
काली स्याह रात और इस रात की खामोशी को चीरते हुए कोयले से लदे बड़े-बड़े डम्पर और ट्रक. यह सब वाहन देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद कोयले की मंडियों की तरफ जा रहे हैं.
धूल उड़ाते हुए हजारों ट्रक हर रोज झारखंड से कोयला लेकर निकलते हैं. कुछ के कागज़ हैं तो कुछ जाली कागजों पर चलते हैं. ट्रकों की इस भीड़ में किसी को यह नहीं पता कि कौन सा कोयला जायज तरीके से निकाला गया है और कौन सा नाजायज तरीके से.
इन पर लदा काला हीरा यानी कोयला या तो नियमित खदानों से निकाला गया है या फिर यह कोल इण्डिया लिमिटेड से जुड़ी इकाइयों की बंद पड़ी खदानों से निकाला गया है.
झारखंड में कोयले की प्रचुर मात्रा है और इस राज्य के कई इलाकों में कोयले का खनन होता है जैसे धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग, जम्तारा और संथाल परगना का कुछ हिस्सा. इसके अलावा झारखंड के धनबाद से लगे पश्चिम बंगाल के आसनसोल इलाके में भी कोयले का खनन जोर-शोर से होता है.
पिछली एक सदी से भी ज्यादा समय से इन इलाकों से कोयला निकाला जा रहा है. पहले निजी कंपनियों ने और बाद में सत्तर के दशक में कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद कोल इण्डिया लिमिटेड ने ये कोयला निकाला. कई खदानें अब बंद हो गई हैं.
कोयले का काला कारोबार

बंद पड़ी खदानें कोयले के अवैध खनन का सबसे बड़ा जरिया बन गई हैं.
चूंकि खनन का काम दूसरे इलाकों में फैलता चला गया है, इसलिए कोल इंडिया लिमिटेड ने कोयला निकालने के बाद कई खदानों को बंद कर नई खदानें शुरू कर दीं.
अब ये बंद पड़ी खदानें कोयले के अवैध खनन का सबसे बड़ा जरिया बन गई हैं. चाहे वह धनबाद का कोयलांचल हो, रानीगंज हो या फिर हजारीबाग, रामगढ़ या गिरिडीह.
बड़े पैमाने पर चल रहे कोयले के अवैध खनन में हजारों हजार लोग लगे हैं. इनमें आदिवासी सहित समाज का वह तबका जुड़ा है जो गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर है.
मगर ये वे लोग नहीं हैं जो इस अवैध खनन से मुनाफा कमा रहे हों. जिन्हें इस काले कारोबार से मुनाफा हो रहा है, वे संगठित गिरोह हैं और उनका कोयलांचल पर पिछले कई दशकों से राज चलता आ रहा है.
ये गठजोड़ बाहुबलियों, बड़े व्यापारियों, अधिकारियों, कोल इंडिया के अधिकारियों, अपराधियों और नेताओं का है जो इस अवैध खनन में मोटा मुनाफा कमा रहे हैं.
खामोशी कर जाती हैं आवाजें
धनबाद के निरसा का इलाका झारखंड के कोयला उगलने वाले इलाकों में से एक है जहां अवैध उत्खनन को लेकर कई हत्याएं हो चुकी हैं. इस कड़ी में मारे जाने वाले मार्क्सवादी समन्वय समिति के विधायक गुरदास चटर्जी का नाम प्रमुख है.
उन्होंने अवैध उत्खनन के खिलाफ आवाज उठाई थी. यहां इस कारोबार या इस गठजोड़ का विरोध करने वाली हर आवाज़ खामोश कर दी जाती है. कहा जाता है कि इसी कड़ी में यहां एक अन्य विधायक सुशांतो सेनगुप्ता की भी हत्या हुई.
कई दशकों के बाद आज भी निरसा के हालात कामोबेश वैसे ही हैं. दूर दराज के गावों और बस्तियों से लोग यहां की बंद पड़ी खदानों में मजदूरी करने आते हैं.
इन बंद पड़ी कोयले की खदानों में वे अपनी जान हथेली पर रख कर जाते हैं और कोयला निकालते हैं. इस क्रम में कई बार यहां मौतें भी हुईं हैं, जब खनन के दौरान खदान धंस जाती है और खनन करने वाले मजदूर दब कर मर जाते हैं.

कोयले के अवैध खनन में समाज का वह तबका जुड़ा है जो गरीबी की रेखा के नीचे अपना जीवन यापन करने को मजबूर है.
निरसा के इर्द-गिर्द छोटी-छोटी पहाड़ियों के बीच सुरंग खोदकर कोयला निकालने का काम आज भी बदस्तूर जारी है. हज़ारों की तादाद में औरतें, बच्चे, बूढ़े और नौजवान इस अवैध उत्खनन में लगे हुए हैं.
खानों की कहानी
मुगमा के इलाके में एक ऐसे ही समूह के करीब जब मैंने जाना चाहा तो यह फैसला उतना भी आसान नहीं था. पता चला कि हथियारों से लैस खनन माफिया के एजेंट पूरे इलाके में फैले हुए हैं.
वह इस इलाके की निगरानी कर रहे हैं ताकि कोई भी अपरिचित चेहरा अगर नजर आए तो वह उसे इस इलाके में आने से रोकें.
चूंकि कई साल तक मैंने धनबाद में बतौर पत्रकार काम किया तो कुछ पुराने परिचितों के जरिए उस इलाके में पहुंचा जहां एक इसी तरह की अवैध खदान में खनन चल रहा था.
निगरानी करने वाले लोगों को आपत्ति तो थी, मगर मैं इस इलाके के लिए नया नहीं था. बातचीत में लोगों नें बताया कि वह आसपास के गांव और बस्तियों से यहां आकर मजदूरी करते हैं.
रात भर खनन का काम चलता है तो दिन भर कोयले को खपाने का काम, या यूं कहें उसे बेचने का काम. निरसा में ही हार्ड कोक भट्टों की बाढ़ सी आई हुई है... और अवैध तरीके से निकाला गया कोयला सबसे पहले इन्हीं हार्ड कोक भट्टों में खपाया जाता है.
फिर यह कोयला एक जगह जमा किया जाता है, जहां से इसे ट्रकों में लादकर देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाया जाता है. अवैध कोयले के कारोबार में बनारस सबसे बड़ी मंडी है.









