क्या दुनिया में बांझपन की समस्या बढ़ रही है?

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''हमारी शादी 2003 में हुई. इसके बाद मेरी पत्नी गर्भवती हुईं लेकिन कुछ स्वास्थ्य कारणों से उनका गर्भपात कराना पड़ा. फिर कंसीव करने में दिक़्क़त आने लगी. इसके बाद जब मुझे डॉक्टर ने जांच की सलाह दी तो पता चला कि मेरा स्पर्म काउंट या शुक्राणुओं की संख्या में कमी है. अब मेरा इलाज चल रहा है.'' डॉ जयंत कुमार
''इस महिला की उम्र 30 है और उनकी शादी को सात साल हो चुके थे. इस महिला के हार्मोन असंतुलित थे. उनकी ओवरी में सिस्ट थे जिसकी वजह से वो कंसीव नहीं कर पा रही थीं. हार्मोन के लिए दवाएं दी गईं. उनके पति स्वस्थ थे. इसके बाद इस महिला को आईयूआई के ज़़रिए कंसीव कराया गया.'' इस महिला की पहचान छिपाई गई है.
क्या भारत में इनफ़र्टिलिटी या बांझपन की समस्या बढ़ रही है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन या डब्लयूएचओ के मुताबिक़ दुनिया में छह में एक व्यक्ति ने इनफ़र्टिलिटी या बांझपन का अनुभव किया है.
डब्लयूएचओ के अनुसार इनफ़र्टिलिटी एक ऐसी बीमारी है जिसमें एक पुरुष या महिला 12 महीने या उससे ज़्यादा समय तक नियमित तौर पर असुरक्षित संबंध बनाते हैं लेकिन उसके बावजूद महिला गर्भवती नहीं हो पाती है.
डब्लयूएचओ की तरफ़ से जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनियाभर में 15 फ़ीसद दंपति इनफ़र्टिलिटी से प्रभावित हैं. ये वो दंपत्ति हैं जो प्रजनन आयु में हैं.

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संगठन के मुताबिक़ 15-49 वर्ष की महिलाएं प्रजनन आयु में आती हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि 40-45 उम्र के बाद पुरुषों के स्पर्म काउंट पर असर पड़ने लग जाता है.
भारत में इनफ़र्टिलिटी
भारत की बात की जाए तो डब्लयूएचओ के मुताबिक़ यहां इनफ़र्टिलिटी 3.9 से 16.8 प्रतिशत है.
नेशनल हेल्थ पोर्टल (एनएचपी) पर छपी जानकारी के अनुसार भारतीय राज्यों में इनफ़र्टिलिटी अलग-अलग स्तर पर है जैसे उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र में 3.7 प्रतिशत है, जबकि आंध्रप्रदेश में ये पांच प्रतिशत है और कश्मीर में 15 प्रतिशत है.
डॉक्टरों का कहना है कि इनफ़र्टिलिटी की समस्या बढ़ रही है और एक दंपत्ति पर उसका असर केवल सामाजिक ही नहीं बल्कि आर्थिक तौर भी पड़ता है.
डॉक्टर बताते हैं कि पहले महिलाओं को ही इनफ़र्टिलिटी की समस्या से जोड़कर देखा जाता था लेकिन हाल के कुछ सालों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ी है और जांच के लिए पुरुष भी सामने आने लगे हैं.

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डॉ गुंजन सब्बरवाल का कहना है कि एक दशक पहले जो दंपत्ति आते थे वहां महिलाएं संक्रमण की समस्या लेकर आती थीं जिसकी वजह से वे मां बनने में सक्षम नहीं होती थीं लेकिन पुरुष कभी जांच के लिए आगे ही नहीं आते थे.
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महिलाओं में समस्या
वहीं एससीआई आईवीएफ़ सेंटर में डॉक्टर स्मिता जैन कहती हैं, ''पहले महिलाएं ट्यूबल ब्लॉकेज या बच्चेदानी के नलियां ब्लॉक होने की समस्या लेकर आती थीं. ये समस्या संक्रमण की वजह से होती हैं. वहीं ऐसी भी महिलाएं होती थीं जिन्हें टीबी होती थी. टीबी जननांगों को भी प्रभावित करता है जिसकी वजह से महिलाओं के यूटेरस या ट्यूब में संक्रमण हो जाता था और उन्हें कंसीव करने में परेशानी होती थी.''
एक और कारण बताते हुए वो कहती हैं कि अब कई लड़के-लड़की कम उम्र में ही संबंध स्थापित कर लेते हैं ऐसे में लड़कियां क्लेमाइडिया और गोनोरिया से संक्रमित हो रही हैं जिससे आगे चल कर फ़र्टिलिटी पर असर पड़ सकता है.
लेकिन हाल के वर्षों में ऐसे मामलों में बदलाव आया है और ये देखा जा रहा है कि पहले महिलाएं संक्रमण के मामलों के साथ आती थीं लेकिन अब हार्मोन के अंसतुलन से होने वाली समस्याओं के साथ ज़्यादा आ रही हैं.
डॉ गुंजन सब्बरवाल और डॉ स्मिता जैन बताती हैं, ''अब ऐसी महिलाएं आ रही हैं जिन्हें पूअर ओवरियन रिज़र्व (पीएमसी) है- इसमें उनकी ओवरी ठीक से काम नहीं कर रही हैं और अंडाणु बनने में दिक़्क़तें पेश आती हैं. वहीं पोलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम से भी पीड़ित होती हैं. इसमें हामोर्न का संतुलन बिगड़ जाता है और ओवरी में सिस्ट हो जाते हैं जिससे माहवारी पर असर पड़ता है. इसके अलावा अब पुरुष भी इनफ़र्टिलिटी की समस्या लेकर आ रहे हैं.''
डॉ गुंजन सब्बरवाल नोवा इनफ़र्टिलिटी क्लीनिक में काम करती हैं.
वहीं डॉक्टरों का कहना है, ''आज ये देखा जा रहा है कि युवा अमूमन 30 साल की उम्र में शादी कर रहे हैं और फ़ैमिली प्लैन करने में भी समय लेते हैं. इसके कई वाजिब कारण हो सकते हैं जैसे करियर आदि जिसके बाद वो इनफ़र्टिलिटी की समस्या लेकर आते हैं.''
ऐसे मामले भी सामने आते हैं जहां पहले बच्चे के बाद दंपत्ति कई साल बाद दूसरा बच्चा प्लैन करते हैं. इस वजह से भी उन्हें दिक़्क़ते पेश आती हैं. इन दंपत्तियों में आमतौर पर ऐसा देखा जाता है कि पुरुष वर्ग अपनी जांच में ही देरी करते हैं क्योंकि उन्हें ये समझने में समय लगता है कि उनमें भी कमी हो सकती है.
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पुरुषों में इनफ़र्टिलिटी
- स्पर्म काउंट या शुक्राणुओं की संख्या में कमी
- स्पर्म मॉरफ़ोलोजी या स्पर्म के स्ट्रक्चर या आकृति में बदलाव
- स्पर्म मोटिलिटी या शुक्राणुओं के चलने की क्षमता में कमी
- स्पर्म का ख़त्म होना
डॉ बताते हैं कि आजकल इनफ़र्टिलिटी के कई कारण देखने को मिल रहे हैं. इसमें मुख्य हैं-
हार्मोन का असंतुलन
फ़ोन और लेपटॉप से निकलने वाला रेडिएशन
लाइफ़स्टाइल
धुम्रपान और शराब का सेवन
प्रदूषण
फल एवं सब्जि़यों की वजह से कीटनाश्कों का सेवन
प्लास्टिक का इस्तेमाल
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डॉ गुंजन सब्बरवाल बताती हैं कि गर्भाधारण करने के कई तरीक़े हैं- पहला जिसमें एक दंपत्ति को मेडिकली कोई मदद की ज़रूरत नहीं पड़ती, दूसरा जहां महिला में अंडाणु या पुरूष में शुक्राणु ना बन रहे हों तो दवाएं देकर फिर प्राकृतिक तरीक़े से कंसीव कराने की कोशिश की जाती है.
तीसरा तरीक़ा इंट्रायूटेराइन इनसेमिनेशन या आईयूआई होता है और चौथा है इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन या आईवीएफ़. ये दोनों ही कृत्रिम तरीक़े होते हैं.
डब्लयूएचओ के अनुसार उच्च आय वाले देशों में जहां 17.8 प्रतिशत लोग इनफ़र्टिलिटी से प्रभावित हैं वहीं निम्न और मध्यम आय वाले देशों में ये आंकड़ा 16.5 प्रतिशत है.
साथ ही संस्था का कहना है कि ग़रीब देशों में लोग अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा इनफ़र्टिलिटी केयर पर ख़र्च करते हैं.
डब्लयूएचओ के महानिदेशक डॉ टेडरॉस एडहेनॉम का कहना है, ''ये रिपोर्ट एक अहम सच को बताती है- इनफ़र्टिलिटी भेदभाव नहीं करती.''
उनके अनुसार, जिस अनुपात में लोग प्रभावित हैं वो ये बताता है कि फ़र्टिलिटी केयर को लेकर पहुंच को बढ़ाना होगा और ये सुनिश्चित करना होगा कि इस मुद्दे को शोध और नीति में दरकिनार न किया जाए. साथ ही जो माता-पिता बनना चाहते हैं उनके लिए ये केयर वहन करने योग्य हो, सुरक्षित और प्रभावी ढ़ंग से मिले.
डॉक्टरों का कहना है कि जहां लोगों में इनफ़र्टिलिटी बढ़ रही है वहीं इलाज के ऐसे कृत्रिम तरीक़े भी मौजूद हैं जिससे वे माता-पिता बन सकते हैं.
लेकिन इन तरीक़ों का ख़र्च लाखों में आता है. उच्च मध्यम आय और उच्च आय के लोगों के लिए तो ये आसान होता है लेकिन निम्न आय के लोगों के लिए ये चुनौती पेश करता है.
वहीं इन तरीक़ों में ये गारंटी नहीं होती कि पहली कोशिश में ही सकारात्मक नतीजे आएंगे.
ऐसे में वे सलाह देते हैं कि अपने करियर और जीवन के बीच संतुलन बनाना एक उपाय हो सकता है.
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