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क्या गर्भ में ही बच्चा संस्कार सीख सकता है?
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राष्ट्र सेविका समिति से संबंध रखने वाली संस्था संवर्धिनी न्यास ने गर्भवती महिलाओं के लिए 'गर्भ संस्कार' अभियान शुरूआत की है.
राष्ट्र सेविका समिति, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) की महिलाओं से जुड़ी संस्था है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक संवर्धिनी न्यास की राष्ट्रीय आयोजक सचिव माधुरी मराठे का कहना था, ''गर्भवती महिलाओं के लिए गर्भ संस्कार नाम का अभियान शुरू किया गया है ताकि गर्भ में ही बच्चे को संस्कार और मूल्य सिखाए जा सकें.''
उनका कहना था, ''गायनोकोलॉजिस्ट, आयुर्वेद के डॉक्टरों और योग ट्रेनर्स के ज़रिए न्यास एक कार्यक्रम की योजना बना रहा है जिसमें गीता और रामायण का पाठ पढ़ना और गर्भावस्था के दौरान योग करना शामिल है ताकि गर्भ में पल रहे बच्चे में संस्कार मूल्यों दिए जा सकें.''
उनके अनुसार राजधानी दिल्ली स्थित जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में राष्ट्र सेविका समिति की तरफ़ से एक वर्कशाप का आयोजन किया गया था जिसमें 12 राज्यों की 80 गायनोकोलॉजिस्ट ने भी भाग लिया.
पीटीआई को माधुरी मराठे ने बताया, ''ये कार्यक्रम गर्भवती महिला और बच्चे के दो साल होने तक की उम्र तक चलेगा और इसमें गीता के श्लोक, रामायण की चौपाई का पाठ होगा. गर्भ में पल रहा बच्चा 500 शब्द तक सीख सकता है.''
लेकिन क्या वाक़ई गर्भ में पल रहा बच्चा शब्दों या किसी भाषा को समझ सकता है.
विज्ञान की दुनिया इस मामले में बटी हुई हैं.
मुंबई स्थित महिला एक्टिविस्ट और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सुचित्रा देलवी कहती हैं कि गर्भ में पल रहा बच्चा आवाज़ तो सुन पाता है लेकिन वो कोई भाषा नहीं समझ सकता है.
वे कहती हैं, ''जैसे-जैसे गर्भ में पल रहे बच्चे के शरीर का विकास होता है उसके कान भी विकसित होते हैं. ऐसे में ध्वनि तरंग भी उस तक पहुंचती हैं. लेकिन उन ध्वनियों से क्या मतलब निकल रहा है वो बच्चा नहीं समझ पाता. ऐसे में संस्कृत या कोई श्लोक अगर मां पढ़ भी रही है वो बच्चे को कैसे समझ आएंगे?''
अलग-अलग राय
वे मानती हैं कि ये मिथक है और इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.
डॉ सुचित्रा देलवी कहती हैं कि हमें ऐसी बातों पर सोचने की बजाए उन बच्चों के बारे में सोचना चाहिए जो इस दुनिया में आ चुके हैं लेकिन भोजन, शिक्षा जैसी मूलभूत चीज़ों से वंचित हैं. बच्चों को एक अच्छा नागरिक और संस्कार देने की बात की जानी चाहिए.
वहीं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ एसएन बसु कहती हैं कि शोध बताते हैं कि गर्भ में पल रहा भ्रूण सपने देख सकता है और वो एहसास भी कर सकता है.
वे अमेरिकी वेबसाइट साइकॉलोजी टूडे पर छपे फीटल साइकॉलोजी का ज़िक्र करते हुए कहती हैं, ''इसमें साफ़ लिखा है कि भ्रूण के नौ हफ़्ते होने तक वो हिचकी ले सकता है और तेज़ आवाज़ पर प्रतिक्रिया भी देता है. और 13वें हफ़्ते में वो सुन भी पाता है. वहीं वो मां और एक अज्ञात की आवाज़ में भी भेद कर लेता है.''
वे बताती हैं, ''इस शोध में ये भी कहा गया है कि अगर गर्भ में पल रहे भ्रूण को बार-बार एक ही कहानी सुनाई जाती है तो वो उस पर प्रतिक्रिया भी देता है.''
वे आगे कहती हैं, ''इस शोध में ये भी लिखा गया है कि भ्रूण में महसूस करने की, देखने और सुनने की क्षमता के साथ सीखने और याद रखने की क्षमता भी विकसित होती है. ये गतिविधियां मौलिक, आटोमैटिक और जीव रसायन शास्त्र से संबंधित हो सकती हैं. जैसे भ्रूण शोर-शराबे से पहले तो चौंकता है लेकिन फिर समय के साथ प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है.''
वे कहती हैं, ''गर्भ में बच्चा विकसित हो रहा होता है. इस दौरान अगर मां सकारात्मक चीज़ें करती हैं तो उसका असर बच्चे पर भी पड़ता है."
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हार्मोन और बच्चे पर असर
डॉ सुचित्रा देलवी कहती हैं, ''अगर गर्भवती महिला स्ट्रेस या तनाव में रहती हैं और उन्हें रामायण, गीता के श्लोक पढ़कर शांति मिलती है, कोई गाना सुनकर ख़ुशी मिलती है तो इस समय शरीर में बनने वाले हार्मोन का असर भ्रूण पर भी पड़ता है.''
डॉ सुचित्रा देलवी बताती हैं, ''उस समय होने वाले हार्मोन या केमिकल बैलेंस का असर मां के ज़रिए बच्चे तक पहुंचता है. यानि स्ट्रेस हार्मोन या हैप्पी हार्मोन का असर बच्चे पर भी पड़ता है और इसका वैज्ञानिक आधार है.''
अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति में एक्टिविस्ट मुक्ता दाभोलकर, एक गर्भवती महिला के लिए पोषक आहार, अच्छे विचार, मन शांत रखने की बातों को गर्भ संस्कार में जोड़ने पर सहमती दिखाती हैं.
वे कहती हैं, ''जब गर्भ में पल रहा बच्चा भाषा ही नहीं समझ सकता वो क्या जानेगा कि मां मंत्र का उच्चारण कर रही है.''
उनके मानना है कि इस तरह के गर्भ संस्कार की बात कहना छद्म विज्ञान है.
उनके अनुसार, ''एक मां का ख़ुश रहना अहम होता है और परिवार का दायित्व होना चाहिए वो उसे खुश रखे और उसके आहार पर ध्यान दिया जाना चाहिए.''
विचारधारा बढ़ाने की कोशिश
उत्तरप्रदेश के बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में एक शोध की शुरुआत की गई है जहां ये पता लगाया जा रहा है कि गर्भ में पल रहे भ्रूण पर शोर, संगीत का क्या असर होता है.
बीएचयू में प्रसूति तंत्र एवं स्त्री रोग विभाग आयुर्वेद संकाय में डॉ सुनीता सुमन कहती हैं, ''गर्भ संस्कार थेरेपी नाम से इस शोध की शुरुआत भर ही हुई है. इसमें और जानकारी आने में समय लगेगा. इसका मक़सद ये भी है अगर मां तनाव में रहती है तो उसका इस तरह की थेरेपी से क्या प्रभाव होता है उस पर भी शोध चल रहा है.''
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये एक विचारधारा के प्रचार और प्रसार की कोशिश है.
विश्लेषक राजेश सिन्हा कहते हैं कि हिंदू भावनाओं को उभारने के लिए ऐसी बातें रखी जाती हैं जिसका कोई तार्किक आधार नहीं होता है. भारत में लोगों में अंधविश्वास भरा हुआ है जहां वे पंचांग और वास्तु में ख़ासा विश्वास रखते हैं. ऐसी बातें उनका राजनीतिक और सांस्कृतिक आधार बढ़ता है.
इससे पहले भी आरएसएस की स्वास्थ्य शाखा अरोग्य भारती की तरफ़ से गर्भ विज्ञान संस्कार की शुरुआत करने की ख़बरें आईं थीं.
यह गुजरात से शुरू किया गया था और इसे साल 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर ले जाया गया. वहीं अब आरएसएस की विद्या भारती शाखा के साथ मिलकर इसे अन्य राज्यों में भी पहुंचाया जा रहा है.
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