मिलिट्री मास्टर के हाथ नक्सलियों की कमान?

- Author, शुभ्रांशु चौधरी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
कुछ हफ्ते पहले खुफ़िया सूत्रों के हवाले से एक ख़बर आई थी, जो अधिक अखबारों मे नहीं छपी.
अगर वह ख़बर सही थी तो उसकी मदद से आप छत्तीसगढ़ में हुए हाल के नक्सली हमले को थोड़ा बेहतर समझ सकते हैं.
उस खबर के अनुसार सीपीआई माओवादी के दंडकारण्य में अपने नेतृत्व में परिवर्तन किया गया है और अब कोसा की जगह रामन्ना सीपीआई माओवादी के दंडकारण्य राज्य के नए सचिव या प्रमुख बनाए गए हैं.
रामन्ना के दंडकारण्य राज्य के नए सचिव बनने की खबर अगर सही है तो हमें इस परिवर्तन को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.
रामन्ना 1983 में पार्टी से शामिल हुए. वे वारंगल से हैं और ताडमेटला सहित आज तक बस्तर में हुए तमाम बड़े हमलों के वे ही सूत्रधार रहे हैं.
वे दिखने मे नाटे कद के हैं. चश्मा पहनते हैं और किसी भी तरफ से लड़ाकू नहीं दिखते, लेकिन उनका दिमाग कंप्यूटर की तरह चलता है और वे गज़ब के मिलिट्री प्लानर हैं.
लाइन का फर्क

किताब 'उसका नाम वासु नहीं' लिखते समय माओवादी नेताओं में सबसे अधिक मदद मुझे उनसे ही मिली थी. उनको पिछले 20 सालों का बस्तर का <link type="page"><caption> माओवादी आंदोलन </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130526_major_naxal_attacks_timeline_ar.shtml" platform="highweb"/></link>छोटे-छोटे डिटेल्स के साथ याद है.
पर उनसे बातचीत में यह भी उभरकर आता था कि रामन्ना कोसा जैसे नेताओं को पसंद नहीं करते हैं. जब भी मैं रामन्ना से कोसा, उनके सचिव की बात करता वे कहते अरे उस हेडमास्टर से क्या होगा?
उनकी आवाज़ में हिकारत साफ़ झलकती थी. उन्होंने कभी उसे छिपाने की कोशिश नहीं की.
कोसा दंडकारण्य में आंध्र से 1980 में भेजे गए सात लोगों के सात दस्तों का हिस्सा थे, जिन्होंने चार राज्यों मे फैले दंडकारण्य में इस आंदोलन की नींव डाली थी.
कोसा या करीमनगर के पेद्दापल्ली के सूर्यनारायण रेड्डी हेडमास्टर की तरह सोचते और दिखते भी हैं. उनकी उम्र 60 के करीब है. वे राजनैतिक नेता अधिक है मिलिट्री प्लानर कम.
यदि रामन्ना को दंडकारण्य प्रमुख बनाए जाने की खबर सही है तो ये एक निश्चित संकेत है कि अब सीपीआई (माओवादी) रणनीति के तहत हिंसा पर और अधिक ध्यान देंगे.
सीपीआई (माओवादी) ने जब ओडिशा के मलकानगिरी के कलेक्टर विनील कृष्णा का अपहरण किया तो बातचीत के बाद उन्हें लगभग कुछ नहीं मिला. जिन नेताओं के छोड़ देने की शर्त पर कृष्णा को छोड़ा गया था, उनमे से कुछ आज भी जेल में हैं.
मलकानगिरी से कुछ किलोमीटर ही दूर छत्तीसगढ़ में सीपीआई माओवादी ने दूसरे कलेक्टर <link type="page"><caption> एलेक्स पॉल मेनन </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/05/120504_collector_back_home_vv.shtml" platform="highweb"/></link>का अपहरण किया, तब भी वही डॉ. बीडी शर्मा मध्यस्थ बने. मेनन तो छूट गए, लेकिन सरकार रिहाई के शर्तों पर लगभग कोई काम नहीं कर रही है.
सरकार की लापरवाही

इस तरह की रणनीतियों से रामन्ना जैसे नेताओं को सख्त ऐतराज़ है.
यद्यपि इस विषय पर निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन किताब पर शोध करते समय कई माओवादी नेताओं ने मुझे हिंट किया था कि उनकी <link type="page"><caption> महेंद्र कर्मा </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130525_naxal_mahendra_karma_sm.shtml" platform="highweb"/></link>के साथ सांठगांठ थी.
लेकिन इस बार उन्हें पकड़ने के बाद मारा गया. वे इसके पहले कई हमलों मे बच चुके थे. वैसा ही छत्तीसगढ़ राज्य के कांग्रेस प्रमुख नंद कुमार पटेल, उनके बेटे और विद्याचरण शुक्ल के साथ किया गया.
यह रणनीति में परिवर्तन का सूचक है.
सभी को यह पता है कि दरभा घाटी क्षेत्र में नक्सलियों की ताकत में पिछले कुछ सालों मे जबरदस्त इजाफा हुआ है और ऐसे क्षेत्र में इतने बड़े नेताओं का लगभग बगैर किसी सुरक्षा के जाने पर प्रश्न चिन्ह खडा किया जाना चाहिए.
यह राज्य सरकार और खुफिया एजेंसियों की संपूर्ण विफलता है.
यदि नक्सली सैकड़ों की तादाद में इस तरह की बडी घटना को अंजाम देने के लिए इकटठा होते हैं और खुफिया एजेंसियों को इसकी कानों कान खबर नहीं होती तो इसे समझने के लिए एडेसमेटा जैसे हत्याकांडों की ओर देखना चाहिए.
पीपली लाइव

एडेसमेटा गांव में हफ्ते भर पहले ही सुरक्षा बलों ने बीज उत्सव मना रहे लोगों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर तीन बच्चों सहित आठ लोगों को मार डाला.
लेकिन उस समय किसी भी टीवी स्टेशन के स्टूडियों में आने के लिए मेरे पास फोन नहीं आए जैसा इस घटना के बाद आए. अन्य हत्याकांडों की तरह ही इस बार भी जांच का प्रहसन किया जा रहा है.
हम पत्रकार अक्सर लिखते हैं कि सैंकडों नक्सलियों ने हमला किया.
ये सैकड़ों लोग कौन हैं और जब सैकड़ों लोग इकट्ठा होते हैं और हफ़्तों तक किसी बड़े हमले की तैयारी करते हैं जैसा रामन्ना और नेताओं ने मुझे बताया था, तो उसके बावजूद हमारे सुरक्षा बलों को क्यों कोई खबर नहीं मिलती, इन प्रश्नों को बार-बार पूछा जाना चाहिए.
एक नक्सली नेता ने मुझे कहा था आप कोबरा ले आइए पर कोबरा को आप जब तक इंटेलीजेंस यानी खुफिया जानकारी नहीं देंगे तब तक वह अंधा कोबरा कुछ नहीं कर सकता.
यदि रामन्ना के नए प्रमुख बनाए जाने की खुफिया खबर सही है तो उस ख़बर की अहमियत और उसके संभावित परिणामों के बारे मे क्यों नहीं सोचा गया?
क्या अब भी हम इंटेलीजेंस के साथ सोचेंगे या पीपली लाइव स्टाइल मे फिर अगले हमले का इंतज़ार करेंगे? जो हो सकता है अधिक दूर ना हो.
<bold>(ये लेखक के निजी विचार हैं) (बीबीसी हिन्दी के क्लिक करें <link type="page"><caption> एंड्रॉएड ऐप </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link>के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें क्लिक करें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और क्लिक करें <link type="page"><caption> ट्विटर </caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link>पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












