महिलाओं की ये कैब कुछ खास है...

दुनिया में टैक्सी चलाने का काम आमतौर पर पुरुष ही करते हैं. लेकिन दिल्ली में एक ऐसी छोटी कैब कंपनी है जिसके सभी ड्राइवर और सवारी महिलाएं हैं. आजकल भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर खासी सावधानी बरती जा रही है. ऐसे में महिलाओं का ये टैक्सी कैब काफ़ी लोकप्रिय हो रहा है.
इस कैब कंपनी के लिए काम करनेवाली 31 वर्षीय शांति शर्मा कहती हैं, “जब मैं सड़क पर टैक्सी चला रही होती हूं तो बहुत गर्व महसूस करती हूं क्योंकि ये कैब सर्विस महिलाओं के लिए है और मैं भी एक महिला हूं. हमारे काम से दिल्ली की महिलाओं को मदद मिल रही है. हम उन्हें सुरक्षा दे रही हैं.”
शांति ‘कैब्स फ़ॉर वीमेन बाई वीमेन’ नाम की टैक्सी सर्विस की आठ महिला ड्राइवरों में से एक हैं.
दिल्ली में 16 दिसंबर को बस में छात्रा के साथ हुई सामूहिक बलात्कार और हत्या की घटना के बाद से इस कैब की सभी महिला ड्राइवर बहुत व्यस्त हो गई हैं.
शांति शर्मा कहती हैं, “उस घटना के बाद से हमारा काम बढ़ गया है. जो महिलाएं दूसरी कैब सर्विस की सेवा लेती थीं वो भी अब हमें बुलाने लगी हैं.”
दिल्ली में रहनेवाली ज्यादातर महिलाओं का कहना है कि आए दिन उन्हें छेड़छाड़ का सामना करना पड़ता है और सार्वजनिक परिवहन पर ऐसी घटनाएं बढ़ जाती हैं.
मुश्किल डगर
लेकिन महिला कैब ड्राइवरों के लिए भी ज़िंदगी आसान नहीं होती. उनमें से कई तो चयन से पहले कार में बैठी भी नहीं थीं, चलाने की बात तो दूर है.
चुनाव के बाद उन्हें कई महीने की ट्रेनिंग दी गई जिसमें कार चलाने से लेकर, सड़क संबंधी नियम-क़ानून, प्राथमिक उपचार और आत्मरक्षा की की ट्रेनिंग शामिल थी.
इस कैब की एक महिला ड्राइवर जब गाड़ी में पेट्रोल डलवा रही थी तो एक नाराज़ पुरुष कैब ड्राइवर ने उनपर हमला कर दिया.
एक अन्य महिला कैब ड्राइवर के साथ एक अमीर दंपति ने केवल इसलिए मारपीट की क्योंकि उस ड्राइवर ने एक मुख्य सड़क पर उनकी कार को आगे जाने के लिए जगह नहीं दी.
शांति शर्मा तीन बेटियों की मां हैं और अकेले उनकी परवरिश करती हैं. 2011 में कैब कंपनी की स्थापना के बाद से ही टैक्सी चला रही हैं और इस काम ने उनकी ज़िंदगी बदल कर रख दी है. उनकी ज़िंदगी में ऐसा पहली बार हुआ जब उन्होंने हर महीने दस हज़ार रुपए की पगार कमाई और अपने परिवार की मदद की.
व्यवहारिक कठिनाई
शांति बताती हैं कि महिला होने की वजह से उन्हें कुछ व्यवहारिक समस्याओं से भी दो-चार होना पड़ता है क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि गाड़ी कहीं खड़ी करने पर पुरुष ड्राइवर तो अपने चार-पांच दोस्तों के साथ गप्पें लगा रहे होते हैं लेकिन महिला होने की वजह से उन्हें कार में ही बैठा रहना पड़ता है.
वो कहती हैं, “कई बार पार्किंग एरिया में मैं अकेली महिला होती हूं, इसलिए कार के भीतर ही रहती हूं. अगर एक और महिला ड्राइवर होती तो कम से कम उनसे बात ही कर सकती थी.”

शांति बताती हैं कि सड़क पर गाड़ी चलाते हुए हालत कुछ बहुत अच्छी नहीं है क्योंकि दूसरे पुरुष कार चालक उन्हें परेशान करते हैं.
“जैसे ही वो देखते हैं कि एक लड़की कैब चला रही है तो वो बिना वजह हॉर्न बजाने लगते हैं. गाड़ी आगे निकालने की कोशिश करने लगते हैं. मुझे हमेशा इस बात की चिंता होती है कि कहीं किसी गाड़ी से टक्कर न हो जाए.”
‘कैब्स फ़ॉर वीमेन बाई वीमेन’ को चलानेवाली कंपनी सखा कंसल्टिंग विंग्स ने इसे शुरू करने से पहले कई लक्ष्य निर्धारित किए थे और उसमें मदद की आज़ाद फ़ाउंडेशन जैसी संस्था ने.
बढ़ता कारवां
कंपनी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी नयनतारा जनार्दन बताती हैं कि पहला लक्ष्य तो यही था कि टैक्सी चलाने का मौका ग़रीब पृष्ठभूमि वाली महिलाओं को दिया जाए ताकि महिलाओं के लिए कामकाज के अवसर और क्षेत्र का विस्तार हो सके.
आज इस कंपनी में 50 महिलाएं टैक्सी चला रही हैं.
नयनतारा कहती हैं, “हमारे समाज में एक अजीबोग़रीब धारणा है कि महिलाएं ख़राब गाड़ी चलाती हैं.”

वो कहती हैं कि कई महिलाएं जो अपने बच्चों को स्कूल भेजने और वहां से लाने के लिए पुरुष चालकों की सेवा लेती हैं, उनका कहना है कि ऐसा वो अपने बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए करती हैं और इसीलिए वो महिला चालकों को आज़माना नहीं चाहतीं.
यही वजह है कि इस कैब कंपनी के पहले ग्राहक मित्र और जानकार परिवार ही थे.
मिली सराहना
नयनतारा बताती हैं कि जब कैब कंपनी में सात महिला ड्राइवर काम करने लगीं तो इस सेवा के बारे में लोगों की जानकारी बढ़ने लगी.
आज ये प्रयोग सफल है और दिल्ली में छात्रा की मौत के बाद से दुनियाभर से कंपनी को आर्थिक मदद के लिए फोन आ रहे हैं और इसके ग्राहकों की संख्या भी 40 फीसदी तक बढ़ गई है.
कंपनी की पहली ग्राहकों में से एक 40 वर्षीय प्रणीता सुकन्या हैं जो एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी में काम करती हैं और अब विदेशों से दिल्ली आनेवाले अपने सहकर्मियों को इसी कैब की सेवा लेने की सलाह देती हैं.
प्रणीता कहती हैं "कई ऐसी महिलाएं जो पहली बार भारत आ रही होती हैं उन्होंने महिलाओं के साथ होनेवाले अत्याचार की कहानियां सुन रखी होती हैं और वो शहर के बारे में भी कुछ भी नहीं जान रही होती हैं." ऐसी महिलाओं के लिए सखा काफी मददगार साबित होती है और वो सुरक्षा के साथ दिल्ली दर्शन कर पाती हैं.












