ईश निंदा कानून को खत्म करने की पैरवी

धार्मिक आज़ादी के लिए संयुक्त राष्ट्र के दूत का कहना है कि दुनिया में जिन भी देशों में धर्म के अपमान या धर्म परिवर्तन के खिलाफ़ कानून हैं उन्हें इन्हें समाप्त कर देना चाहिए.
यह सिफ़ारिश संयुक्त राष्ट्र परिषद में मानवाधिकार पर पेश की जाने वाली रिपोर्ट में की गई है.
पाकिस्तान और <link type="page"> <caption> सऊदी अरब</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/rolling_news/2012/02/120214_saudi_valentine_rn.shtml" platform="highweb"/> </link> जैसे कई देशों में इस्लाम का अपमान करने के लिए सजाए मौत का प्रावधान है. समाचार एजेंसी रॉयटर के अनुसार इसी तरह के कुछ प्रावधान चंद पश्चिमी देशों में भी हैं जो मूलतः ईसाई धर्म के पक्ष में बनाए गए थे.
<link type="page"> <caption> क्या है पाकिस्तान का कानून</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2012/08/120828_blasphemy_laws_qa_ss.shtml" platform="highweb"/> </link>
पश्चिमी देशों में भी
ज़्यादातर पश्चिमी देशों में इस तरह के कानून या तो समाप्त कर दिए गए है या फिर उनका इस्तेमाल लंबे समय से बंद है.
हालाँकि कुछ पश्चिमी देशों में मुसलमान इन कानूनों को पुनर्जीवित करने की मांग कर रहे हैं ताकि उनके धर्म पर हो रहे हमलों पर रोक लगाई जा सके.
आयरलैंड इसी तरह का एक देश है जहाँ मुसलमानों के आग्रह पर किसी धर्म के खिलाफ़ बोलने पर कड़े कानूनों की वापसी की गई है ताकी इस्लाम पर होने वाले हमलों को रोका जा सके. वहां किसी धर्म के खिलाफ बोलने पर बड़े जुर्माने का प्रावधान किया गया है.
हालांकि आयरलैंड की सरकार ने इस कानून की समीक्षा के लिए एक समिति बनाई है जो यह जांच कर रही है कि क्या इस कानून से अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन हो रहा है.
'अल्पसंख्यकों का मानवाधिकार हनन'
हेनरी बैलफ़ील्ड का कहना है कि ऐसे कानून अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाते हैं तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कम करते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में कई देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों को मानवाधिकार हनन का सामना करना पड़ रहा है. रिपोर्ट के अनुसार शोषण के लिए गैर सरकारी तत्वों के साथ साथ सरकारें भी दोषी हैं.
पाकिस्तान में धर्म के अपमान के खिलाफ बनाए गए कानून के उपयोग पर सवाल उठते रहे हैं और यूरोपीय संघ और मानवाधिकार संगठन बार बार पाकिस्तान की सरकार से इस क़ानून को संशोधित करने की मांग करती रहे हैं.

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि पाकिस्तान में कानून अल्पसंख्यकों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है और अक्सर इसके तहत दायर किए जाने वाले मामले बेबुनियाद होते हैं.
पाकिस्तान में क्या
पिछले साल पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के पास एक गांव की <link type="page"> <caption> रिम्शा</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/pakistan/2012/08/120822_blasphemy_pakistan_aa.shtml" platform="highweb"/> </link> नामक ईसाई लड़की पर कथित तौर पर कुरान के नियमों से जुड़ी एक किताब के पन्नों में आग लगाने के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था.
यह मामला एक समय तक सुर्खियों में रहा था और जांच के बाद अदालत ने लड़की के खिलाफ <link type="page"> <caption> मुकदमा खारिज</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/pakistan/2012/09/120902_blasphemy_priest_da.shtml" platform="highweb"/> </link> कर दिया था.
अदालत ने यह भी कहा था कि इस तरह के आरोप लगाते हुए बहुत सावधानी बरती जानी चाहिए और किसी मुसलमान या गैर मुसलमान के खिलाफ़ बेबुनियाद और गलत आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए. इस मामले के बाद पाकिस्तान में एक बार फिर इस्लाम के अपमान संबंधी कानून के नियमों में संशोधन की बहस छिड़ गई थी लेकिन देश में इस कानून के तहत मामलों किए जाने का सिलसिला जारी रहा.
इस संबंध में ताज़ा घटना अमरिका में पाकिस्तान के राजदूत के खिलाफ मुलतान में दर्ज होने वाला मामला है जिसमें शेरी रहमान की एक टीवी कार्यक्रम में बातचीत के आधार पर उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ है.
ध्यान रहे कि अमेरिका में बतौर राजदूत नियुक्ति से पहले राष्ट्रीय विधानसभा की सदस्य शेरी रहमान ने सदन में निजी कार्रवाई के दिन व्यक्तिगत रूप से एक संशोधन विधेयक पेश किया था जिसमें 'तौहीम ए रिसालत कानून' के दुरुपयोग को रोकने की बात की गई थी.
बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी ने कहा था कि इस विधेयक का पार्टी नीति से कोई संबंध नहीं है और उनके कहने पर शेरी रहमान बिल वापस लेने के लिए तैयार हो गई थीं.












