
नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है
गुजरात में विधानसभा चुनाव के दूसरे और आखिरी चरण में सोमवार को वोट डाले जाएंगे और चुनाव के नतीजे गुरुवार को आ जाएंगे.
गुजरात विधानसभा का ये चुनाव भारतीय राजनीति में बहुत अहम हो चला है. देश के अखबार और टीवी चैनल चुनाव परिणामों की कवरेज और इन पर बहस और विश्लेषण के लिए खास तैयारियों में जुटे हैं.
कुछ समय से भारत के कुछ उद्योगपति, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और कुछ विश्लेषक सोचे समझे तरीके से इस बात को बढ़ावा देने में लगे हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एक कुशल प्रबंधक, बेहद ईमानदार और निर्णायक सोच वाले नेता हैं. बहुत दिनों से ये चर्चा आम है कि मोदी ही भारत का बेड़ा पार करेंगे.
मीडिया और राष्ट्रवादी रुझान वाले विश्लेषकों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि खुद मोदी अपने आपको लेकर भ्रम का शिकार होते नजर आ रहे हैं.
नफरत की राजनीति
मोदी गुजरात में 2002 के दंगों और उसके बाद राज्य के मुसलमानों और ईसाई अल्पसंख्यकों को राज्य की मुख्यधारा से अलग करने से पहले एक औसत और सामान्य राजनेता माने जाते थे.
लेकिन एक बार सत्ता मिलने के बाद मोदी ने पूरे निजाम पर अपनी गिरफ्त मजबूत कर ली और उन्होंने दो पहलुओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया.
गुजरात पहले से ही भारत का बड़ा औद्योगिक राज्य रहा है. मोदी ने इसे उद्योगपतियों के लिए और बेहतर बनाया.
मोदी ने औद्योगिक विकास के साथ साथ भारतीय समाज और भारत की राजनीति में हिंदू राष्ट्रवाद को बहुत अचूक तरीके से और खुल कर बढ़ावा दिया. इनका आर्थिक विकास का आधार घृणा पर कायम रहा है.
मोदी की सियासत की धुरी घृणा रही है. ये घृणा कभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ नजर आती है तो कभी भारत के धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ.
मोदी की ये खासियत रही है कि उनका कोई भी भाषण, कोई भी बयान किसी को निशाना बनाए बिना पूरा नहीं होता है.
नरेंद्र मोदी की धार्मिक नफरत वाली राजनीति से कांग्रेस इस कदर डरी हुई है कि पिछले दस वर्षों से पार्टी ने चुनावों में अपने मुस्लिम नेताओं को चुनावी मुहिम तक के लिए नहीं उतारा है.
चिंता का सबब

मोदी को भारतीय जनता पार्टी के अंदर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार के तौर पर देखा जा रहा है
नरेंद्र मोदी का हिंदुवादी गुरूर इस हकीकत से भी स्पष्ट होता है कि उनके मौजूदा मंत्रिमंडल में कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है और विधानसभा चुनाव में एक भी मुसलमान को उनकी पार्टी की ओर से टिकट नहीं दिया गया है.
बड़े बड़े राजनीतिक विश्लेषक और चुनावी पंडित गुजरात में नरेंद्र मोदी की जबरदस्त जीत की भविष्यवाणियां कर रहे हैं.
बहस इस बात को लेकर नहीं हो रही है कि गुजरात में जीत किसकी होगी, बल्कि बहस इस समय इस पहलू पर केंद्रित है कि क्या मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे? क्या वो प्रधानमंत्री बनने के बाद पूरे देश पर अपने हिंदुवादी नजरिए को थोपेंगे?
कांग्रेस भी मोदी समर्थक लॉबी की राजनीतिक जंग के सामने बेबस नजर आती है. राजनीतिक दल बढ़ते हुए हिंदू राष्ट्रवाद और नकारात्मक राजनीति के रुझान से घरबाहट का शिकार दिखते हैं. कांग्रेस गुजरात में मोदी की नकारात्मक और नफरत आधारित राजनीति का मुंह तोड़ जवाब देती नहीं दिखती.
नकारात्मक राजनीति और धर्म आधारित राष्ट्रवाद भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ी चुनौती है. मोदी इसी लोकतंत्र की पैदावार हैं, लेकिन वो बेशक लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर विश्वास नहीं रखते हैं.
गुजरात में मोदी की संभावित जीत और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी बढ़ती हुई लोकप्रियता लोकतंत्र में यकीन रखने वालों के लिए चिंता का सबब है.








