सशस्त्र बल विशेषाधिकार का़नून का विरोध

जंतर मंतर
इमेज कैप्शन, दिल्ली के जंतर मंतर पर सैंकडो़ लोगों ने इरोम शर्मिला के समर्थन में एक दिन का अनशन रखा
    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला पिछले ग्यारह वर्षों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून (एएफ़एसपीए) के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर हैं.

शनिवार को देश भर में 17 जगहों और उत्तरी अमरीका के भी कुछ जगहों पर इरोम शर्मिला के समर्थन और सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून को हटाए जाने की मांग को लेकर हज़ारों कार्यकर्ताओं ने एक दिन का अनशन रखा और प्रदर्शन किया.

दिल्ली के जंतर मंतर पर भी ऐसा ही एक दिन कार्यक्रम आयोजित किया गया था.

देश भर में ये कार्यक्रम सेव डेमोक्रेसी रिपील एफएसपीए नामक के एक संगठन ने किया था.

इसके तहत दिल्ली के जंतर मंतर पर सैंकड़ों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने अनशन रखा और इस क़ानून को हटाए जाने की मांग की.

इस कार्यक्रम के आयोजक सेरम रोजेश ने बीबीसी को बताया कि भारत के प्रधानमंत्री ने ख़ुद इसे काला क़ानून क़रार दिया है और इसमें बदलाव की बात कही है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ.

सेरम रोजेश का कहना था, ''हमारा मुख्य मुद्दा है कि एएफ़एसपीए को हटाओ देश को बचाओ, इस देश में लोकतंत्र को रहना है तो एएफ़एसपीए को हटाना होगा क्योंकि लोकतंत्र और एएफ़एसपीए एक जगह नहीं रह सकते.''

इस अवसर पर एक नुक्कड़ नाटक का भी आयोजन किया गया जिसमें इस क़ानून के नकारात्मक पहलू को दर्शाया गया.

देश के कई जाने माने मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसमें हिस्सा लिया जिनमें राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हर्ष मंदर, मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नौलखा, अनिल चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नय्यर वगैरह शामिल थें.

इंसाफ़ नाम के एक ग़ैर-सरकारी संगठन के प्रमुख अनिल चौधरी का मानना है कि सेना अपने स्वार्थ के कारण इस क़ानून का समर्थन करती है.

'सेना का स्वार्थ'

अनिल चौधरी का कहना है, ''इस क़ानून का सबसे बड़ा मुद्दा है सशस्त्र बलों को छूट प्रदान करने का प्रावधान. 50 साल के अंदर सेना के भी स्वार्थ पैदा हो गए हैं जो इस क़ानून को नहीं जाने देना चाहते हैं. जिन जगहों पर ये का़नून लागू होता है वहां पर ख़र्च का कोई सीमा तय नहीं होती, कोई हिसाब-किताब नहीं होता.''

पिछले दिनों भारत प्रशासित कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने ये बयान दिया था कि घाटी के कुछ इलाक़ों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून को हटा लिया जाएगा. उनके इस बयान के बाद ये मुद्दा फिर से गर्मा गया है.

ग़ौरतलब है कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून 1958 से पूर्वोत्तर राज्यों में लागू है जबकि 1990 से ये भारत प्रशासित कश्मीर में भी लागू है.

इस क़ानून को हटाए जाने या उसमें सुधार करने के बारे में गृहमंत्री ने कहा था कि घाटी के कुछ इलाक़ो से इसे हटाया जा सकता है लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार या कांग्रेस पार्टी इस बारे में कोई स्पष्ट राय ज़ाहिर करने से से कतराती रही है.

राजनीतिक दलों की राय

प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी इस क़ानून के हटाए जाने के बिल्कुल ख़िलाफ़ है.

लेकिन कुछ छोटी पार्टियां इसमें संशोधन के पक्ष में दिखती हैं.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का मानना है कि इसमें सुधार होना चाहिए.

पार्टी के वरिष्ठ नेता नीलोत्पल बासु का कहना है, ''इसमें सुधार करना चाहिए. जो क़ानून आप लागू कर रहें है उसके चलते अगर सरकार और लोगों में दूरी बन जाती है तो ये किसी मुद्दे के राजनीतिक समाधान ढूंढने में बाधक होती है.''

उसी तरह बहुजन समाज पार्टी के सांसद विजय बहादुर सिंह का भी कहना है कि सरकार को केवल सेना की राय पर कोई फ़ैसला नही करना चाहिए.

उनका कहना था, ''सेना की राय तो एकतरफ़ा होती है. सेना तो युद्घ के लिए बनी हुई है. हम ये नहीं कहते कि पूरे इलाक़े से इस क़ानून को हटा लिया जाए लेकिन जहां शांति बनी हुई है और लोग उसको हटाने की मांग कर रहें है वहां से इस क़ानून को हटा लेना चाहिए.''

हालाकि मानवाधिकार कार्यकर्ता अनिल चौधरी का कहना है कि इस मामले में ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों का रूख़ एक जैसा है.

अनिल चौधरी के अनुसार, ''हर छोटी बड़ी पार्टी कहीं ना कहीं सत्ता में होती है इसलिए उनका नज़रिया सत्ताधारी हो गया है. कुछ राजनीतिक पार्टियां जैसे वामदल कुछ कहती भी हैं तो वे केवल ज़बानी जमाख़र्च करती हैं. लेकिन मामला जहां देश का आ जाता है या राष्ट्रभक्ति का सवाल खड़ा हो जाता है तो कोई पार्टी इसके ख़िलाफ़ अपना पक्ष नहीं रख पाती है.''