बिहार के गाँव का 'मॉरिशस कनेक्शन'!

एक रंक परदादा के राजा परपोते को देखने-सुनने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी. अपनी माटी के लाल वाला भावनात्मक आकर्षण वहां उफ़ान पर था.
मॉरिशस के राष्ट्रपति राजकेश्वर परयाग बिहार के बाजितपुर गाँव में थे, जहाँ से डेढ़ सौ साल पहले कई मज़दूर रोज़ी-रोटी के लिए मॉरिशस ले जाए गए थे.
जगह-ज़मीन के दस्तावेज़ी सबूतों की गहन छानबीन से मालूम हुआ कि उन मज़दूरों में राजकेश्वर परयाग के परदादा भी शामिल थे और उनका नाम प्रयाग था.
लगता है, 'प्रयाग' ही कालांतर में परिवर्तित होकर 'परयाग' कहा जाने लगा और यही नाम मॉरिशस के मौजूदा राष्ट्रपति से जुड़ा है.
पटना से लगभग 25 किलोमीटर दूर मसौढी अंचल के बाजितपुर गाँव में महेश नोनिया और गणेश नोनिया के परिवार को राष्ट्रपति परयाग के वंश से जुड़ा हुआ बताया गया है.
हाल में जब इस सम्बन्ध-सूत्र का पता चला तो महेश-गणेश दोनों भाइयों और उनके परिजनों की मामूली सामाजिक हैसियत में अचानक जैसे उछाल आ गई.
बधाई
उस दिन उनके घर पर उनसे मिलने और बधाई देने वालों का ताँता लगा रहा, जिस दिन राष्ट्रपति परयाग का वहां आगमन हुआ था.
स्वागत की तैयारी में सुबह से ही सपरिवार जुटे हुए महेश नोनिया ने बीबीसी से कहा, ''नाम सुने कि अपने वंश के राष्ट्रपति हैं और यहाँ आ रहे हैं तो लगा कि हमारे परिवार में कोई भगवान आ रहा है. समझ लीजिए कि दर्शन के लिए मन आकुल-व्याकुल हो रहा है. "
अति उत्साह में महेश अपनी उम्मीदों और सपनों को दिल खोल कर बताने लगे, "हवाई जहाज़ से विदेश जाने का बहुत शौक़ और अरमान था मन में. अब लगता है कि ये सपना पूरा होने वाला है. जय हो, राष्ट्रपति भय्या की."
यह सब सुनकर गाँव के लोग हँस ज़रूर रहे थे, लेकिन ये भी कह रहे थे कि यहाँ सभी गाँव वालों को गर्व का अनुभव हो रहा है.
तैयारियों की आलोचना
आस-पास के गाँव से आए कुछ लोग आलोचना में भी जुटे थे. एक ने कहा कि चार दिनों से जो युद्धस्तर पर तैयारी चल रही है, उसमें प्रशासन के वाहनों पर ही लाखों रूपए का डीज़ल-पेट्रोल जल गया होगा.
दूसरे ने कहा कि गाँव तक पहुंचने वाली सड़कों की मरम्मत और गाँव की गली- गली में पक्की सडकों की ढलाई करने वाले ठेकेदारों ने लाखों की चांदी काटी होगी.
इस पर किसी ने टोका कि समारोह स्थल को सजाने और विदेशी मेहमानों पर भेंट-उपहार की बरसात कर देने का शाही ख़र्चा भी तो जोड़ो.

ग़रीब श्रमिकों और छोटे किसानों के गाँव बाजितपुर में 20-25 हज़ार लोगों की भीड़ जमा हो गई थी. मेले जैसा नज़ारा था.
पटना से लेकर बाजितपुर गाँव तक सड़कों को तोरण द्वारों और बड़े- बड़े बैनरों से सजाया गया था. ख़ास बात ये थी कि तमाम पोस्टर- बैनरों पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राष्ट्रपति राजकेश्वर परयाग की बड़ी- बड़ी तस्वीरें छपी हुई थीं.
इतनी बड़ी लागत वाले स्वागत से भला कौन गद-गद नहीं होगा! शायद इसीलिए राष्ट्रपति परयाग ने भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ़ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि आज बिहार की तरक्क़ी की चर्चा इस देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में हो रही है. उन्होंने ये भी जोड़ा कि बिहार को चमकाने का पूरा श्रेय नीतीश कुमार को जाता है.
ज़ाहिर है कि ऐसे मौक़े पर किसी राजनीतिक नेता के हक़ में इससे ज़्यादा क़ीमती टिप्पणी कुछ और नहीं हो सकती.
भावुक परयाग
अपने नागरिक अभिनन्दन के समय मंच से बोलते हुए राष्ट्रपति परयाग बेहद भावुक हो उठे थे. कहने लगे, "मेरे परदादा जी इस गाँव से 150 साल पहले मॉरिशस गए थे. उनका नाम प्रयाग था. इस धरती पर आकर आज मेरा रोम-रोम अपने परदादा को याद करता है और नमन करता है."
फिर कांपते स्वरों में कुछ कहने की कोशिश में वो रो पड़े. पूर्वज की जन्म-स्थली से उनके इतने गहरे लगाव को देख-समझ रहे लोगों ने तालियाँ बजाकर उनकी सराहना की.
महेश-गणेश सपरिवार मंच पर पहुंचे और उन्होंने अपने वंश से जुड़े राजकेश्वर परयाग को एक थाली में बाजितपुर की मिट्टी, धान की बाली, दूब -हल्दी, धोती और 101 रुपए बतौर उपहार सुपुर्द किए.
चार दिनों की चाँदनी, फिर अँधेरी रात वाली बात कह रहे वहां के ग्रामीण इस कारण कुछ हद तक संतुष्ट भी थे कि इसी बहाने उनके गाँव में विकास का कुछ काम हुआ.
इस तरह बिहार का गुमनाम-सा यह गाँव अचानक एक ख़ास पहचान के साथ उभर आया.












