
ये कहानी है शर्लिन चोपड़ा की. उस 25-वर्षीय युवती की जो प्लेबॉय पत्रिका की पहली भारतीय मॉडल है. लेकिन ये कहानी सिर्फ शर्लिन चोपड़ा के बारे में नहीं है.
ये कहानी एक दुस्साहसी महत्वाकांक्षा की है. ये कहानी एक ऐसी महिला की है जो अपनी नग्न तस्वीरें ट्विटर पर लगा कर लॉस एंजलिस में प्लेबॉय के आलीशान गलियारों तक पहुंच जाती है और अपने देश में उसे बहुत कुछ बुरा भला सुनना पड़ता है. ये वही देश है जो अपने बेहतरीन चित्रकारों में से एक को निर्वासन में भेज देता है क्योंकि उसने अपनी एक कलाकृति में एक हिंदू देवी का नग्न चित्रण किया.
यह कहानी उस मोड़ पर आती है जहां दिखावे और हकीकत के बीच भारत एक असमंजस में फंसा है.

शर्लिन चोपड़ा हमेशा से शोहरत चाहती थीं
जब मैं मुंबई के बाहरी इलाके में बने एक आलीशान होटल के कमरे में शर्लिन चोपड़ा से मिला तो वो काले टॉप, कहीं-कहीं से कटी फटी जींस और नुकीली एड़ी वाले जूते पहने हुए थीं. उनकी कमर पर एक बड़े से बिल्ले वाली बेल्ट कसी हुई थी.
मैंने शर्लिन से पूछा कि प्लेबॉय के लिए तस्वीर खिंचवाना, पहले के अनुभव की तुलना में कैसे अलग रहा.
उन्होंने कहा, ''हम जैक डेनियल और वोदका के कुछ पेग के बाद सुबह साढ़े दस बजे काम शुरू करते थे. मैंने कभी इतने आत्मविश्वास और मस्ती के साथ काम नहीं किया.''
शर्लिन का कहना है कि इस आत्मविश्वास की शुरुआत तभी हो गई जब शूट शुरू होने से पहले पत्रिका के स्टाइलिस्ट ने उनके स्तनों की तारीफ की.
तारीफ़
"जब (पहली बार) प्लेबॉय ने मुझसे अमरीका आने के लिए कहा तो मैं घबरा गई और नहीं गई. मुझे नहीं पता था कि मैं यह कर पाऊंगी या नहीं, या मैं वापस आकर इस देश में रह भी सकूंगी या नहीं."
शर्लिन चोपड़ा
शर्लिन बताती हैं, ''जब मैंने अपने बदन से कपड़े हटाए तो उन्होंने कहा, वाह. तब मैंने उन्हें बताया कि ये असली नहीं हैं. फिर भी उन्होंने कहा कि मेरे स्तन बहुत सुंदर हैं. उसके बाद जब मैंने मेक-अप किया तो मैं खुद को परी जैसी महसूस करने लगी.''
शूट के लिए लॉस एंजलिस पहुंचने के एक दिन बाद ही शर्लिन प्लेबॉय के 86-वर्षीय संस्थापक ह्यू हेफ्नर से मिलीं. वो जब हेफ्नर के बारे में बात करती हैं तो उनकी ज़ुबान से सम्मान झलकने लगता है.
वो कहती हैं, ''मुझे बताया गया कि ह्यू औरतों को स्त्रियोचित परिधानों में देखना पसंद करते हैं."
शर्लिन कहती हैं, "मैं जंप-सूट पहनना चाहती थी लेकिन मुझे शॉर्ट ड्रेस या शाम को पहना जाने वाला गाउन पहनने की सलाह दी गई.''शर्लिन ने शॉर्ट ड्रेस पहनी.
वैसे प्लेबॉय में अपनी तस्वीर छपने की इच्छा शर्लिन के मन में वर्षों से रही है. वर्ष 2009 में उन्होंने इस पत्रिका को अपनी तस्वीरें भेजी थीं. वो बताती हैं कि उन्हें ट्रायल के लिए अमरीका आने को कहा गया था.
वे बताती हैं, "मैं घबरा गई और नहीं गई. मुझे नहीं पता था कि मैं ये कर पाऊंगी या नहीं, या फिर मैं वापस आकर इस देश में रह भी सकूंगी या नहीं.''

ह्यूग हेफ़नर से मिलने के बाद शर्लिन चोपड़ा से तरह तरह के सवाल पूछे गए थे.
फिर ऐसा क्या बदल गया? क्या दुस्साहस और महत्वाकांक्षा ने मिल कर शर्म को ख़त्म कर दिया?
शर्लिन कहती हैं, ''मैं पहले हैदराबाद में अपने परिवार से डरती थी, सोचती थी कि लोग क्या कहेंगे. फिर 'बिग बॉस' (2009 में उन्होंने इस टीवी रियल्टी शो में हिस्सा लिया था) के बाद चीजें बदल गईं. मैंने लोगों की परवाह करनी छोड़ दी. मैं सोचने लगी कि मैं सिर्फ खुद के प्रति जवाबदेह हूँ.''
तनाव और आज़ादी
शर्लिन का ये रवैया ख़ासकर तब ज़रूरी हो जाता है जब लोग ट्विटर पर पूछ रहे हों कि 'क्या आप वेश्या हैं.' या 'आप एक रात के कितने पैसे लेती हैं?'
ऐसे सवालों को सुनकर कैसा लगता है?
इस सवाल पर शर्लिन कहती हैं, ''अगर आपको वेश्या समझे जाने से ही पूरी तरह आजादी का अहसास होता है, तो यही सही.''
आज वह मशहूर हैं. लेकिन वो तो कई वर्षों से मशहूर होना चाहती थीं.
शर्लिन अत्यधिक घरेलू हिंसा के माहौल में पली बढ़ीं. आखिरकार उनके मां-बाप अलग हो गए.
"मैंने बी-श्रेणी की फिल्में कीं क्योंकि मुझे ए-श्रेणी की फिल्में नहीं मिल रही थीं. जब मैं अपने अनुभव के साथ ए-श्रेणी के निर्देशकों से मिली तो उन्होने कहा अब बहुत देर हो चुकी हैं क्योंकि मैंने बी-श्रेणी फिल्मों में ही काम किया है."
शर्लिन चोपड़ा
शर्लिन बताती हैं कि वो हमेशा से अपने पिता की लाड़ली थीं. उनके पिता बाल रोग विशेषज्ञ थे और 2005 में उनका निधन हो गया.
उसी दौरान शर्लिन हैदराबाद छोड़कर मुंबई जा पहुंची. वो कहती हैं, ''मैं दूर जाना चाहती थी. एक ही छत के नीचे अपनी मां के साथ रहना आसान नहीं था.''
उनकी ज़िंदगी में आए इस बदलाव पर उनकी मां का क्या कहना है? शर्लिन बताती हैं, ''मैंने आखिरी बार सात मई को अपनी मां से बात की थी.''
शर्लिन प्लेबॉय शूट के लिए 2 जुलाई को लॉस एंजलिस गई थीं.
वैसे हैदराबाद में रहने वाली और पेशे से डीजे उनकी बहन इस बात से बहुत खुश थीं. शर्लिन बताती हैं, ''मेरी बहन मुझे हमेशा वो सब करने को प्रेरित करती रही है जो मैं करना चाहती हूं.''
मुंबई में हर हफ्ते बेशुमार लोग सुनहरे सपने लेकर आते हैं और उनके सपनों का कोई अंत नहीं होता. इनमें बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जिनके सपने बिखर जाते हैं और उसके बाद उनके लिए ज़िंदगी में काफी कुछ ख़त्म हो जाता है.
मुंबई पहुंच कर शर्लिन ने अपने शुरुआती दिनों में कई छोटी मोटी फिल्मों में काम किया. उन्होंने मॉडलिंग भी की. उन्होंने अपना बिजनेस करने की कोशिश भी की लेकिन बात बनी नहीं.
वो कहती हैं, ''वो मेरी जिंदगी का सबसे दर्दनाक दौर था. मुझे जो भी काम मिला, मैंने किया. कुछ संबंध भी बने जिसमें कुछ शोषण भी सहा.''

ह्यू हेफ्नर की गिनती दुनिया के नामी लोगों में होती हैं.
शर्लिन एक तरह से कुचक्र में भी फंस गईं. वो बताती हैं, ''मैंने बी-ग्रेड की फिल्में कीं क्योंकि मुझे ए-ग्रेड की फिल्में नहीं मिल रही थीं. जब मैंने अपने अनुभव के साथ ए-ग्रेड के निर्देशकों से संपंर्क किया तो उन्होंने कहा कि अब बहुत देर हो चुकी है क्योंकि मैंने तो बी-ग्रेड फिल्मों में काम किया है.''
इस तरह कई साल बीत गए.
पैसा और ताक़त
अब तक के सफर में शर्लिन ने पैसे भी कमाए हैं. कितने कमाए हैं, ये वो नहीं बताती हैं लेकिन ये जरूर कहती हैं कि पैसा उनके लिए कितने अहम है.
उनके अनुसार, "पैसे से ही ताकत आती है. मैं हमेशा से अपने दम पर बहुत सारा पैसा कमाना चाहती थी, ताकि उसकी ताकत को हासिल कर सकूं."
अब शर्लिन के लॉस एंजलिस में कई प्रमोशन कार्यक्रम होने हैं, डीवीडी आनी है और उन्हें कई कार्यक्रमों में भी जाना होगा.
प्लेबॉय ने ये नहीं बताया है कि शर्लिन की तस्वीर पत्रिका में छपने की एवज़ में कितना पैसा दिया गया है. दरअसल ये उस तरह है कि जैसे भारत के लिए खेलने वाले क्रिकेटरों को मिलने वाले पैसे उनके सिर्फ एक शूट से नहीं तय होते, बल्कि उनकी कमाई उसके बाद आने प्रचार और विज्ञापनों से तय होती है.
"मैं बहुत पैसा कमाना चाहती हूँ और उससे ताक़त भी हासिल करना चाहती हूँ"
शर्लिन चोपड़ा
इस तरह ये शर्लिन के लिए एक अलग करियर की शुरुआत हो सकती है. बेशक ये उससे अलग होगा जो उन्होंने मुंबई आते वक्त सोचा था.
व्यस्क फिल्म उद्योग भी विकल्प हो सकता है जिसमें पैसे खूब मिलते हैं लेकिन उसमें स्थिरता की कमी है. कुछ अन्य विकल्प भी सामने आ सकते हैं.
बहरहाल शर्लिन को तरक्की का रास्ता मिल चुका है. इसकी तरफ उन्होंने कदम भी बढ़ा दिए हैं. यहां उन्हें कई और रास्ते मिलेंगे.
लेकिन शर्लिन की कहानी का अगला अध्याय क्या होगा, इस का फैसला इस बात से होगा कि वो अपने सामने मौजूद संभावनाओं का कैसे इस्तेमाल करती हैं. और साथ ही इन संभावनाओं का उपयोग करने में सक्षम लोग शर्लिन के साथ मिल कर इन संभावनाओं से क्या कुछ निकाल पाते हैं.








