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शिवसेना बनाम शिवसेनाः महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल पर अदालत ने क्या कहा?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"सिर्फ़ पार्टी के अंदर के असंतोष की वजह से राज्यपाल के लिए ये न्यायोचित नहीं हो सकता कि वो विश्वास मत हासिल करने के लिए कहें."
ये टिप्पणी भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की थी जो शिव सेना बनाम शिव सेना की सुनवाई कर रही पांच सदस्यों वाली संवैधानिक पीठ की अगुवाई कर रहे थे.
बीते वर्ष जून में एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री बनने से पहले तक महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाविकास अघाड़ी की सरकार थी. महाविकास अघाड़ी में शिवसेना के साथ कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस शामिल थीं.
उद्धव ठाकरे को अपने दल के अंदर बग़ावत का सामना करना पड़ा और उन्हीं की पार्टी के नेता एकनाथ शिंदे ने अपना अलग गुट बना लिया. शिंदे ने भाजपा के समर्थन से सरकार बना ली थी.
एकनाथ शिंदे ने शिव सेना के चुनाव चिन्ह तीर धनुष पर भी दावा किया था जिसे चुनाव आयोग शिंदे गुट के सुपुर्द भी कर दिया है.
चुनाव आयोग के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ उद्धव ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
इस मामले में सुनवाई पूरी कर ली गई है और खंडपीठ ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा है. अब किसी भी दिन इस मामले को लेकर फ़ैसला आ सकता है.
इस मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ में मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों ने जो टिप्पणियाँ कीं उससे महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं.
जिस तरह से राज्यपाल ने उद्धव बालासाहेब ठाकरे को सदन में विश्वासमत हासिल करने का निर्देश दिया था, अदालत ने उस फ़ैसले पर भी सवाल उठाए हैं.
कोर्ट ने पूछा- उद्धव ने इस्तीफ़ा क्यों दिया?
खंडपीठ ने उद्धव ठाकरे के वकील से भी पूछा कि सदन में शक्ति परीक्षण से पहले ही उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा क्यों सौंप दिया था?
उन्होंने उद्धव ठाकरे के वकील अभिषेक मनु सिंघवी से पूछा, "तो आपके अनुसार हम क्या करें? वापस बहाल कर दें? लेकिन आपने तो इस्तीफ़ा दे दिया था. ये तो वही हो गया कि अदालत से कहा जा रहा है कि उस सरकार को बहाल कर दीजिए जिसने इस्तीफ़ा दे दिया था."
मुख्य न्यायाधीश का कहना था कि अगर उद्धव ठाकरे विधानसभा में विशवास प्रस्ताव का सामना करते और उनकी सरकार गिर जाती तो अदालत उनको बहाल कर सकती थी. लेकिन उद्धव ठाकरे ने उससे पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया.
उनका कहना था, "अगर हम आपको अब बहाल कर देते हैं तो ये संवैधानिक उथल पुथल पैदा कर देगा."
राज्यपाल पर भी उठाए सवाल
मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि "राज्यपाल ने उद्धव ठाकरे की सरकार से जो शक्ति प्रदर्शन करने को कहा उसका क्या आधार था?"
उन्होंने टिप्पणी की कि, "जब सदन में बहुमत अस्थिर नज़र आ रहा हो तो राज्यपाल शक्ति परिक्षण को कह सकते हैं लेकिन क्या इस तरह का कोई भी संकेत था?"
मुख्य न्यायाधीश का कहना था, "विधायकों में मतभेद किसी भी कारण से हो सकता है. ये पार्टी के सिद्धांतों को लेकर भी हो सकता है और विकास के लिए पर्याप्त राशि अगर न उपलब्ध कराई जा रही हो तो भी हो सकता है. लेकिन क्या ये राज्यपाल के लिए शक्ति परीक्षण करवाने का संतोषजनक आधार बनता है? राज्यपाल एक ख़ास नतीजे निकलवाने के लिए अपने पद का इस्तेमाल नहीं कर सकते."
"राज्यपाल फ़ोन आने पर बार-बार बैठक के बीच से चले जाते थे"
शिव सेना (उद्धव ठाकरे गुट) के सांसद विनायक राउत ने बीबीसी से कहा कि अदालत ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा है मगर जजों ने जो टिप्पणी की है उससे तत्कालीन राज्यपाल की भूमिका संदेह के घेरे में ही रहेगी.
राउत कहते हैं, "फ़ैसला जो भी आए लेकिन जिस तरह से देश की सर्वोच्च अदालत ने राज्यपाल की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं वो अप्रत्याशित है. उद्धव ठाकरे पहले ही बोल चुके हैं कि उनका सुप्रीम कोर्ट पर ही विश्वास टिका हुआ है."
शिव सेना के सांसद विनायक राउत कहते हैं कि जब मुंबई में ये राजनीतिक उथल पुथल चल रही थी तो वो राज्यपाल के साथ हो रही लगभग सभी बैठकों में वे शामिल थे.
उनका कहना था, "बैठक के दौरान राज्यपाल महोदय का बार-बार फ़ोन आता था. वो बैठक के बीच से उठकर चले जाते थे. फिर लौट कर आते थे और कुछ कहते थे. फिर फ़ोन आ जाता था. मैंने भगत सिंह कोश्यारी जैसा राज्यपाल पहले कभी नहीं देखा था जो बिल्कुल पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे थे."
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ में न्यायमूर्ति एमआर शाह, न्यायमूर्ति कृष्णा मुरारी, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति हिमा कोहली शामिल थीं जबकि उद्धव ठाकरे की तरफ़ से अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल मामले की पैरवी कर रहे थे.
इस मामले में चुनाव आयोग की तरफ़ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता थे जिन्होंने शक्ति प्रदर्शन को लेकर पूछे गए मुख्य न्यायाधीश के एक सवाल पर कहा कि ये मामला राजनीतिक है इसलिए वो इसपर कोई टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हैं.
अदालत और चुनाव आयोग की अग्निपरीक्षा
संविधान के जानकार और वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि सिर्फ़ चुनाव चिन्ह के आधार पर ही संगठन पर ग़लत तरीके से क़ब्ज़ा करना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.
उनका कहना है कि अब बहुत कुछ सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर ही निर्भर करेगा क्योंकि अब तो उद्धव ठाकरे और उनके गुट के विधायकों और सांसदों पर अयोग्यता की तलवार लटक रही है.
विराग कहते हैं कि चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल हैं क्योंकि उस ने शिव सेना के उस संविधान को भी नकार दिया था जिसमें उद्धव ठाकरे को संगठन पर सर्वाधिकार दिया गया था.
वे कहते हैं, "मगर एकनाथ शिंदे ने भी वैसा ही संविधान बनाकर अब संगठन पर एकाधिकार हासिल कर लिया है. अब इस मामले में अदालत और चुनाव आयोग की भी अग्निपरीक्षा है."
विराग गुप्ता संविधान की दसवीं अनुसूची में दिए गए दल बदल विरोधी क़ानून का हवाला देते हुए कहते हैं कि इस क़ानून के हिसाब से एकनाथ शिंदे गुट को तभी मान्यता मिल सकती थी जब वो किसी दूसरे दल में अपने साथी विधायकों के साथ विलय कर लेते हैं.
उनका यह भी कहना था कि क़ानून के प्रावधानों को ताख पर रख कर एकनाथ शिंदे को सरकार बनाने और विधानसभा का अध्यक्ष चुनने की छूट मिलती रही.
गुप्ता कहते हैं, "इस मामले में कई संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं. बतौर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने शिंदे गुट के विधायकों की असुरक्षा के मुद्दे को अनदेखा किया. विधानसभा के अध्यक्ष ने विधायकों की अयोग्यता की याचिका को लंबित रखा. इसके साथ की चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा हो गया है."
विराग गुप्ता मानते हैं कि इस मामले में संवैधानिक पीठ का फ़ैसला बहुत अहम होगा चाहे वो जो भी हो. क्योंकि आगे इस फ़ैसले का हवाला दिया जाता रहेगा.
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