> केदारनाथ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130716_uttarakhand_cm_vijay_bahuhuna_iv_ml.shtml" platform="highweb"/></link> मंदिर का धार्मिक महत्व होने के साथ ही ऐतिहासिक महत्त्व भी है . राहुल सांस्कृत्यायन ने अपनी किताब हिमालय परिचय में लिखा है कि पहले पहल वहां गुप्तकालीन निर्माण देखा गया था.
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार 1025-1050 में सिद्धराज भोज ने यहां गर्भगृह और मंदिर का निर्माण कराया उसके बाद 1170 के आसपास गुजरात के चालुक्यवंशी राजा कुमारपाल ने मंदिर परिसर को और संवारा.
मंदिर का मंडप अहिल्याबाई होलकर के वक्त बनवाया गया जिन्होंने 18वीं सदी के अंत में कई और मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया था.
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