गुस्साई जनता-सड़क से सोशल मीडिया तक

दिल्ली में चलती बस में बलात्कार के मामले में लोगों का गुस्सा शांत नहीं हो रहा है. शनिवार को रायसीना इलाके में प्रर्शनकारियों ने प्रदर्शन कर इंसाफ की मांग हुई तो उधर सोशल मीडिया पर भी लोगों ने अपने गुस्से का इज़हार किया.

संदीप देव
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राजपथ पर प्रदर्शनकारियों की मांग है कि बलात्कार करने वालों को फांसी की सज़ा दी जाए और कानून में बदलाव किया जाए. जहां दिल्ली और आसपास के लोग राजपथ पर आकर अपने गुस्से का इज़हार कर रहे हैं वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है.

संदीप देव

बीबीसी हिंदी के फेसबुक पन्ने पर संदीप देव लिखते हैं, “आज सामूहिक बलात्‍कार की शिकार लड़की के समर्थन का सवाल नहीं है, सवाल है देश की हर महिला की अस्मिता, उसकी स्‍वतंत्रता और उसके जीने की इच्‍छा के सम्‍मान का...! सवाल है देश की कानून व्‍यवस्‍था का और सवाल है लोकतंत्र के सही मायने का...! लेकिन इस सबसे क्‍या, अमेरिका के सीईओ, इटली के रिमोट कंट्रोल और शर्मिंदगी से कहना पड़ रहा है कि हमारे प्रधानमंत्री 7 रेसकोर्स में आराम फरमा रहें हैं. उसे अपनी जनता की जरा भी फिक्र होती तो वो खुद बाहर आते....प्रोटोकॉल की इतनी ही पड़ी है तो अपने गृहमंत्री या किसी नुमाइंदे को भेजते जो विजय चौक पर 'मुझे इंसाफ दो' के नारे लगाती जनता से प्रत्‍यक्ष संवाद करते और कहते कि हम आपके लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने जा रहे हैं, बलात्‍कार के विरुद्ध नया कानून बनाने जा रहे हैं.”

राजीव ठाकुर

राजीव ठाकुर
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बीबीसी हिंदी के एक और पाठक राजीव ठाकुर कहते हैं, “आप सभी साथियों से निवेदन है, की अपने घरों से बाहर निकले और हमारी अपनी बहन के लिए न्याय की मांग करे, हमे दोषियों के लिए सिर्फ मृत्युदंड ही चाहिए। ये नपुंसक सरकार न्याय की मांग करने वालो पर आंसू गैस के गोले, लाठी चार्ज और पानी की तेज़ बौछार ही कर सकती है। शांतिपूर्ण तरीके से घर से बाहर निकल कर अपने देश के सजग नागरिक होने का प्रमाण दीजिये.”

अरविंद सिंह कहते हैं, “सभ्य समाज में बलात्कार क्यों? फिर बलात्कारी को सभ्य सजा क्यों? इसलिए मैं तो कहूंगा कि बलात्कारी को फांसी से भी सख्त सजा यदि हो(हो सकती है)तो वो दी जाए ताकि भविष्य में कोई ऐसा गुनाह करने की सोचे भी न । भयंकर सजा का भय जरुर गुनाह पर नियंत्रण लगाएगा.”

किशोर पाहुजा

किशोर पाहुजा
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किशोर पाहुजा फेसबुक पन्ने पर लिखते हैं, “गलती सरकार की है, गलती समाज की है.हमारा समाज ऐसी घटना होने पर दो चार दिन चिल्लाता है फिर वही सब कुछ वैसा का वैसा. पुलिस कुछ करना चाहती नहीं है. महिलाएं भुगतती हैं उनका परिवार भुगतता है. फांसी दे या न दे पर सजा कठोर होनी चाहिए और न्याय तुरंत मिलना चाहिए . देर से मिलने वाला न्याय एक तरह से अन्याय ही होगा ”

चौखाराम चौधरी

चौखाराम चौधरी
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चौखाराम चौधरी लिखते हैं, “जहाँ तक बात सजा की है तो सरकार को अभी से कड़े कानून तो बनाने चाहिए लेकिन सिर्फ कानून ऐसी घटनाएं रोक देगें यह भी कोई गारंटी नहीं ले सकता. ऐसा स्थिति में जरूरत इस बात की है कि स्कुली शिक्षा में या मां-बाप अपने स्तर पर पर लङके-लङकी का फर्क खत्म करें और लङकों में महिलाओं के प्रति अच्छी परवरिश दें.”

इन सब प्रतिक्रियाओं के अलावा भी सोशल मीडिया पर लोग अपने गुस्से का इज़हार कर रहे हैं.

लोगों की मांग है कि बलात्कार के कानून में बदलाव के लिए संसद का आपातकालीन सत्र बुलाया जाए