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मुसलमान दंपति के 29 साल बाद दोबारा शादी करने को लेकर क्यों हो रहा विवाद
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
केरल के रहने वाले सी शुकूर और और उनकी पत्नी डॉक्टर शीना को विशेष विवाह अधिनियम के तहत दोबारा शादी करने को लेकर विरोध का सामना करना पड़ रहा है. मुसलमान संगठनों और विद्वानों ने उनकी इस शादी की कड़ी आलोचना की है.
सी शुकूर पेशे से वकील हैं और डॉक्टर शीना महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी की उपकुलपति रह चुकी हैं. 29 साल पहले 1994 में दोनों की शरिया क़ानून से शादी हुई थी. सी शुकूर इस विरोध के ख़िलाफ़ कहते हैं कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी रजिस्टर करके उन्होंने सिर्फ़ अपनी बेटियों के हितों की सुरक्षा की है.
शुकूर और शीना ने केरल के कासरगोड़ ज़िले में होसदुर्ग में सब रजिस्ट्रार के सामने शादी रजिस्टर की थी. उन्होंने ये शादी आठ मार्च को महिला दिवस के मौके पर की थी.
इस दंपति के लिए ये बेहद खुशी का मौका था. उनके परिवार के सदस्य रजिस्ट्रार के दफ़्तर में इकट्ठा हुए. रजिस्ट्रार के सामने हस्ताक्षर करने के बाद उनके परिवार के सदस्यों और दोस्तों ने ताली बजाई. सी शुकूर के भाई की पत्नी शकीरा मुनीर इस शादी की गवाह बनीं.
शुकूर ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''बिल्कुल, हम बेटियों वाले परिवारों को एक संदेश दे रहे हैं कि हमारे क़ानून में उनके पास ये विकल्प मौजूद है. वो इस विकल्प के ज़रिए इस समाज में अपनी बेटियों को बेटों के बराबर दर्जा दे सकते हैं.''
शुकूर ने बीबीसी हिंदी को पहले बताया था, "मुस्लिम लॉ के सिद्धांतों में लिंग के आधार पर ढेरों भेदभाव हैं. ये पितृसत्तामक क़ानून है और पुरुषों को प्रधान मानने की मानसिकता के साथ लिखा गया है. ये क़ुरान और सुन्ना की शिक्षाओं के ख़िलाफ़ है."
"अल्लाह के आगे सभी पुरुष और महिला बराबर हैं लेकिन 1906 में डीएच मुल्ला ने 'मुस्लिम लॉ के सिद्धांत' तय करते हुए इसकी जो व्याख्या की उससे ज़ाहिर होता है कि पुरुष महिलाओं से ज़्यादा ताक़तवर हैं और पुरुष महिलाओं का नियंत्रण करेंगे. इसी आधार पर उन्होंने विरासत क़ानून तैयार किया."
बेटियों वाले माता-पिता के लिए विकल्प
शुकूर और उनकी पत्नी की तीन बेटियां हैं. उनके कोई बेटा नहीं है. मौजूदा मुस्लिम लॉ के मुताबिक बेटियों को उनकी ज़ायदाद का दो तिहाई हिस्सा मिलेगा. बाकी का एक तिहाई हिस्सा उनके भाई को हासिल होगा. उनके भाई के एक बेटे और बेटियां हैं. उनके भाई के बच्चों को पिता से सारी संपत्ति हासिल होगी.
शुकूर इसके लिए विकल्प बताते हैं कि भले ही आपकी शादी शरिया के मुताबिक हुई फिर भी मुसलमान दंपति अपनी शादी विशेष विवाह अधिनियम की धारा 15 के तहत अपनी शादी पंजीकृत करा सकते हैं.
इससे मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत जो संपत्ति बेटियों के चाचा या ताऊ को जाती है वो बेटियों के पास ही रहेगी.
लेकिन, उनके इस कदम को लेकर कहा जा रहा है कि ''उन्होंने वो सीमाएं लांघ दी हैं जो उन्हें नहीं लांघनी चाहिए थीं.''
इस्लामिक विद्वान और कोझीकोड में प्रोफाउंड अकादमी के निदेशक मुस्तफ़ा तनवीर बीबीसी हिंदी को बताते हैं, ''विरासत को लेकर इस्लामिक क़ानून स्पष्ट हैं. लेकिन, इसमें जिस समानता की बात हो रही, इस्लाम में समानता के मायने वो नहीं हैं.''
''समानता को लेकर ये बहुत ही आधुनिक समझ है जो महिलावाद, लोकतंत्र और मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा जैसे आधुनिक अभियानों से निकली है.''
ये बयान ऐसे समय में आया है जब कुछ मुसलमान संगठन पहले से विरासत क़ानून में बदलाव का विरोध कर रहे हैं.
केरल नदवातुल मुजाहिदीन की युवा ईकाई इत्तेहादुल शुब्बनिल मुजाहिदीन और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमलएल) ये घोषणा कर चुके हैं कि वो मुसलमानों के विरासत के क़ानून में बदलाव की मांग का विरोध करने के लिए अभियान शुरू करेंगे. ये अभियान 15 मार्च से शुरू किया जाएगा.
शरिया और संविधान
शुकूर इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि शरिया के तहत विरासत का क़ानून 'दैवीय क़ानून' है.
वह कहते हैं, ''पैगंबर ने उस समय की स्थितियों के अनुसार विचार किया था. उस समय लड़कियों के लिए संपत्ति की अवधारणा नहीं थी. लेकिन, अब समाज इतना विकसित हो गया है कि बेटियों के विकास के अलग-अलग पहलुओं के बारे में सोचने लगा है.''
डॉक्टर शीना कन्नूर विश्वविद्यालय में लॉ डिपार्टमेंट की प्रमुख हैं. वह कहती हैं, ''विरासत एक क़ानून है. ये समान होना चाहिए. साथ ही ये भारत के संविधान के ख़िलाफ़ नहीं होना चाहिए. विरासत को अनुच्छेज 13 के तहत देखा जाना चाहिए.'' संविधान के अनुच्छेद 13 में मूल अधिकारों को संरक्षित किया गया है.
इसके ख़िलाफ़ तनवीर कहते हैं, ''जब निकाह का प्रावधान है तो आप विशेष विवाह अधिनियम को चुन रहे हैं और इस तरह ये दिखा रहे हैं कि आपको धार्मिक आधार के बजाए एक धर्मनिरपेक्ष अनुबंध चाहिए. इस्लाम में इसे प्रोत्साहन नहीं दिया जाता.''
''भारत में हो ये रहा है कि जब इस्लाम से जुड़ा कोई मसला चर्चा के लिए आता है तो उदारवादी और प्रगतिशील लोग इस तरह बोलते हैं कि दुर्भाग्य से धर्मनिरपेक्षता की बात से हिंदुत्व का आभास होता है. इस तरह की चर्चाएं इस्लामोफोबिया को बढ़ाती हैं और उसे अगले स्तर पर ले जाती हैं.''
लेकिन, शुकूर का कहना है कि वो और उनकी पत्नी ''धार्मिक नेताओं और शरिया को चुनौती नहीं दे रहे हैं. हम मौजूदा मुस्लिम पसर्नल लॉ को भी चुनौती नहीं दे रहे हैं. हम सिर्फ़ उस रास्ते को चुन रहे हैं जो कोई भी मुसलमान माता-पिता अपनी बेटी के लिए चुन सकते हैं.''
परिवार में कोई विवाद नहीं
मुसलमान समुदाय में क़ानून और शादी को लेकर इस विवाद का सी शुकूर के परिवार पर कोई असर नहीं पड़ा है.
शुकूर की भाभी शकीरा मुनीर बीबीसी हिंदी से कहती हैं कि दोबारा शादी करने से कोई फर्क नहीं पड़ता. ''अगर हमें शरिया क़ानून के तहत संपत्ति मिल भी जाती तो हम उसे बेटियों को वापस कर देते. मुझे नहीं लगता कि हमारा परिवार इसे स्वीकार करता.''
वह दोबारा शादी करने को लेकर कहती हैं, ''अगर वो समाज में कुछ बदलाव लाने जा रहे हैं, वो भी खासतौर से बेटियों को लेकर, तो ये अच्छी बात है.''
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