रोज़गार पर पड़ेगी घटते जीडीपी की मार

उत्पादन क्षेत्र में मंदी के चलते विकास की रफ्तार धीमी हो तो रोज़गार के अवसर पैदा नहीं होंगे.
इमेज कैप्शन, उत्पादन क्षेत्र में मंदी के चलते विकास की रफ्तार धीमी हो तो रोज़गार के अवसर पैदा नहीं होंगे.

भारतीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) के ताज़ा अनुमान के मुताबिक साल 2012-13 के वित्तीय वर्ष के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में बढ़ोत्तरी की दर इस दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंचने का अनुमान है.

आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक सकल घरेलू उत्पाद की घटती दर महंगाई से जूझ रहे आम आदमी पर बेरोज़गारी की गाज बनकर गिर सकती है.

वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार प्रंजॉय गुहा ठाकुर के मुताबिक, सकल घरेलू उत्पाद की घटती दर कृषि और उत्पादन क्षेत्र में मंदी का सूचक है और इन क्षेत्रों में विकास की रफ्तार धीमी हो तो रोज़गार के अवसर पैदा नहीं होंगे.

वो रहते हैं, ''पिछले सालों में जब सकल घरेलू उत्पाद की दर बढ़ी तब भी रोज़गार के अवसर उसके अनुपात में उतने नहीं बढ़ पाए, तो अब जब यह सीधे तौर पर घट रही है तब रोज़गार हर हाल में प्रभावित होंगा.''

भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों एक कुचक्र की शिकार है जिसमें महंगाई की मार ने आम आदमी की बचत को निशाना बनाया है और निवेश में छाई इस मंदी का सीधा असर उत्पादन और दूसरे क्षेत्रों पर पड़ रहा है.

आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक अगले बजट में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसी कुचक्र को तोड़ना है. सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है विदेशी निवेश और वित्तीय घाटे को कम करने के मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाना और ठोस व्यावहारिक कदम उठाना.

भारतीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) के मुताबिक 2012-13 के वित्तीय वर्ष के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इजाफे की दर साल 2011-12 के 6.2 फीसदी की तुलना में 5 प्रतिशत रहने का अनुमान है.

सीएसओ का यह अनुमान हाल ही में जारी रिजर्व बैंक और सरकार के पूर्वानुमान से बहुत कम है.

आंकड़ों के लिहाज़ से विकास दर में सबसे बड़ी कमी वित्त, बीमा, रियल एस्टेट और व्यापारिक सेवाओं को मिलाकर बने सेवा क्षेत्र में दर्ज होने के अनुमान हैं. जहां पिछले साल का आंकड़ा 11.7 फीसदी था वहीं मौजूदा वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा 8.6 फीसदी रहने के आसार हैं.