द केरला स्टोरी: कहीं बैन तो कहीं टैक्स फ़्री, क्या हैं दोनों पक्षों के तर्क?

    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

'फ़िल्म समाज का आईना होती हैं…' ये बात ना जाने कितनी बार और कितनी जगह कही गई हैं, लेकिन वर्तमान समय में ऐसे कुछ आइनों पर राजनीति की एक परत चढ़ती जा रही है. इसे राजनीति की इस परत से अलग करके देख पाना मुश्किल होता जा रहा है.

किसी फ़िल्म का कई राज्यों में टैक्स फ्री होना और नेताओं का फ़िल्मों को समर्थन करना कोई नई बात नहीं. लेकिन इस बार एक फ़िल्म का नाम चुनावी सभाओं में बार-बार दोहराया गया.

सुदीप्तो सेन निर्देशित फ़िल्म 'द केरला स्टोरी', केरल की उन हिंदू महिलाओं की कहानी है जिन्हें धर्मांतरण के बाद सीरिया ले जाया गया.

फ़िल्म के ट्रेलर का एक डायलॉग कुछ यूं है- 'ये एक ग्लोबल एजेंडा है. अगले 20 साल में केरल इस्लामिक स्टेट बन जाएगा.'

फिल्म का ट्रेलर आने के बाद ही इसपर विवाद शुरू हो गया था.

इस फ़िल्म को पहले मध्यप्रदेश ने टैक्स फ्री किया और उसके बाद मंगलवार को उत्तर प्रदेश ने भी टैक्स फ्री कर दिया.

लेकिन इससे उलट पश्चिम बंगाल सरकार ने फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी.

बंगाल की टीएमसी सरकार का कहना है कि फ़िल्म से राज्य की शांति व्यवस्था भंग हो जाएगी.

उधर तमिलनाडु ने फ़िल्म को आधिकारिक रूप से बैन नहीं किया लेकिन ये राज्य में कहीं भी स्क्रीन नहीं हो रही है.

ममता बनर्जी सरकार के फ़िल्म को बैन करते ही केंद्रीय मंत्री से लेकर बीजेपी नेता तक इसके विरोध करने लगे.

फिल्म को एक धड़ा सही बता रहा है तो दूसरा इसका कड़ा विरोध जता रहा है.

सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने बैन पर कहा, "जब भी कोई फ़िल्म अनकही, होश उड़ाने वाली सच्चाई सामने लाती है तो ये इकोसिस्टम एक तय पैटर्न की तरह बर्ताव करता है. बोलने की आज़ादी ऐसे ही तय समूहों तक सीमित की जा रही है. केरल स्टोरी एक आंखें खोल देने वाली फ़िल्म है, ये केरल को आतंकवाद रूपी दानव से बचाने का समय है."

बैन पर जानी-मानी अभिनेत्री शबाना आज़मी ने कहा है, "जो लोग केरल स्टोरी को बैन करने की बात कर रहे हैं वो उतने ही गलत है जितने वो लोग जो आमिर ख़ान की फ़िल्म लाल सिंह चड्ढा बैन करने की बात कर रहे थे. एक बार अगर फ़िल्म सेंट्रल फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन बोर्ड से पास हो जाती है तो किसी को भी अतिरिक्त संवैधानिक प्राधिकरण बनने की ज़रूरत नहीं."

फ़िल्मों को बैन करने का चलन और बैन करने की मांग का चलन हाल फ़िलहाल में काफ़ी बढ़ चुका है.

बीते दिनों शाहरूख ख़ान की फ़िल्म पठान को लेकर विवाद शुरू हुआ.

फ़िल्म के एक गाने में दीपिका पादुकोण के कपड़े के रंग पर लोगों ने आपत्ति जताई और फ़िल्म को बायकॉट करने के ट्विटर ट्रेंड चलाए जाने लगे.

क्या बैन फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन पर हमला नहीं?

लेकिन सवाल ये कि फ़िल्मों को बैन करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है कि नहीं?

फिल्म के निर्माता विपुल शाह ने बीबीसी को बताया, "फ़िल्म को बैन करना हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है. मैं क़ानून को मानने वाले नागरिक के रूप में सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर जाऊंगा."

"कल (बुधवार) हम सुप्रीम कोर्ट में इस बैन को चुनौती दे रहे है. हमारी फिल्म पर ये बैन असंवैधानिक हैं और हम इसके खिलाफ़ अपील करेंगे."

लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि फ़िल्मों के बैन को केवल फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन से जोड़ कर देखना ही ठीक नहीं है.

कोलकाता के हिंदी थियेटर ग्रुप की डायरेक्टर उमा झुनझुनवाला कहती हैं, "फिल्म को या किसी प्ले को बैन करना सही नहीं है, लेकिन एजेंडा के आते ही कोई आर्ट, आर्ट नहीं रह जाती. अगर आप किसी मकसद से फ़िल्म बनाते हैं तो वो राजनीतिक हथियार बन कर रह जाती है."

"फ़िल्मों को बैन करने वाले कदम की निंदा करने के साथ -साथ हमें ये देखना और समझना चाहिए कि आखिर किसी एक फ़िल्म को सरकार या एक पार्टी क्यों टैक्स फ्री कर रही है या प्रमोट कर रही है. जवाब साफ़ है कि ये एक पार्टी के एजेंडे तो के अनुकूल है."

ऐसे में कलाकारों के लिए सिर्फ़ बैन को अलग-थलग करके देखना आसान नहीं रह जाता.

फ़िल्म या राजनीतिक टूल?

पिछले साल मार्च में कश्मीर फ़ाइल्स फ़िल्म आई, आरोप लगे कि फ़िल्म में तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है. फ़िल्म 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन की पृष्ठभूमि पर बनाई गई थी.

इस फ़िल्म की संघ प्रमुख मोहन भागवत से लेकर गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी तक ने तारीफ़ की थी. ये संभवतः पहली फिल्म थी जिसके लिए केंद्रीय मंत्री और देश के प्रधानमंत्री ने जनता से देखने की अपील की.

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, हरियाणा, गोवा, त्रिपुरा और उत्तराखंड सरकार ने इसे टैक्स फ्री किया था.

अब बाद द केरला स्टोरी को लेकर भी कुछ वैसी ही बहस है. लेकिन इस बार फ़िल्म को चुनाव में भी भुनाया गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक चुनाव की एक रैली में कहा, "आतंकी साजिश पर बनी फिल्म 'द केरला स्टोरी' की इन दिनों काफी चर्चा है. कहते हैं कि केरल स्टोरी सिर्फ एक राज्य में हुई आतंकवादियों की छद्म नीति पर आधारित है."

"देश का एक राज्य जहां के लोग इतने परिश्रमी और प्रतिभाशाली होते हैं, उस केरल में चल रही आतंकी साजिश का खुलासा इस 'द केरला स्टोरी' फ़िल्म में किया गया है."

"कांग्रेस देश को तहस नहस करने वाली इस आतंकी प्रवृति के साथ खड़ी नज़र आ रही है. इतना ही नहीं, कांग्रेस आतंकी प्रवृति वाले लोगों के साथ पिछले दरवाज़े से सौदेबाज़ी तक कर रही है."

इससे पहले गृह मंत्री अमित शाह ने भी कर्नाटक चुनाव की रैली में कहा था, "आपके बगल में केरल है इससे ज्यादा मुझे बोलने की ज़रूरत नहीं है..."

क्या द केरला स्टोरी के निर्माताओं को इस बात का अंदाज़ा था कि फ़िल्म पर प्रैपोगैंडा होने के आरोप लगेंगे?

विपुल शाह कहते हैं, "जब हम फिल्म बनाते हैं तो हमारी कोशिश होती है कि हम कितनी अच्छी फ़िल्म बनाएं. अगर हम ये सोचेंगे कि फ़िल्म से विवाद पैदा होगा या हम डर जाएंगे तो हम फ़िल्म बना ही नहीं पाएंगे. जब हम फ़िल्म बना रहे थे तो हमें इस बात का अंदाज़ा था कि ये क़ड़वा सच है तो कई लोगों को पसंद नहीं आएगा. "

कोलकाता से झुनझुनवाला कहती हैं, "स्मिता पाटिल, ओम पुरी, नसीरूद्दीन शाह, शबाना आज़मी की कई ऐसी फ़िल्में रही जो समाज का कड़वा सच लोगों के सामने लाईं. पर क्या उन फ़िल्मों को प्रैपोगैंडा कहा जा सकता है? नहीं, क्योंकि उन्होंने दोनों तरफ़ की कहानी बताई. लेकिन फ़िल्म में अगर निर्देशक एक तय माइंड सेट के साथ कहानी कह रहा है तो ये परेशनी वाली बात है."

झुनझुनवाला मानती हैं कि ऐसी फ़िल्में पढ़ी लिखी आबादी के लिए नैरेटिव सेट नहीं करतीं, उस तबके को पता है कि उनकी राजनीति और विचारधारा किस ओर है.

"लेकिन समाज का कम पढ़ा लिखा या अनपढ़ तबका इन बातों से बहुत प्रभावित होता है, उसे इस बात से फर्क नहीं पढ़ता कि फिल्म कितनी रिसर्च पर बनी है. वो फ़िल्म देखते हैं और उसे सच मान लेते हैं. इसी तबके के लिए ऐसी फ़िल्में बनाई जाती हैं जो एजेंडा सेट करे. "

काल्पनिक कहानी या सच

इस फ़िल्म के ट्रेलर में कहा गया कि 32 हज़ार लड़कियों का धर्मांतरण करके उन्हें कथित इस्लामिक स्टेट में शामिल किया गया.

32 हज़ार एक बहुत बड़ा आंकड़ा है लेकिन फ़िल्म में कहीं ये नहीं बताया गया कि ये आँकड़ा आखिर कहां से लिया गया.

बीते शुक्रवार को केरल हाईकोर्ट ने फ़िल्म के प्रोड्यूसर की ओर से पेश हुए वकील रवि कदम से पूछा, '32,000 लड़कियों का आकड़ा कहां से आया?'

इसके जवाब में कदम ने कहा, 'ये निर्माताओं को मिली जानकारियों पर आधारित है.'

हालांकि फिर उन्होंने इस जानकारी को हटा लेने के बात कही.

ट्रेलर में से ये आंकड़ा अब हटा लिया गया है. अब इसमें 32 हज़ार लड़कियों का ज़िक्र हटाकर 'तीन लड़कियों की सच्ची कहानी' कर दिया गया.

हाल ही में फ़िल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, "32000 का आंकड़ा मायने नहीं रखता, अगर एक लड़की भी धर्मांतरण का शिकार होती है तो ये मायने रखता है. 32000 एक आर्बिटरी (जो सटीक ना हो) नंबर है और जिसका कुछ तथ्य समर्थन करते हैं."

बीबीसी से बात करते हुए फ़िल्म के निर्माता विपुल शाह कहते हैं, "मैं 32000 के आंकड़े पर अब कुछ नहीं बोलूंगा. ये मामला कोर्ट में हैं तो इस मामले में हम कुछ नहीं बोल सकते."

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा है कि पहली नज़र में फ़िल्म के ट्रेलर का मकसद राज्य के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंड और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना है.

उन्होंने कहा है, "लव जिहाद का मुद्दा ऐसा है जिसे जांच एजेंसियां, अदालतें और केंद्रीय गृह मंत्रालय भी ख़ारिज़ कर चुका है. यह मुद्दा अब केरल को लेकर उठाया जा रहा है और ऐसा लगता है कि इसका मक़सद दुनिया के सामने राज्य को बदनाम करने का है."

कश्मीर फ़ाइल्स से तुलना

कई लोग इस फ़िल्म की तुलना पिछले साल आई फ़िल्म 'कश्मीर फ़ाइल्स' से कर रहे हैं.

उस वक्त इस फ़िल्म को भी प्रेपोगैंडा बताया गया था.

इसराइली फ़िल्म निर्माता और गोवा में हुए इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल के चीफ़ ज्यूरी नदाव लपिड ने 'प्रोपेगेंडा' और 'भद्दी' फ़िल्म बताया था.

इसके बाद भारत में इसराइल के राजदूत नओर गिलोन ने भारत से माफ़ी मांगी थी.

उमर अब्दुल्ला ने भी इस फ़िल्म को सच्चाई से काफी दूर बताया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से इस फ़िल्म को देखने की अपील की थी.

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