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शरद पवार अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करने को हुए तैयार: अजित पवार
राष्ट्रवादी कांग्रेस (एनसीपी) के वरिष्ठ नेता और शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने कहा है कि शरद पवार अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करने के लिए तैयार हो गए हैं. एनसीपी के संस्थापक और अध्यक्ष शरद पवार ने मंगलवार को एक चौंकाने वाले फ़ैसले में पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ने की घोषणा कर दी थी और साथ ही यह भी कहा था कि वो अब कभी चुनाव नहीं लडेंगे.
एनसीपी और इसके कार्यकर्ताओं ने शरद पवार से अपना फ़ैसला वापिस लेने की मांग की है. सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने उनके समर्थन में नारे भी लगाए.
शरद पवार की घोषणा के फ़ौरन बाद अजित पवार ने कहा था कि शरद पवार एक मई को ही इस्तीफ़ा देने वाले थे लेकिन महा विकास अघाड़ी की रैली के चलते उन्होंने अपना फ़ैसला टाल दिया था.
उन्होंने कहा कि अगला अध्यक्ष शरद पवार के निर्देश में रहते हुए काम करेगा. लेकिन कुछ ही घंटों के बाद अजित पवार के सुर बदल गए. अब अजित पवार का कहना है, "हमने उन्हें (शरद पवार) बताया कि पार्टी कार्यकर्ता दुखी हो गए हैं. हमने उन्हें यह भी बताया कि पार्टी कार्यकर्ताओं की मांग है कि वो अध्यक्ष बने रहें. उन्होंने कहा है कि वो इस पर विचार करेंगे लेकिन उन्हें इसके लिए 2-3 दिन का समय चाहिए. कार्यकर्ता प्रदर्शन ना करें."
कांग्रेस वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने कहा, "शरद पवार एक सम्मानित नेता हैं. ये उनके पार्टी का अंदरूनी मामला है लेकिन वो विपक्षी एकता में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे, ऐसी हमें उम्मीद है."
शिवसेना से राज्यसभा सांसद प्रियंका चुतर्वेदी ने शरद पवार के फ़ैसले पर दुख जताते हुए कहा, "एनसीपी अध्यक्ष पद छोड़ने के शरद पवार के फ़ैसले का सुनकर बहुत दुख हुआ. मुझे उम्मीद है कि वो अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करेंगे. इस नाज़ुक हालत में महाराष्ट्र राज्य और देश को उनके अनुभवी नेतृत्व की ज़रूरत है."
महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले ने इसे शरद पवार का मास्टरस्ट्रोक क़रार दिया है. उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, "शरद पवार का इस्तीफ़ा एक मास्टरस्ट्रोक है. इससे अजित पवार का संकट बढ़ जाएगा जो कि बीजेपी के साथ सांठ-गांठ की कोशिश कर रहे हैं. इससे एनसीपी पर शरद पवार का दबदबा और मज़बूत होगा और अजित पवार को बीजेपी के साथ जाने से रोक देगा."
अपने फ़ैसले का ऐलान करते हुए शरद पवार ने कहा था कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेताओं की एक समिति अब पार्टी के लिए भविष्य की रणनीति तय करेगी.
शरद पवार ने कहा था, "इस समिति में प्रफुल्ल पटेल, सुनील ठाकरे, पीसी चाको, नरहरी ज़िरवाल, अजीत पवार, सुप्रिया सुले, जयंत पाटिल, छगन भुजबल, दिलीप वलसे पाटिल, अनिल देशमुख, राजेश टोपे, जितेंद्र अवहाद, हसन मुशरिफ़, धनंजय मुंडे, जयदेव गायकवाड़ और पार्टी के सभी सेल के प्रमुख होंगे."
शरद पवार ने क्या कहा?
पद छोड़ने का एलान करते हुए शरद पवार ने कहा, "पिछले 60 सालों में आप सभी मेरे साथ मज़बूती से खड़े रहे. मैं इसे हमेशा याद रखूंगा."
शरद पवार ने कहा है कि वो राजनीति, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करते रहेंगे.
शरद पवार का अभी राज्यसभा का तीन साल का कार्यकाल बाक़ी है. उन्होंने कहा है कि वो आगे कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे.
1 मई 1960 को अपना राजनीतिक करियर शुरू करने वाले शरद पवार ने कहा, "इस लंबे राजनीतिक करियर के बाद कहीं ना कहीं रुकने के बारे में सोचना चाहिए. किसी को लालची नहीं होना चाहिए."
82 साल के शरद पवार सिर्फ़ महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि केंद्र की राजनीति पर हावी रहे. चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, कई बार केंद्रीय मंत्री और आईसीसी और बीसीसीआई के अध्यक्ष रहे शरद पवार के 6 दशक से अधिक लंबे राजनीतिक करियर में कई ऐसे पड़ाव आये जिन्होंने भारतीय राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी.
कभी ना रुकने वाले पवार
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार का वो आख़िरी दिन था और सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही थी. ये तस्वीर शरद पवार की थी.
सतारा में एक चुनाव प्रचार के दौरान की तस्वीर जिसमें मूसलाधार बारिश में बिना रुके पवार भाषण दे रहे थे.
2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के बाद कहा गया कि जो भी परिणाम आए, उनमें इस तस्वीर की अहम भूमिका रही.
इस तस्वीर ने गेम चेंजर का काम किया. इस तस्वीर के वायरल होने के साथ ही लोगों ने पवार के जुझारुपन और उनकी डटे रहने की क्षमता के बारे में बातें करनी शुरू कर दीं.
ईडी का वो एपिसोड
साल 2014 में हुए विधानसभा चुनावों में एनसीपी को 41 सीटें मिली थीं. 2019 में पार्टी को 54 सीटें मिलीं. उस समय 78 साल के रहे शरद पवार का जुझारूपन चर्चा में रहा.
विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी थी. लेकिन शरद पवार इस शुरुआती वक़्त में कहीं नज़र नहीं आ रहे थे. वो पिक्चर में तब आए जब प्रवर्तन निदेशालय का विवाद उनसे जुड़ा. इसके बाद उनका जो रूप सामने आया, उसकी चर्चा दूर-दूर की महफ़िलों में भी हुई.
चुनावों के दौरान जब ख़बर आई कि प्रवर्तन निदेशालय ने महाराष्ट्र सहकारी बैंक घोटाला मामले में शरद पवार के ख़िलाफ़ एआईआर की है, उनका रुख़ सभी को चौंकाने वाला था. उन्होंने घोषणा की कि वो ख़ुद ईडी के दफ़्तर जाएंगे. उनकी इस घोषणा ने महाराष्ट्र की राजनीति में खलबली मचा दी.
बाद में मुंबई पुलिस कमिश्नर के आग्रह करने के बाद वो ईडी के ऑफ़िस तो नहीं गए और ख़ुद ईडी ने भी उनसे कहा कि उन्हें ऑफ़िस आने की आवश्यकता नहीं है.
महाराष्ट्र की राजनीति पर क़रीबी नज़र रखने वाले बहुत से जानकारों का मानना है कि प्रवर्तन निदेशालय और शरद पवार के बीच हुए इस एपिसोड ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों को पूरा पलट कर रख दिया.
जुझारू पवार
वरिष्ठ पत्रकार प्रताप आस्बे शरद पवार की राजनीति और रणनीति पर क़रीबी नज़र रखते आए हैं. उनका कहना है "पवार का ये रूप और जुझारूपन कोई नया नहीं है."
वो कहते हैं "साल 1980 में शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे. उस वक़्त उन्होंने दिल्ली में इंदिरा गांधी से मुलाक़ात की. इंदिरा गांधी ने उन्हें सलाह दी कि वो संजय गांधी के नेतृत्व में काम करें बजाय की यशवंतराव चव्हाण की अगुवाई में काम करने के.
लेकिन पवार ने इंदिरा गांधी के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. वो अच्छी तरह से जानते थे कि इंदिरा गांधी के प्रस्ताव को ठुकराने के क्या मायने हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने वही फ़ैसला लिया जो उन्हें ठीक लगा.
इसके बाद जब अगले दिन पवार वापस महाराष्ट्र लौटे तब तक केंद्र सरकार ने राज्य में उनकी सरकार को ख़ारिज करने का फ़ैसला कर लिया था."
आस्बे उस वक़्त का भी ज़िक्र करते हैं जब पवार को सोशलिस्ट कांग्रेस को लेकर मुसीबतों का सामना करना पड़ा था और किस तरह पवार ने अपनी क्षमता से उस गंभीर स्थिति को काबू किया था.
"साल 1980 के विधानसभा चुनावों में पवार की सोशलिस्ट कांग्रेस ने 54 सीटों पर जीत दर्ज की थी. लेकिन यशवंतराव चव्हाण ने सोशलिस्ट कांग्रेस के बहुत से विधायकों को अपनी ओर खींच लिया था और ऐसे में पवार के पास मुश्किल से पांच विधायक ही बचे रह गए थे.
ये पवार के लिए बहुत कठिन स्थिति थी. लेकिन ऐसी परिस्थिति में हार मानकर टूट जाने के बजाय पवार ने एक राज्यव्यापी दौरा किया. वे लोगों से मिले. उन्होंने एक किसान रैली का आयोजन किया. और अपने इन प्रयासों से उन्होंने एक बार फिर अपने लिए लोगों का समर्थन हासिल कर लिया."
आस्बे आगे जोड़ते हैं कि शरद पवार जितने जुझारू दिखते हैं वो असलियत में उससे कहीं अधिक आक्रामक हैं. आस्बे मानते हैं कि राजनीति में वो संसदीय प्रणाली से बहुत अधिक प्रभावित हैं इसलिए ऐसा बहुत कम ही होता है कि उनका आक्रामक रूप सामने आए.
कैंसर के ख़िलाफ़ उनकी लड़ाई उनकी जीवटता का एक और बेहतरीन उदाहरण है. वरिष्ठ पत्रकार मिलिंद खांडेकर ने कुछ समय पहले बताया था, "साल 2004 के लोकसभा चुनावों का वक्त था. मैं पुणे में शरद पवार की रैली को कवर करने के लिए था.
रैली के दौरान ही उन्होंने घोषणा की कि एक बार यह रैली ख़त्म हो जाएगी तो वो सीधे अस्पताल जाएंगे जहां उनका एक इमरजेंसी ऑपरेशन होना है. वो वहां से मुंबई के लिए रवाना हुए.
इंटरव्यू के लिए मैं उनके साथ उनकी कार में ही था. वो ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती हुए. जब पवार की बीमारी की ख़बर सामने आई तो ऐसा माना जाने लगा कि वो अबसे सक्रिय तौर पर काम नहीं करेंगे, लेकिन अब जो है हमारे सामने है. वो कैंसर से लड़कर खड़े हैं और अब कई साल बाद भी वो पर्याप्त सक्रिय हैं. ये उनका आत्मबल नहीं तो और क्या है..."
'ये आक्रामकता, ये जुझारुपन मुझे मेरी मां से मिली है'
अपनी जीवनी में शरद पवार ने कहा था कि उन्हें ये जुझारुपन, ये जीवटता उनकी मां शारदाताई पवार से मिली.
उन्होंने लिखा है, "हमारे गांव में एक आवरा सांड था. उसकी वजह से गांव के लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था. एक दिन किसी ने उसे आग के हवाले कर दिया. जली हुई हालत में वह सड़क के एक किनारे गिर पड़ा.
जब अगले दिन मेरी मां सोकर उठी उन्होंने उस घायल सांड को देखा. उसके शरीर से खून बह रहा था. मेरी मां उसके पास गई और बेहद कोमल भावों के साथ उसकी पीठ पर हाथ फेरा. इतने में वो सांड उठ खड़ा हुआ और उसने पूरी ताक़त के साथ मेरी मां को उठाकर एक ओर झटक दिया.
अगले पंद्रह मिनट तक वो सांड अपने पूरे वज़न के साथ उन्हें दबाता रहा. इसकी वजह से उनकी जांघों की सारी हड्डियां टूट गई थीं. जब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया तो डॉक्टर को उनके एक पैर से लगभग छह इंच की एक हड्डी निकालनी पड़ी.
वो ऑपरेशन तो सफल रहा लेकिन उस हादसे के बाद वो कभी भी बिना सहारे के चल नहीं सकीं. इतना कुछ हो जाने के बावजूद मेरी मां ने कभी भी दुख नहीं मनाया."
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