'एक समिति ने बदल दी मेरी ज़िंदगी'

जस्टिस जेएस वर्मा
इमेज कैप्शन, जस्टिस जेएस वर्मासमिति को हजारों सुझाव हर भाषा में मिल रहे थे और समिति की कोशिश थी कि हर सुझाव पढ़ा जाये.

मैंने केम्ब्रिज विश्विद्यालय से पर्सनल लॉ और और जेंडर जस्टिस से एमफ़िल किया है और इसी वजह से <link type="page"> <caption> जेएस वर्मा समिति</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/12/121224_sexual_assault_laws_ml.shtml" platform="highweb"/> </link> के गोपाल सुब्रमण्यम के दफ़्तर में संपर्क किया.

मैंने उनके साथ काम करने का आग्रह किया और उसके बाद शुरू हुई 29 दिनों की वो लड़ाई जिसके बारे में मुझे पूरी उम्मीद है कि भारत में कुछ सकारात्मक बदलाव लाएगी.

<link type="page"> <caption> जस्टिस जेएस वर्मा</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/01/130123_justice_verma_aa.shtml" platform="highweb"/> </link>, जस्टिस लीला सेठ और गोपाल सुब्रमण्यम वाली समिति को हजारों सुझाव हर भाषा में मिल रहे थे और समिति की कोशिश थी कि हर सुझाव पढ़ा जाये या कोई ईमेल या पत्र केवल इसलिए ना छूटे क्योंकि वो अंग्रेजी में नहीं लिखा गया है.

हर ख़त पर नज़र

सहयोग कर रहे हर सदस्य को अलग अलग दिन आए ईमेल पढ़ने के लिए दे दिए जाते थे. हर दिन आने वाले हज़ारों ईमेल भेजने वालों में स्कूल कॉलेजों के छात्र थे, वो लड़कियां थीं, छेड़छाड़ और भय जिनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया है.

गांवों के सरपंच थे जिन्होंने कागज़ पर लिखा और उसके बाद उसे स्केन करा कर समिति को भेजा. मैं हिंदी,अंग्रेजी और उर्दू पढ़ सकती हूँ. मैंने उन ज़ुबानों के ईमेल पढ़े. जो कन्नड़ तमिल जानते थे, उन्होंने वो पढ़े.

हम एक तरह के सुझावों को पंजीकृत कर लेते थे कुछ सुझाव जो ख़ास लगते थे, ख़ास तौर पर वो जिनमें बदलाव के लिए ख़ास बिंदुवार तरीके सुझाए गए थे उन ईमेल का प्रिंट आउट लेते थे. इसके अलावा हम समाजशास्त्रियों, बुद्धिजीवियों और तमाम किस्म के लोगों को खुद भी हर दिन संपर्क कर रहे थे. हमने अफ़्रीका से लेकर न्यूजीलैंड तक महिलाओं के अधिकारों के बारे में पढ़ा.

जब हम किसी भी सदस्य के पास कोई शोध ले कर जाते थे तो वो उसे पूरी तन्मयता से सुनते थे और उसके बाद ज़्यादातर वो और अलग-अलग बिंदुओं पर अधिक शोध करने को कहते.

दिन रात काम

पहली बार समिति के सदस्यों के साथ काम करके मुझे यह अहसास हुआ कि एज डिफ़रेंस या उम्र का अंतर कोई उतनी बड़ी भी चीज़ नहीं. मैंने अपना 24 जन्मदिन समिति के सदस्यों के साथ काम करते करते बिताया.

बस वही एक दिन था जिस दिन मैं सुबह से काम करने के बाद शाम आठ बजे निकली और उस दिन मैंने आधे दिन काम किया. समिति के तीनों सदस्य और उनके बीच काम करने वाले लोग हर दिन रोज़ एक तरह से पूरा पूरा दिन काम करते थे.

इस समिति के साथ बिताए गए 29 दिनों का ही प्रभाव कहिए कि मुझे अहसास हुआ कि सच्चाई के ऐसे भी रूप हैं. मैं अपने आप को अधिक परिपक्व महसूस कर रही हूँ.

मुझे लगता है कि हममें यह जज़्बा होना चाहिए कि अगर आम भारतियों की आवाज़ को इस रिपोर्ट के ज़रिए आगे बढाया गया है तो हममें यह जज्बा भी होना चाहिए की हम सुनिश्चित करें की संसद हमारी मांगें माने.

<bold>(बीबीसी संवाददाता से बातचीत पर आधारित)</bold>