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लाखों लूटकर ग़रीबों में बांटने वाला, कौन था आंध्र का रॉबिन हुड?
- Author, शंकर वरीसेट्टी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद
क्या आपने रॉबिनहुड के बारे में सुना है?
ऐसे कई क़िस्से आपने सुने होंगे जिनमें चोर-डकैत अमीरों को लूटते हैं और फिर लूट का सामान गरीबों में बाँट देते हैं. ऐसे चोरों पर कई फ़िल्में और सीरियल भी बनाए गए हैं.
ऐसे क़िस्सों में सबसे लोकप्रिय नाम रॉबिनहुड का है.
लेकिन भारत के दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में भी एक ऐसा शख़्स था जिसे रॉबिन हुड के नाम से जाना जाता था.
राज्य के स्टुअर्टपुरम के लोग गोकरी नागेश्वर राव को 'टाइगर' कहते हैं और कुछ उन्हें 'आंध्र का रॉबिन हुड' कहते हैं.
अब 'टाइगर' नागेश्वर राव नाम की फ़िल्म आ रही है. इसमें नायक के रूप में जानेमाने अभिनेता रवि तेजा हैं.
'टाइगर' नागेश्वर राव की कहानी
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, गोकरी नागेश्वर राव स्टुअर्टपुरम में सबसे नामी लुटेरों में से एक था. उसके ख़िलाफ़ कई गंभीर केस दर्ज थे.
उसकी मौत 24 मार्च 1980 को पुलिस के साथ एक मुठभेड़ में हुई थी. इस इनकाउंटर से पहले वो कई बार पुलिस के चंगुल से छूट चुका था.
नागेश्वर राव के भाई प्रभाकर राव का कहना है कि उसकी मौत की वजह उसके बुरे कर्म थे.
प्रभाकर राव कहते हैं, "मेरे पिता से पहले हमारे परिवार के लोग चोरी करते थे. हमने भी कई चोरी और डकैती की हैं. मेरे छोटे भाई नागेश्वर राव को भी इसी अनुशासन में प्रशिक्षित किया गया था. लेकिन वह जो कुछ भी कमाता था, सब दान कर देता था."
प्रभाकर राव अब स्टुअर्टपुरम में एक छोटे से घर में रहते हैं. उन्होंने लाखों की चोरियां की हैं. उनका कहना है कि उनके छोटे भाई ने भी कभी अपने पैसे छिपाने की कोशिश नहीं. उल्टा वो जो चोरी करते उसे लोगों में बांट देते.
इसी कारण आम लोगों में उनका ज़बरदस्त समर्थन था. आख़िरकार जब उनकी पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई तो उस वक़्त लोगों में गुस्से की लहर थी.
बनगानपल्ली में डकैती को लेकर सनसनी
1974 में आज के नांदयाल ज़िले के बनगानपल्ली में एक बैंक लूट लिया गया था. उस समय पूरे देश में ये ख़बर छा गई थी.
कड़ी सुरक्षा के बावजूद लुटेरे बैंक में घुसे. लुटेरे भारी मात्रा में नकदी और जवाहरात लेकर ग़ायब हो गए. बताया जाता है कि उस वक्त इस डकैती में 35 लाख रुपये की लूट हुई थी.
आधी रात को बैंक में घुसकर सारी संपत्ति लूट लेने की घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई.
प्रभाकर राव ने बीबीसी को बताया, "हमारे गिरोह के कुल दस सदस्य बनगानपल्ली डकैती में शामिल थे. चूंकि बैंक पुलिस स्टेशन के सामने था, इसलिए हमने सावधानी बरती. हमने आधी रात में बैंक का पिछला दरवाजा तोड़ा था. सुरक्षा के साथ पैसा निकाला और श्मशान घाट ले गए."
लूटे गए सामान के बारे में प्रभाकर राव कहते हैं, "इसमें 14 किलो सोना और 50 हज़ार रुपए नकद थे. वहां से लाने के बाद, गिरोह के सभी सदस्य इस लूट को आपस में बांट पाते कि उससे पहले ही पुलिस ने हमारे गांव को घेर लिया. नागेश्वर राव इस घेरे को भेदते हुए बच निकले, पर मैंने आत्मसमर्पण कर दिया."
जेल से भागना
नागेश्वर राव 1970 के दशक के दौरान अपने भाई के साथ छोटी-मोटी चोरियां करने लगा था. प्रभाकर पहले ही एक नामी चोर था.
इसके बाद नागेश्वर राव ने लगभग 15 वर्षों तक कई बड़ी डकैतियों में सक्रिय रूप हिस्सा लिया.
नागेश्वर राव के चाहने वाले उन्हें 'टाइगर' कह कर बुलाते थे, क्योंकि वह आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर डकैतियों को अंजाम देने के बावजूद कई बार पुलिस की गोलियों से बच निकले थे.
प्रभाकर राव बताते हैं, "हमें 1976 के आसपास तमिलनाडु में गिरफ्तार किया गया था. हम दोनों को अलग-अलग जेलों में डाल दिया गया था. हम अदालत में एक पेशी के दौरान मिले तो नागेश्वर ने कहा कि वो अब जेल में नहीं रह सकता. इसके बाद उसने एक दिन उन्होंने जेल अधिकारियों पर हमला किया और भाग निकले. उसके भागने के बाद तमिलनाडु पुलिस के कुछ अधिकारियों ने मुझे बताया कि तुम्हारा भाई वास्तव में एक टाइगर है."
कैसे बना 'चोरों का गांव' स्टुअर्टपुरम
1980 के दशक तक, स्टुअर्टपुरम को चोरों के गांव के रूप में जाना जाता था. स्टुअर्टपुरम के लोगों ने कई गिरोह बनाए और विभिन्न क्षेत्रों से चोरी-डकैती को अंजाम दिया.
1911 और 1914 के बीच, विभिन्न अपराधों में शामिल लोगों को एक साथ लाया गया और 'स्टुअर्टपुरम' में बसाया गया.
इसलिए इलाक़े में चाहे कहीं भी, कोई भी अपराध हुआ हो, शक़ इसी गांव के लोगों पर जाता था.
गांव की स्थापना 1913 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के सदस्य हेरोल्ड स्टुअर्ट के नाम पर की गई थी.
सरकार का मकसद सभी चोरों को एक स्थान में सीमित करके रखने का था ताकि उनपर सख़्त निगरानी रखी जा सके.
'टाइगर' नागेश्वर राव और उसके गुर्गों अपराधों के कारण स्टुअर्टपुरम का नाम पूरी तरह से कलंकित हो गया था. इस गैंग को पकड़ना पुलिस के लिए भी चुनौती बन गया था.
गांव की प्रतिष्ठा दांव पर
अंग्रेज़ों के शासन के दौरान इन चोरों को सुधारने के लिए ईसाइ मत का सहारा भी लिया गया लेकिन ये सफल नहीं रहा.
उसके बाद पुलिस और सरकार के साथ-साथ एनजीओ भी मैदान में उतरे थे. ख़ासकर नास्तिक केंद्र के संस्थापक हेमलता और उनके पति लावणम.
1970 के दशक के अंत में बनगान पल्ली में डकैती के बाद, हेमलता और लावणम ने स्टुअर्टपुरम में सुधार के कई प्रयास किए. ये दोनों जेल में नागेश्वर राव से मिले और पत्रों के माध्यम से उन्हें बदलने की कोशिश की.
स्टुअर्टपरम के इतिहास पर शोध करने वाले कोमपल्ली सुंदर ने कहा कि इस गांव के चोरों के जेल से बाहर आने के बाद भी ज़मीन और अन्य सुविधाएं मुहैया कराने के अच्छे नतीजे सामने आए थे.
के सुंदर कहते हैं, "हेमलता और लावणम के अथक परिश्रम के कारण, स्टुअर्टपुरम में बदलाव आया. शुरू में, सभी ने सोचा कि प्रभाकर राव के साथ-साथ नागेश्वर राव में भी बदलाव आया है."
प्रभाकर राव कहते हैं, "लेकिन अतीत में किए अपराधों ने नागेश्वर राव को मुख्यधारा में शामिल किया जाने के प्रयासों को बाधित कर दिया. अंततः वह फिर से अपराध की दुनिया में लौट गया. और आख़िरकार पुलिस फायरिंग में मारा गया."
घाव हरे न करें
स्टुअर्टपुर पर पहले भी कई फ़िल्में आ चुकी हैं. अब 'टाइगर' नागेश्वर राव नामक एक तेलुगू फ़िल्म आ रही है. इसकी वजह से ये गांव एक बार फिर चर्चा में है.
फ़िल्म का निर्देशन वामसी कृष्णा कर रहे हैं. फ़िलहाल फ़िल्म की शूटिंग चल रही है.
नागेश्वर राव पर फ़िल्म बनने को लेकर स्टुअर्टुपुरम के लोगों की अलग-अलग राय है.
प्रभाकर राव ने बीबीसी को बताया, "फ़िल्म यूनिट ने मुझसे चर्चा की. उन्होंने ब्योरा मांगा. लेकिन मैं नहीं चाहता कि इतिहास को तोड़-मरोड़ पेश किया जाए."
"जब हम स्टुअर्टपुरम में पढ़ते थे, तो लोग हमें अलग तरह से देखते थे. एक ग़लत धारणा थी. अब यह कम हो रहा है. गाँव में कई बदलाव आए हैं. ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की है और कहीं बाहर जाकर बस गए हैं. स्टुअर्टपुरम के लोग पुराने घावों को भूल गए हैं."
शारदा इसी गांव की रहने वाली हैं.
शारदा वर्तमान में चेन्नई में आईटी क्षेत्र में काम कर रही है. उन्हें फ़िक्र है कि ऐसी फ़िल्मों से गांव बदनाम होगा, जिससे और दिक्कतें आ सकती हैं.
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