करियर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट का...

पिछले कुछ समय बीबीसी हिंदी सेवा आपकी मुलाकात कुछ ऐसे पेशेवर लोगों से करवा रही है जो लीक से हटकर काम करते हैं या वे ऐसे पेशे से जुड़े हैं जिनके बारे में आम लोगों के पास काफी कम जानकारी है...लेकिन ये काम काफी महत्वपूर्ण होते हैं.
इसी कड़ी में बीबीसी संवाददाता स्वाति अर्जुन ने बातचीत की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. अरूणा ब्रूटा से.....
<bold>डॉ. अरूणा ब्रूटा विस्तार से बताएं कि एक क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट या मनोवैज्ञानिक का मूल काम क्या होता है और किन-किन जगहों पर उनकी ज़रुरत होती है?</bold>
जीवन में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां एक मनोवैज्ञानिक की ज़रुरत ना हो. ये वो विज्ञान है जो मन और तन समन्वय होता है. हम इसे इस तरह भी परिभाषित कर सकते हैं कि अगर हम मन से बीमार हैं तो उसके कारण हमें जो शारीरिक बीमारियां होती हैं उसे एक क्लीनिकल सायकोलॉजिस्ट ठीक करता है वो बिना दवाईयों के.
<bold>एक साईकोलॉजिस्ट के तौर पर आपने कहां-कहां काम किया है?</bold>
1965 में एमए करने के बाद मैं निजी प्रैक्टिस करने लगी. 1968 में मैंने दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग में एक लेक्चरर के तौर पर काम करना शुरु किया. 1986 में मैं इंद्रप्रस्थ कॉलेज छोड़कर दिल्ली यूनिवर्सिटी से जुड़ गई और साथ-साथ प्रैक्टिस भी करती रही.
<bold>आपने कब और कैसे तय किया कि आपको क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट ही बनना है?</bold>
मैंने अपने स्कूली जीवन में ही ये तय कर लिया था कि मुझे क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट ही बनना है. 1970 में मैं काउंसिलिंग और थेरेपी में प्रशिक्षण लेने के लिए अमरीका चली गई थी. 1972 में मैं वापिस आई और 1979 में मैंने यूजीसी में फेलोशिप के लिए अर्ज़ी डाली जो स्वीकार कर ली गई और मैंने अपनी पीएचडी पूरी की. 1982 में मैं जर्मनी और फिर वहीं से हॉलेंड गई जहां मैंने विभिन्न संस्कृतियों के बीच काउंसिलिंग और साइको-थेरेपी तकनीक सिखानी शुरु की.
<bold>क्या इस पेशे में इतना पैसा है कि आप आत्मनिर्भर हो सके?</bold>
इस पेशे में बहुत रिटर्न है क्योंकि साइकोलॉजी में केवल क्लीनिकल साइकोलॉजी नहीं है बल्कि इसमें ऑर्गेनाईज़ेश्नल बिहेव्यर यानि संगठनात्मक व्यवहार भी है जो आपको कॉरपोरेट सेक्टर, एनजीओ और स्कूल-कॉलेज में भी कंसल्टेंट के रुप में काम कर सकते हैं.
<bold>आज के युवाओं के लिए ये किस तरह का करियर विकल्प है?</bold>
<bold/>ये ना सिर्फ एक बहुत ही अच्छा बल्कि सम्मानजनक करियर ऑप्शन है.
<bold>एक डॉक्टर के रुप में आपके लिए ये कितना चुनौतीपूर्ण होता है, हर बार एक नए व्यक्ति की समस्याओं और उसके व्यक्तिव को समझना और फिर उसका इलाज करना?</bold>
मेरा हर क्लाइंट मेरे लिए बेहद ज़रुरी होता है क्योंकि जब आप किसी इंसान के जीवन में खुशियां लाना चाहते हैं और वो ला नहीं पाते तो ये बेहद चुनौतीपूर्ण होता है.
<bold>जब आप काउंसिलिंग शुरु करती हैं तो सबसे ज्य़ादा किस बात का ध्यान रखती हैं?</bold>
मुझे सबसे ज्य़ादा ध्यान इस बात का रखना होता है कि अगर मेरा कोई क्लाइंट पुरुष है तो ज़ाहिर है उसकी सोच काफी पुरुष प्रधान होगी. ऐसे में मुझे उससे काफी नरमी से पेश आना होता है और उसी समय ज़रुरत के मुताबिक सख्त़ भी होना होगा. अगर शादी शुदा दंपति के बीच काउंसिलिंग कर रही हूं तो ध्यान रखना होता है कि लोग मुझे स्त्रीवादी ना समझें.
<bold>क्या कोई कॉलेज या संस्थान किसी इंसान को ये काम सिखा सकती है या ये एक स्वाभाविक कला है जो सिखाई नहीं जा सकती..या फिर दोनों का मिश्रण?</bold>
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट होने के लिए आपका संवेदनशील इंसान होना बेहद ज़रुरी है. लेकिन कई कॉलेज़ों और इंस्टीट्यूट में इसका प्रशिक्षण भी दिया जाता है. इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय, बंगलौर का निमहांस और दिल्ली के शहादरा स्थित इभास में काफी अच्छी ट्रेनिंग दी जाती है.












