जान बचाने रोहिंग्या मुसलमान हैदराबाद पहुंचे

 रविवार, 19 अगस्त, 2012 को 13:14 IST तक के समाचार
रोहिंग्या मुस्लिम (फाइल फोटो)

रोहिंग्या मुसलमान समुद्र के रास्ते बर्मा से भागकर पड़ोसी देशों बांग्लादेश और भारत में शरण की गुहार लगा रहे हैं.

बर्मा में जातीय हिंसा और बौद्धों के हमलों से जान बचाकर भागने वाले रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के लगभग 300 सदस्यों ने दक्षिण भारत के शहर हैदराबाद में शरण ली है.

इनमें महिला, पुरुष, बूढ़े और बच्चे सभी शामिल हैं जो अपने साथ नरसंहार, अत्याचार, आगज़नी और लूटपाट की दिल दहला देने वाली कहानियां लेकर आए हैं.

बर्मा के रखाइन राज्य या पूर्व अराकान राज्य के रहने वाले इन लोगों का कहना है कि उनके पास अपनी जान बचाने के लिए दूसरे देशों का रुख करने के सिवा कोई रास्ता नहीं रह गया था.

अबुल बासित की कहानी

हालाँकि बर्मा में रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों का दमन पचास वर्ष से भी ज्यादा समय से चल रहा है क्योंकि वहां की सरकार ने इन लोगों को विदेशी बताते हुए उन्हें अपना नागरिक मानने से इंकार कर दिया है.

अबुल बासित

News image"मैं रोजाना अपनी बेटी को सौ बार देखता हूँ क्योंकि मुझे इसी में मेरे परिवार के सारे लोग दिखाई देते हैं. मेरी दो और बेटियां पीछे छूट गईं. मुझे उनकी सुरक्षा की चिंता खाए जा रही है"

लेकिन रोहिंग्यों का कहना है कि हालिया समय में दमन और भी तेज हो गया है जिसमें बौद्ध बहुमत के लोग वहां की सेना और दूसरे सुरक्षाबलों की सहायता से मुस्लिम बस्तियों पर हमले कर रहे हैं, लोगों को बंदी बना रहे हैं, घरों और मस्जिदों को ध्वस्त कर रहे हैं.

हालाँकि रोहिंग्या मुसलमानों का बर्मा से पलायन नया नहीं है और अब तक लाखों रोहिंग्या बंगलादेश, मलेशिया, थाईलैंड सहित कई देशों में पनाह ले चुके हैं. लेकिन यह पहली बार है कि इतनी बड़ी संख्या में यह लोग हजारों मील की यात्रा तय करके हैदराबाद पहुंचे हैं.

62 वर्षीय अबुल बासित की कहानी उस दुर्दशा को प्रकट करने के लिए काफी है जिसका रोहिंग्या लोगों को सामना करना पड़ा है.

रखाइन राज्य में नोवापारा गाँव के रहने वाले अबुल बासित अपने परिवार के दस लोगों के साथ निकले थे लेकिन लगभग दो सप्ताह तक जंगल में भूखे-प्यासे मुश्किल यात्रा के बाद जब वो बांग्लादेश और फिर भारत पहुंचे तो उनके साथ केवल दो लोग रह गए थे. उनकी दो बेटियों में से केवल एक संजीदा उनके साथ थी जबकि दूसरी बेटी लापता हो गई है.

इस हिंसा में उनकी पत्नी, दामाद और कई दूसरे लोग या तो मारे गए हैं या लापता हो गए हैं.

लम्बी सफ़ेद दाढ़ी वाले अबुल बासित कहते हैं, "मुझ पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा और मेरी आँख के आंसू भी सूख गए हैं. मैं रोजाना अपनी बेटी को सौ बार देखता हूँ क्योंकि मुझे इसी में मेरे परिवार के सारे लोग दिखाई देते हैं. मेरी दो और बेटियां पीछे छूट गईं. मुझे उनकी सुरक्षा की चिंता खाए जा रही है."

फरीदा खातून की व्यथा

65 वर्षीय दुबली-पतली फरीदा खातून को देखकर विश्वास नहीं होता कि वो किस तरह जंगलों और पहाड़ों में कई दिन और कई रात पैदल चलकर बर्मा से यहाँ तक पहुंची हैं.

वो कहती है कि उनकी ये यात्रा इतनी मुश्किल थी कि उसे बताने के लिए न तो शब्द हैं और न कोई उस पर विश्वास करेगा.

फरीदा खातून

News image"वहां हालत इतने ख़राब है कि हमारे बच्चे पढ़-लिख भी नहीं सकते. जिन लोगों ने पढ़-लिख लिया, उनको जेलों में डाल दिया जाता है. हमारे लिए वहां कुछ भीं नहीं है."

वो कहती हैं, "मेरे चार बच्चे पीछे रह गए. बाद में मुझे मालूम हुआ कि उनमें से एक मारा गया. वहां हालत इतने ख़राब है कि हमारे बच्चे पढ़-लिख भी नहीं सकते. जिन लोगों ने पढ़-लिख लिया, उनको जेलों में डाल दिया जाता है. हमारे लिए वहां कुछ भीं नहीं है.''

त्रासदी का एक और चेहरा

इस त्रासदी का एक और चेहरा है 13 वर्षीय शब्बीर अहमद जो जातीय हिंसा में अपने माँ-बाप के मारे जाने का दृश्य याद करके काँप जाता है.

शब्बीर कहते हैं, "वहां बौद्धों ने हमारी ज़मीनें छीन लीं, घर छीन लिया. अगर कोई अपने खेत में जाता भी है तो उसे मार डाला जाता है."

शब्बीर अहमद का कहना है कि उसे केवल इसलिए मारा गया क्योंकि उसने अपनी गाएं बेचने की कोशिश की थी.

वो बताते हैं, "बौद्ध कहते हैं कि आप गाएं पाल सकते हो लेकिन बेच नहीं सकते. अगर बेचते हो तो उसका पैसा हमें देना पड़ेगा."

दोस्तों ने ही लूटा

इसी तरह मोहम्मद फैसल का कहना है कि उसकी दुकान लूट ली गई और उसका व्यापार बंद कर दिया गया. फैसल कहते हैं कि ये काम उन्हीं बौद्ध लोगों ने किया जो उनके बचपन के दोस्त थे.

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इनके यहाँ आने का एक करण यह हो सकता है कि बीते कई वर्षों से कई रोहिंग्या शरणार्थी हैदराबाद में रह रहे थे और उनको देखकर ही दूसरे लोग यहाँ आ रहे हैं.

"वहां बौद्धों ने हमारी ज़मीनें छीन लीं, घर छीन लिया. अगर कोई अपने खेत में जाता भी है तो उसे मार डाला जाता है"

शब्बीर

इन लोगों का कहना है कि बांग्लादेश-भारत सीमा पर उन्हें किसी ने नहीं रोका बल्कि उन्हें यह भी मालूम नहीं कि यह सीमा कहाँ थी क्योंकि वो घने जंगल के रास्ते आ रहे थे.

सुरक्षा की उम्मीद में हैदराबाद आने वाले इन लोगों को निराशा नहीं हुई है क्योंकि हैदराबाद में मुसलमान ही नहीं बल्कि सभी समुदाय के लोग उनकी सहायता के लिए आगे आए हैं.

हैदराबाद के निकट बालापुर गाँव की हज़रात इमाम अली शाह कादरी दरगाह उनके लिए सर छुपाने की जगह बन गई है. उसके अलावा कुछ हमदर्द लोगों ने उनके लिए कुछ घरों का भी प्रबंध किया है.

पुलिस का कहना है कि इन लोगों की स्थिति अवैध रूप से आने वाले विदेशियों की है, लेकिन जिन हालात में वो यहाँ आए हैं, उसके मद्देनज़र उनके खिलाफ कोई करवाई नहीं की गई है. केवल उनके नाम रिकार्ड में लिखे गए हैं.

एक गैर सरकारी संगठन उन्हें संयुक्त राष्ट्र की मदद से शरणार्थी का दर्जा दिलाने की कोशिश कर रहा है.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

इसी विषय पर और पढ़ें

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.

]]>