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डांसिंग ऑन द ग्रेव: 32 साल पुरानी मर्डर मिस्ट्री की कहानी
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
"उन्होंने एक महिला की तीन साल पुरानी हत्या की गुत्थी सुलझा ली है. पुलिस कमिश्नर ने आज हमसे (मीडिया से) मुलाकात की, जिसकी वजह से मुझे ऑफिस पहुंचने में देर हो गई."
28 मार्च 1994 को देर रात बेंगलुरु के एक न्यूजरूम में प्रवेश करते हुए यह बात रिपोर्टर ने अपने ब्यूरो चीफ से कही.
जब रिपोर्टर ने केस से जुड़ी और जानकारी दी तो ब्यूरो चीफ ये आकलन करने की कोशिश करने लगे थे कि ये स्टोरी कितनी बड़ी है.
शहर में नए आए इस रिपोर्टर ने कहा, "वह मैसूर के दीवान की पोती है."
ब्यूरो चीफ ने पूछा, "कौन से दीवान"
रिपोर्टर ने जवाब दिया, "सर मिर्ज़ा इस्माइल."
सर मिर्जा इस्माइल 1926-41 तक न सिर्फ मैसूर के दीवान थे जिन्होंने बेंगलुरु और मैसूर को सजाने का काम किया था, बल्कि उन्होंने किले के बाहर जयपुर भी बनाया था. उन्होंने 1942 से 1946 के बीच पर्यटन के लिए बुनियादी ढांचा बनाने का काम भी किया.
पाकिस्तान के प्रति अपने लगाव को लेकर निज़ाम के साथ मतभेद हुआ जिसके चलते हैदराबाद के दीवान (1947-48) के रूप में उनका करियर समाप्त हो गया.
यह पहली बार था जब हमें पता चला कि दीवान की एक नवासी थी, जिसका नाम शाकिरा खलीली था. उनकी शादी पहले भारतीय विदेश सेवा के एक अधिकारी अकबर खलीली से हुई थी, जिन्होंने ईरान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में राजदूत और भारतीय उच्चायुक्त के महत्वपूर्ण पद संभाले थे. वे मिडिल ईस्ट के भी एक्सपर्ट थे.
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तीन साल पुरानी थी गुमशुदगी की शिकायत
पुलिस ने बहुत गर्व से यह घोषणा की थी कि उन्होंने उस तीन साल पुरानी गुमशुदगी की शिकायत को सुलझा लिया है जो शाकिरा की बेटी सबा खलीली ने दर्ज करवाई थी.
पुलिस कमिश्नर पी कोदंडारमैया ने उस रात इस रिपोर्टर को बताया था, "पहली बार मैं इस महिला से तब मिला था जब वह गुमशुदगी की रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई न करने के चलते पुलिस पर चिल्लाते हुए मेरे ऑफिस में आई थी."
शिकायतकर्ता सबा खलीली ऑफिस में पहुंचकर जोर से चिल्लाने लगी और उसके बाद पुलिस कमिश्नर पी कोदंडारमेया और दूसरे स्टाफ के सामने रोने ज़ोर-ज़ोर से लगी थी.
एक बार शांत होने पर उन्होंने अपनी मां की कहानी सुनाई और बताया कि वे पिछले तीन साल से उन तक पहुंचने के लिए कितनी कोशिशें कर रही हैं.
13 अप्रैल 1991 को शाकिरा खलीली अपनी मां गौहर ताज नमाजी से मिली थी. छह दिन बाद सबा की मुलाकात उनसे हुई. शाकिरा के यहां घर के काम में मदद करवाने वाली जोसफीन और हाउस हेल्प राजू ने 28 मई 1991 को उन्हें देखा था. यह आखिरी बार था जब शाकिरा को किसी ने देखा था.
अपनी मां तक पहुंचने की जो कोशिशें सबा कर रहीं थी उन्हें रोकने का काम स्वामी श्रद्धानंद उर्फ मुरली मनोहर मिश्रा ने किया. शाकिरा ने अकबर खलीली को तलाक देने के बाद श्रद्धानंद से शादी की थी.
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जब भी वे मुंबई से फोन करतीं तो श्रद्धानंद उन्हें कोई न कोई कहानी सुनाने लगते. कभी वे कहते कि शाकिरा बड़े हीरा व्यापारी की शादी में शामिल होने गई हैं तो कभी कहते कि वह अमेरिका के एक मशहूर अस्पताल में गई हैं, या कभी ये कहानी सुनाने लगते कि बहुत सारी प्रॉपर्टी होने के चलते उन्हें आयकर विभाग से डर है और वे सामने नहीं आना चाहतीं.
सबा को श्रद्धानंद पर शक होने लगी और उन्होंने अपनी मां के लापता होने के लिए उन्हें जिम्मेदार मानना शुरू कर दिया.
पिता अकबर खलीली से तलाक के बाद सबा इकलौती बेटी थी जो अपनी मां से मिलने के लिए अक्सर बेंगलुरु आती थीं. शाकिरा ने श्रद्धानंद से शादी करने के बाद अपनी चार बेटियों और अपने परिवार से नाता तोड़ लिया था.
रामपुर की बेगम ने जब श्रद्धानंद को खलीलियों से मिलवाया था, तब श्रद्धानंद उनके रिचमंड रोड स्थित बंगले में रहने आ गए थे, क्योंकि वे संपत्ति के मामलों को देखते थे और उनकी संपत्तियों से जुड़े कुछ मामलों को भी सुलझा चुके थे.
उन दिनों अकबर खलीली ईरान में कार्यरत थे और ज्यादातर राजनयिक उन देशों की घरेलु स्थितियों के चलते अपने परिवारों को साथ नहीं ले जा पाते थे. समय के साथ श्रद्धानंद शाकिरा के करीब आ गए. श्रद्धानंद जानते थे कि शाकिरा को एक बेटा चाहिए और वह ऐसा करने के लिए पागल है. उसने दावा किया कि उसके पास ऐसी कुछ शक्तियां हैं जिससे यह संभव है.
गुमशुदगी की शिकायत की जांच तब आगे बढ़ी जब पुलिस कमिश्नर पी कोदंडारमैया ने इस मामले को सीसीबी (सेंट्रल क्राइम ब्रांच) को सौंपा.
कोडनरमैया द्वारा मामले को सीसीबी को सौंपे जाने के बाद ही आगे बढ़ी.
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सीसीबी के लिए मुश्किलें
आपकी टीम में से किसने इस मामले को सुलझाया? इस रिपोर्टर से फोन पर बाते करते हुए पुलिस कमिश्नर पी कोदंडारमैया इस सवाल पर खूब हंसे और कहा, "मीडिया में आपके बाकी साथी मुझे मार डालेंगे."
उस वक्त कोदंडारमैया के सहकर्मी प्रेस कॉन्फ्रेंस की रिपोर्ट लिख रहे थे.
सीसीबी टीम सुराग की तलाश में काफी समय से मेहनत कर रही थी. पुलिस कॉन्स्टेबल महादेव को पुरानी और आजमाई हुई एक तरकीब सूझी.
कोदंडारमैया ने रिपोर्टर को बताया, "वह शाकिरा के घर में सहायक को शराब पिलाने के लिए ब्रिगेड रोड पर स्थित एक मशहूर जगह ले गया. (उन दिनों वहां देशी शराब बेची जाती थी जिसे अरक कहा जाता था) इसके बाद हमारी टीम इस मामले में साफ हो गई कि इस मामले में श्रद्धानंद शामिल हैं और हमने उन पर नजर रखनी शुरू कर दी."
काफी शराब पीने के बाद राजू ने पुलिस कॉन्स्टेबल महादेव को बताया कि बंगला के पीछे एक छोटे से घर के बेडरूम के आगे जमीन पर एक गड्ढा खोदा गया. इसे इस तरह से बनाया गया था कि इसमें पानी भरा जा सके. इसके बाद शिवाजीनगर में एक बड़ा बक्सा बनाकर घर में लाया गया. इस बक्से में पहिए लगाए हुए थे ताकि उसे एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ले जाया जा सके.
राजू ने सालों बाद एक सहयोगी को बताया था, "मैंने गेस्ट हाउस से उस बॉक्स को लाने के लिए चार आदमियों को बुलाया था."
जांच अधिकारी वीरैया ने इस रिपोर्टर को बाद में बताया था कि श्रद्धानंद ने सेंट मार्क्स रोड पर स्थित बैंक के लॉकरों तक पहुंचने के लिए जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल किया था जो उसे शाकिरा ने दी थी.
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वीरैया ने बताया, "वह कई बार बैंक गया. शाकिरा ने मई 1991 में श्रद्धानंद का नाम अपनी सभी संपत्तियों के संयुक्त खाताधारक के रूप में से हटा दिया था, क्योंकि शाकिरा को उसके इरादों पर शक होने लगा था. यह उनके लापता होने से पहले की बात है."
बेंगलुरु के नामचीन क्रिमिनल लॉयर सीवी नागेश को इस केस में विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया गया था. उन्होंने तब इस रिपोर्टर से कहा था, "सबा के साथ-साथ दूसरी बेटियों से भी उसकी नजदीकी उसे परेशान करने लगी थी."
पुलिस ने पाया कि श्रद्धानंद ने उस घर को छोड़कर जिसमें वह और शाकिरा रहते थे, बाकी सारी संपत्ति को बड़ी रकम में बेचने का एग्रीमेंट कर लिया था.
इस रिपोर्टर ने पूछा कि ये सौदा कितने में हुआ था, कितनी बड़ी रकम थी?
कोदंडारमैया ने कहा, "अपनी कुर्सी से मत गिर जाना. यह करीब सात करोड़ रुपये का था." (बेंगलुरु में उस समय तक संपत्ति की कीमतों में उछाल नहीं आया था और वह कई साल दूर था.)
श्रद्धानंद से पुलिस ने पूछताछ की, जिसमें वह टूट गया और उसने शाकिरा की हत्या करने की बात कबूल कर ली.
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हत्या करने के बाद कैसे बचा रहा?
हत्या की बात कबूल करने के बाद श्रद्धानंद पुलिस को क्राइम स्पॉट पर ले गया.
वीरैया ने बताया, "उसने हमें वही जगह दिखाई जहां उसने लकड़ी के बक्से को धक्का दिया था, जिसमें पहिए लगे थे. वह अपनी पत्नी को हर रोज चाय बनाकर देता था और उसने उसी चाय में नींद की गोलियां मिला दी थीं."
वीरैया ने रिपोर्टर को बताया, "फिर उसने गद्दे समेत उसे बॉक्स में धकेल दिया और ऊपर से ढक्कन को ठोक कर बंद कर दिया. उसने खुद बेडरूम में खिड़की के नीचे की दीवार को तोड़ दिया था, जिसके बाद उसने बॉक्स को खुले में बने गड्ढे में धकेल दिया. ये गड्ढे उसने पहले ही तैयार करके रखा हुआ था."
उसने शाकिरा को जिंदा दफन कर दिया था. फॉरेंसिक टीम को इसके सबूत मिले थे.
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दो दिन बाद, श्रद्धानंद को घर ले जाया गया. यहां पहुंचने पर उसने चाक के टुकड़े से गड्ढे को ढकने वाले पत्थरों पर निशान लगा दिया, जहां उसने बॉक्स को धकेला था.
पुलिस टीम ने बॉक्स को हटाया और खोपड़ी के साथ कंकाल को उसमें पाया. पहचान करने के लिए यह फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) के लिए एक महत्वपूर्ण साक्ष्य था.
क्रेनियाफैसियल तकनीक की मदद से शाकिरा की एक तस्वीर को खोपड़ी के ऊपर लगाया गया. इस तस्वीर को परिवार के सदस्यों और दूसरे लोगों ने प्रमाणित किया था. वह वास्तव में शाकिरा ही निकली.
डीएनए फिंगरप्रिंटिंग ने भी शाकिरा की पुष्टि की. उनकी मां गौहर ताज नमाजी ने शाकिरा की उंगलियों पर मौजूद अंगुठियों की पहचान की.
कर्नाटक सरकार ने शहर के बड़े आपराधिक वकीलों में से एक सीवी नागेश को विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया.
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सत्र न्यायालय ने 21 मई, 2005 को अपना फैसला सुनाया. नागेश ने पत्रकारों से उस दिन कोर्ट के बाहर बात करते हुए कहा, "न्यायाधीश ने अभियोजन पक्ष की ओर से दी गई दलीलों को स्वीकार करते हुए आदेश दिया है कि अभियुक्त को मृत्युदंड दिया जाए."
"यह मेरी मां की मौत का मुआवजा नहीं है, लेकिन मैं अपनी मां को वापस नहीं पा सकती. न्याय हुआ है.'' यह कहते हुए सबा रो पड़ीं.
कर्नाटक हाई कोर्ट ने 20 सितंबर 2005 को मौत की सजा की पुष्टि की. जस्टिस एस आर बन्नुर मठ और जस्टिस एसी काबिन की पीठ ने लिखा, "अभियुक्त के पास पर्याप्त मकसद था और अपनी पत्नी की हत्या करने का एकमात्र उद्देश्य केवल उसकी मूल्यवान संपत्तियों को इस्तेमाल कर खुद को अमीर बनाना था. मेरी राय में यह मामला दुर्लभ मामलों की श्रेणी में आता है."
सुप्रीम कोर्ट की दो बेंच ने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील भी सुनीं. कुल आठ न्यायाधीशों ने मामले की सुनवाई की और अभियुक्त को दोषी पाया. अंतिम चरण में जाकर एक न्यायाधीश को लगा कि फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है, लेकिन इसके साथ जरूरी बात यह थी कि श्रद्धानंद को जीवन भर जेल से रिहा नहीं किया जाएगा.
श्रद्धानंद के फिर से अस्थायी पैरोल पाने के प्रयासों को भी तीन दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने खारिज कर दिया था, जिसमें जस्टिस केएम जोसेफ, बीवी नागरत्ना और आशानुद्दीन अमानुल्लाह शामिल थे.
शाकिरा खलीली की कहानी को अब एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर क्राइम डॉक्यू सीरीज में बनाया गया है.
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